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    Home » ब्रिटेन से लौटीं जैन पांडुलिपियां: भारत की सांस्कृतिक विजय
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    ब्रिटेन से लौटीं जैन पांडुलिपियां: भारत की सांस्कृतिक विजय

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaMay 26, 2026No Comments4 Mins Read
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    जैन पांडुलिपियों की वापसी
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    लेखक: ज्योति जैन

    भारत की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध संस्कृति, ज्ञान परंपरा और ऐतिहासिक धरोहरों से होती है। सदियों पुरानी पांडुलिपियां, धार्मिक ग्रंथ और ऐतिहासिक दस्तावेज हमारे गौरवशाली अतीत के जीवंत प्रमाण हैं। किंतु दुर्भाग्यवश भारत की इस ज्ञान सम्पदा को विभिन्न देशों द्वारा समय-समय पर लूटा गया। पिछली सदियों में भारत की अनेक दुर्लभ धार्मिक और ऐतिहासिक पांडुलिपियां यूरोप के संग्रहालयों, पुस्तकालयों और निजी संस्थानों तक पहुंचने लगीं। उस समय ब्रिटिश शासन के दौरान कई विदेशी विद्वान, शोधकर्ता और संग्रहकर्ता भारतीय ग्रंथों को अध्ययन और संरक्षण के नाम पर अपने साथ ले गए। इन्हीं में जैन धर्म से संबंधित हजारों पांडुलिपियां भी शामिल थीं, जिन्हें 20वीं सदी के आरंभ में ब्रिटेन ले जाया गया और बाद में लंदन के प्रसिद्ध Wellcome Collection में संरक्षित कर लिया गया।

    ऐसे में ब्रिटेन के प्रसिद्ध ‘वेलकम कलेक्शन’ द्वारा जैन समुदाय की 2,000 से अधिक दुर्लभ पांडुलिपियों को वापस लौटाने का निर्णय भारतीय संस्कृति और विरासत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक माना जा रहा है। लगभग एक सदी से भी अधिक समय से लंदन में सुरक्षित रखी गई ये पांडुलिपियां अब अपने मूल समुदाय तक पहुंचने जा रही हैं। यह केवल प्राचीन दस्तावेजों की वापसी नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक अस्मिता, ऐतिहासिक गौरव और आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना है। इस निर्णय ने न केवल जैन समुदाय, बल्कि पूरे देश को गर्व और संतोष का अनुभव कराया है।

    इन पांडुलिपियों का संग्रह अत्यंत दुर्लभ और बहुमूल्य माना जाता है। इनमें 15वीं से 19वीं शताब्दी तक के धार्मिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और वैज्ञानिक ग्रंथ शामिल हैं। प्राकृत, संस्कृत, गुजराती, राजस्थानी और पुरानी हिंदी जैसी भाषाओं में लिखे गए ये दस्तावेज भारतीय ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की समृद्ध परंपरा को दर्शाते हैं। जैन धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘कल्पसूत्र’ की सुंदर चित्रित प्रतियां भी इस संग्रह का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसके अतिरिक्त चिकित्सा, नैतिकता और सामाजिक जीवन से जुड़े अनेक दुर्लभ ग्रंथ भी इसमें सुरक्षित हैं।

    इन पांडुलिपियों का महत्व केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत व्यापक है। कई दस्तावेज ऐसे हैं जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े विचारों तथा ब्रिटिश शासन की आलोचना को उजागर करते हैं। इन ग्रंथों में निहित नैतिक मूल्यों और मानवीय विचारों ने महात्मा गांधी और अन्य नेताओं को भी प्रभावित किया था। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल आध्यात्मिकता तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने समाज और राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    इस ऐतिहासिक पहल के पीछे लंदन स्थित ‘इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी’ और वेलकम कलेक्शन के बीच हुआ सहयोग महत्वपूर्ण है। समझौते के तहत इन पांडुलिपियों को प्रारंभ में बर्मिंघम विश्वविद्यालय के ‘धर्मनाथ नेटवर्क इन जैन स्टडीज’ में संरक्षित किया जाएगा, जहां विशेषज्ञ इनके अध्ययन, अनुवाद और संरक्षण का कार्य करेंगे। इससे शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और इतिहासकारों को भारतीय संस्कृति और जैन दर्शन को गहराई से समझने का अवसर मिलेगा।

    इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी के प्रबंध न्यासी Mehul Sanghrajka ने इस निर्णय को सांस्कृतिक सहयोग का नया मॉडल बताया है। उनका कहना है कि यह कदम केवल धरोहरों की वापसी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम है। वास्तव में, आज के आधुनिक और तकनीकी युग में अपनी सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित रखना अत्यंत आवश्यक हो गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय विश्वभर के संग्रहालयों और संस्थानों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बनेगा। इससे अन्य देशों में सुरक्षित भारतीय धरोहरों की वापसी के लिए भी सकारात्मक वातावरण तैयार हो सकता है। साथ ही यह संदेश भी मजबूत होगा कि किसी भी देश की सांस्कृतिक संपत्ति उसी देश और समाज की आत्मा होती है।

    अंततः कहा जा सकता है कि जैन पांडुलिपियों की यह ऐतिहासिक घर-वापसी केवल अतीत की स्मृतियों को लौटाने का प्रयास नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह पहल आने वाली पीढ़ियों को अपनी विरासत, संस्कृति और मूल्यों से जोड़ते हुए भारतीय सभ्यता के गौरव को और अधिक सशक्त बनाएगी।

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