“कांवर यात्रा में मंत्री अंसारी की सहभागिता – सेवा, सियासत या सांस्कृतिक समरसता?”
मुख्य संवाददाता राष्ट्र संवाद
झारखंड सरकार के मंत्री डॉ. इरफान अंसारी एक बार फिर सुर्खियों में हैं — इस बार अपने ‘एक हाथ में कांवर, एक पैर में सेवा’ जैसे भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव के संदेश को लेकर। मिहिजाम से सुल्तानगंज तक कांवरियों के साथ पैदल यात्रा कर उन्होंने सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान में भाग नहीं लिया, बल्कि आम श्रद्धालुओं के बीच अपनी एक ऐसी छवि भी पेश की, जिसे कई लोग ‘धरातल से जुड़ा नेता’ कह रहे हैं।

कांवर यात्रा पर उनका यह बयान “मैं किसी एक धर्म का नहीं, झारखंड की सवा तीन करोड़ जनता का सेवक हूँ” — भारतीय सेक्युलरिज़्म की भावना को आगे बढ़ाता है। विशेष बात यह रही कि एक मुस्लिम मंत्री द्वारा हिन्दू धार्मिक यात्रा में पूरी आस्था और ऊर्जा से सहभागिता को जनता ने काफी सकारात्मकता से लिया। “बोल बम” के नारों के बीच जब उन्हें ‘बाबा का भेजा हुआ नेता’ कहा गया, तो यह सिर्फ भावनात्मक समर्थन नहीं था, बल्कि जनविश्वास का एक अनोखा संकेत था।

हालांकि डॉ. अंसारी के बयानों और अंदाज़ पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं — कभी वह अपने बेबाक बोल के लिए ट्रोल होते हैं, तो कभी विवादों में घिर जाते हैं। लेकिन इस बार उनकी मौजूदगी में जो आत्मीयता दिखी, उसने विरोधियों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि में यह घटना कई मायनों में अहम है:
धार्मिक समरसता का सार्वजनिक संदेश,
जमीनी स्तर पर जनता से जुड़ने की कोशिश और अपने मंत्रालय से इतर एक सामाजिक-धार्मिक गतिविधि में भागीदारी।

जामताड़ा से लेकर देवघर तक अब यह चर्चा आम है कि मंत्री अंसारी ने कांवर यात्रा में जो उदाहरण प्रस्तुत किया, वह ‘सिर्फ दिखावा’ नहीं बल्कि एक समावेशी राजनीति की मिसाल भी बन सकती है — अगर इसे सच्चे मन से निभाया जाए।

मंत्री अंसारी की यह यात्रा सिर्फ पैदल यात्रा नहीं थी, यह एक सामाजिक संदेश, राजनीतिक संकेत और सांस्कृतिक सरोकारों की यात्रा भी थी — जिसमें श्रद्धा, सेवा और सेक्युलर भारत का प्रतिबिंब साथ-साथ चल रहा था।


