बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों में राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियां
देवानंद सिंह
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के एक कार्यक्रम में भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने जब यह कहा कि चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश के हित अब आपस में जुड़ गए हैं, तो यह कोई सामान्य टिप्पणी नहीं थी। यह उस बदलते सामरिक परिदृश्य का स्पष्ट संकेत है, जिसमें भारत न केवल पारंपरिक दो-फ्रंट युद्ध की स्थिति से जूझ रहा है, बल्कि अब एक संभावित तीन मोर्चा युद्ध की दिशा में भी बढ़ रहा है, जिसमें पश्चिम में पाकिस्तान, उत्तर में चीन और अब पूर्व में बांग्लादेश है।

जनरल चौहान की यह चिंता एक तात्कालिक चेतावनी नहीं बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीतिक आकलन है, जिसकी जड़ें पिछले कई वर्षों में देखे जा सकते हैं। ऑपरेशन सिंदूर, सिलीगुड़ी कॉरिडोर की भौगोलिक संवेदनशीलता, बांग्लादेश में चीन की बढ़ती मौजूदगी, और अमेरिका की पाकिस्तान के प्रति बदली हुई नीति, ये सारे घटनाक्रम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और भारत की रणनीतिक नींव को नई कसौटी पर ला खड़ा करते हैं।
भारत लंबे समय तक चीन और पाकिस्तान के सैन्य गठजोड़ को दोतरफा खतरे के रूप में देखता रहा है, लेकिन अब बांग्लादेश की चीन के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाने की खबरें और पाकिस्तान के साथ कूटनीतिक नज़दीकी इस समीकरण को अधिक जटिल बना रही हैं। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, अब हम वन फ्रंट रीइन्फोर्स्ड वॉर के युग में प्रवेश कर चुके हैं, जहां पाकिस्तान से सीधे युद्ध और चीन की बैकडोर मदद के अंतर्गत सैटेलाइट इमेज, साइबर सपोर्ट, एयर डिफेंस सिस्टम्स और खुफिया सूचना पाकिस्तान को अभूतपूर्व सामर्थ्य प्रदान कर रही है।

इस रणनीतिक साझेदारी में बांग्लादेश का नया प्रवेश भारत के लिए एक बड़ी चौंकाने वाली बात है। लालमोनिरहाट में चीन की मदद से बनाए जा रहे एयरबेस की गतिविधियां भारत की पूर्वी सीमा पर खतरे की घंटी हैं। यह एयरबेस सिलीगुड़ी कॉरिडोर से मात्र 135 किमी और भारतीय सीमा से महज़ 15 किमी दूर है। यह वही सिलीगुड़ी कॉरिडोर है, जिसे चिकन नेक कहा जाता है। भारत के पूर्वोत्तर को देश के शेष हिस्से से जोड़ने वाली नाज़ुक भौगोलिक पट्टी, जिसकी चौड़ाई मात्र 22 किमी है। अगर, इस कॉरिडोर को बाधित किया गया, तो असम, अरुणाचल, नागालैंड, मणिपुर और मिज़ोरम जैसे राज्य भौगोलिक रूप से कट सकते हैं।

1971 के बाद भारत और बांग्लादेश के संबंधों को स्थिर और सहयोगपूर्ण माना जाता रहा है। 94% सीमा भारत से साझा करने वाला बांग्लादेश भारत पर सुरक्षा और व्यापार दोनों में काफी हद तक निर्भर रहा है, लेकिन बीते एक दशक में चीन ने न केवल बांग्लादेश में आधार बनाया है, बल्कि उसके रणनीतिक निर्णयों में भी हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया है।
कुनमिंग में हाल ही में आयोजित बैठक, जिसमें चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश के अधिकारी शामिल हुए थे, ने क्षेत्रीय गुटबंदी की नई नींव रख दी है। विशेषज्ञ कहते हैं कि बांग्लादेश की इतनी लंबी सीमा अगर चीन-पाक खेमे के हाथ में जाती है, तो भारत के लिए यह बेहद अस्थिर स्थिति होगी। उन्होंने यह भी इंगित किया कि शेख हसीना के जाने से भारत-बांग्लादेश संबंधों का संतुलन डगमगाने लगा है। भारत यदि सैन्य या आर्थिक शक्ति के रूप में अपने पड़ोसियों को प्रभावित नहीं कर पा रहा, तो यह उसकी कूटनीतिक अक्षमता को दर्शाता है।

पूर्वोत्तर भारत की भूगोलिक स्थिति भारत के रणनीतिक चिंतन में हमेशा विशेष महत्व रखती है, लेकिन आज यह क्षेत्र केवल भौगोलिक ही नहीं बल्कि राजनीतिक और सुरक्षा लिहाज़ से भी सबसे संवेदनशील बन गया है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर की भंगुरता, म्यांमार में अस्थिरता, बांग्लादेश की चीन से बढ़ती साझेदारी, और भूटान तथा नेपाल की तटस्थ भूमिका इस क्षेत्र को भारत के लिए बेहद असुरक्षित बना रही हैं।
जनरल चौहान की इस चिंता को समझना ज़रूरी है कि म्यांमार में हस्तक्षेप भारत के लिए लाभकारी नहीं होगा। म्यांमार की अस्थिरता से उत्पन्न शरणार्थी संकट पूर्वोत्तर के राज्यों में तनाव और अस्थिरता ला सकता है। असम और मिजोरम पहले से ही घुसपैठ और जातीय संघर्ष से जूझ रहे हैं। अगर, इन पर और बोझ डाला गया, तो सुरक्षा की चुनौतियां और बढ़ेंगी।

सीडीएस चौहान ने यह भी कहा कि अमेरिका का रुख अब पहले जैसा नहीं रहा। रक्षा विश्लेषकों का यह मानना है कि अमेरिका अब पाकिस्तान को सामरिक सहयोगी के रूप में फिर से महत्व देने लगा है। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर को व्हाइट हाउस में बुलाना और फिर पाकिस्तान के एयर चीफ का अमेरिका दौरा इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि अमेरिका अब दक्षिण एशिया में भारत से अधिक पाकिस्तान के साथ व्यावहारिक सामरिक समीकरण बना रहा है।

विश्लेषक मानते हैं कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद अंतरराष्ट्रीय समर्थन पाने में विफलता देखी। न भूटान खुलकर साथ आया, न अमेरिका, न रूस। इस तरह पाकिस्तान, जो खुद वर्षों से आतंकवाद के आरोपों में घिरा था, उसने विश्व समुदाय को यह समझाने में सफलता पाई कि वह खुद आतंकवाद से लड़ रहा है। यह सवाल भी अब बार-बार उठ रहा है कि क्या भारत की विदेश नीति प्रदर्शन की राजनीति में फंस गई है? भारत के पास रक्षा क्षमता और कूटनीतिक पूंजी तो है, लेकिन उसे धरातल पर मूर्त रूप देने में कमी रह जाती है।

G20 समिट जैसी उपलब्धियों को आंतरिक राजनीति के लिए इस्तेमाल करना समझ में आता है, लेकिन जब ऑपरेशन सिंदूर के बाद अंतरराष्ट्रीय सहयोग के मामले में भारत अकेला पड़ा दिखा, तो यह प्रदर्शन और यथार्थ के बीच की खाई उजागर हो गई।
सीडीएस चौहान की टिप्पणी केवल चेतावनी नहीं है, बल्कि नीति-निर्माताओं के लिए एक रोडमैप है। भारत को अब विभिन्न क्षेत्रों में शीघ्र, ठोस और दीर्घकालिक रणनीतिक कार्रवाई की आवश्यकता है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा सर्वोपरि बनानी होगी। रेल, सड़क और हवाई नेटवर्क को मजबूत कर पूर्वोत्तर की रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित करनी होगी।

शेख हसीना के जाने के बाद भारत को वहां की भावी सरकार से संवाद और रणनीतिक निवेश में अग्रणी भूमिका निभानी होगी। वहीं, चीन-पाकिस्तान गठजोड़ को काउंटर करने के लिए क्वाड और इंडो-पैसिफिक नेटवर्क को सक्रिय बनाना होगा। भारत को अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे सहयोगियों के साथ सैन्य और रणनीतिक समझौते को आगे बढ़ाना होगा।
जैसा कि जनरल चौहान ने कहा, संघर्ष अब सिर्फ बॉर्डर पर नहीं होगा, बल्कि डिजिटल फ्रंट पर भी होगा। फेक न्यूज़, साइबर हमले, डेटा युद्ध—इनसे लड़ने के लिए भारत को टेक्नोलॉजी और साइबर इन्फ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश करना होगा। भारत को अपने पुराने विदेश नीति फ्रेमवर्क से बाहर निकलकर एक परिपक्व, व्यावहारिक और बहुध्रुवीय रणनीति अपनानी होगी, जिसमें घरेलू राजनीति की हावी भूमिका सीमित हो।
कुल मिलाकर, भारत जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें रणनीतिक निर्णय अब तात्कालिक लाभ या आंतरिक लोकप्रियता से निर्देशित नहीं हो सकते। जनरल अनिल चौहान की टिप्पणी एक व्यापक चेतावनी है कि दक्षिण एशिया अब तेजी से पुनर्संयोजन के दौर में है। पाकिस्तान और चीन के परंपरागत गठजोड़ में बांग्लादेश का शामिल होना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए निर्णायक मोड़ हो सकता है। अब निर्णय लेने का समय है। या तो भारत इस रणनीतिक चुनौती का सामना ठोस, बहुआयामी नीति से करे या फिर एक-एक कर अपने मोर्चों पर चुपचाप अकेला होता चला जाए।

