मानगो की जलापूर्ति योजना: राजनीति बहुत हुई, अब जवाबदेही तय हो!
चार लाख की आबादी की प्यास, पुराने प्लांट की मशीनरी, अवैध कनेक्शन और विभागीय लापरवाही के बीच आखिर जनता कब तक भुगतेगी खामियाजा?
मानगो को 50 एमएलडी का सपोर्टिंग प्लांट कब मिलेगा?
घोषणा हुई, योजना ठंडे बस्ते में, जिम्मेदार कौन?
देवानंद सिंह
जमशेदपुर की राजनीति टाटा स्टील के बिना अधूरी है, ठीक उसी तरह मानगो की राजनीति भी वाटर ट्रीटमेंट प्लांट, बिजली विभाग, जलापूर्ति व्यवस्था और ब्रिज-फ्लाईओवर के मुद्दों के बिना पूरी नहीं हो सकती। इन मुद्दों पर बयानबाजी होती है, आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाते हैं और जनता को आश्वासनों की घुट्टी पिलाई जाती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर मानगो की जनता को बुनियादी सुविधाओं के लिए कब तक संघर्ष करना पड़ेगा? अब समय आ गया है कि जलापूर्ति योजना पर केवल राजनीति नहीं, बल्कि संबंधित विभाग, नगर निगम, संवेदक और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
मानगो वाटर ट्रीटमेंट प्लांट का उद्घाटन वर्ष 2012 में हुआ था। यानी इस योजना को शुरू हुए एक दशक से अधिक समय बीत चुका है। जलापूर्ति प्लांट की मशीनरी की सामान्य उपयोग अवधि, रखरखाव और परिचालन की स्थिति को देखते हुए उसकी नियमित तकनीकी जांच, समय पर मरम्मत और आवश्यकतानुसार बदलाव बेहद जरूरी हैं। यदि मशीनरी की प्रभावी उपयोग अवधि सात से आठ वर्ष मानकर भी चला जाए, तो सवाल उठता है कि इसके बाद प्लांट की क्षमता और कार्यप्रणाली को दुरुस्त रखने के लिए क्या कदम उठाए गए? क्या समय-समय पर तकनीकी ऑडिट हुआ? क्या पाइपलाइन नेटवर्क, जल वितरण और प्रेशर की समीक्षा की गई? यदि हुई, तो उसका परिणाम जनता को क्यों नहीं दिखाई देता? और यदि नहीं हुई, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
इस पूरे दौर में मानगो का राजनीतिक नेतृत्व भी बदलता रहा। सरयू राय क्षेत्र के विधायक एवं मंत्री रहे और बाद में बन्ना गुप्ता ने विधायक के साथ-साथ मंत्री के रूप में भी क्षेत्र का नेतृत्व किया। अलग-अलग समय पर जनप्रतिनिधियों के पास जनता की समस्याओं को सरकार और विभागों तक पहुंचाने का अवसर रहा। ऐसे में सवाल किसी एक राजनीतिक दल या व्यक्ति तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि इतने वर्षों में जलापूर्ति व्यवस्था को स्थायी और व्यवस्थित बनाने के लिए कितने ठोस प्रयास किए गए?
यदि चार लाख के करीब आबादी इस व्यवस्था पर निर्भर है, तो उसकी जरूरतों के अनुरूप वितरण प्रणाली को मजबूत करना प्राथमिकता क्यों नहीं बनी?
दूसरी ओर, जलापूर्ति की समस्या के लिए केवल प्लांट या विभाग को दोषी ठहराना भी पर्याप्त नहीं होगा। मानगो में घरेलू कनेक्शन, फ्लैटों में कथित अनधिकृत कनेक्शन, राइजिंग लाइन से पानी लेने और घरों में मोटर लगाकर पानी खींचने जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं। यदि ये शिकायतें सही हैं, तो यह व्यवस्था के साथ-साथ नागरिक अनुशासन का भी गंभीर सवाल है। राइजिंग लाइन से अनधिकृत कनेक्शन और सीधे मोटर के जरिए पानी खींचने से अन्य उपभोक्ताओं तक पानी पहुंचने का दबाव प्रभावित होता है। नतीजतन, किसी इलाके में पानी पहुंचता है, तो किसी दूसरे इलाके के घरों में नल सूखे रह जाते हैं। जिन लोगों ने नियमानुसार कनेक्शन लिया है, उन्हें भी अपने हिस्से का पानी पाने के लिए परेशान होना पड़ता है।
यहां सबसे बड़ा सवाल विभागीय कार्रवाई पर है। यदि संबंधित अधिकारियों को लगातार शिकायतें मिल रही हैं, तो अवैध कनेक्शनों की जांच क्यों नहीं होती? नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? घरेलू कनेक्शन का उपयोग निर्धारित नियमों के अनुसार हो रहा है या नहीं, इसकी नियमित जांच क्यों नहीं होती? केवल शिकायत दर्ज कर लेना विभाग की जिम्मेदारी पूरी होने का प्रमाण नहीं हो सकता। शिकायतों पर कार्रवाई, निरीक्षण और परिणाम सामने आने चाहिए।
नगर निगम और जलापूर्ति विभाग को संयुक्त रूप से पूरे नेटवर्क का तकनीकी सर्वे कराना चाहिए। राइजिंग लाइन, वितरण पाइपलाइन, वाल्व, प्रेशर और पानी की उपलब्धता की जांच होनी चाहिए। जहां अवैध कनेक्शन हैं, वहां नियमानुसार कार्रवाई की जाए। मोटर के अनधिकृत इस्तेमाल पर रोक लगाने के साथ यह भी सुनिश्चित किया जाए कि पानी का वितरण समान रूप से हो। जिन इलाकों में लगातार कम दबाव या अनियमित आपूर्ति की शिकायत है, वहां विशेष निगरानी की व्यवस्था हो। जरूरत पड़ने पर प्लांट की मशीनरी और वितरण प्रणाली का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया जाए, ताकि समस्या की वास्तविक वजह सामने आ सके।
लेकिन मानगो की राजनीति का एक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह भी है कि बुनियादी समस्याएं अक्सर राजनीतिक बयानबाजी का साधन बन जाती हैं। पानी नहीं आया तो विरोध, बिजली कटी तो प्रदर्शन, पुल या फ्लाईओवर का मुद्दा उठा तो आरोप-प्रत्यारोप। कुछ दिनों तक मामला सुर्खियों में रहता है और फिर जनता उसी समस्या के साथ जीने को मजबूर हो जाती है। क्या जनप्रतिनिधियों की भूमिका केवल विभागों के खिलाफ बयान जारी करने तक सीमित है? क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं कि वे संबंधित अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक करें, समयबद्ध कार्ययोजना बनवाएं और काम पूरा होने तक निगरानी रखें?
मानगो की जनता को यह भी समझना होगा कि पानी जैसी बुनियादी सुविधा किसी राजनीतिक दल की निजी उपलब्धि नहीं, बल्कि नागरिकों का अधिकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि कोई उपभोक्ता नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। यदि संवेदक ने निर्धारित मानकों के अनुरूप काम नहीं किया, तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि विभागीय अधिकारी शिकायतों की अनदेखी करते हैं, तो उनके खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। और यदि जनप्रतिनिधि वर्षों तक समस्या के समाधान के लिए प्रभावी पहल नहीं करते, तो जनता को उनसे सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।
मानगो की जलापूर्ति समस्या का समाधान न केवल मशीनरी बदलने से होगा, न केवल राजनीतिक बयानबाजी से और न ही जनता पर दोष मढ़ देने से। इसके लिए प्लांट की क्षमता, पाइपलाइन की स्थिति, पानी के दबाव, कनेक्शनों की वैधता और विभागीय कार्यप्रणाली की समग्र समीक्षा जरूरी है। साथ ही, एक सार्वजनिक कार्ययोजना बननी चाहिए, जिसमें सुधार के लिए समयसीमा तय हो और जनता को बताया जाए कि किस समस्या पर क्या कार्रवाई हुई।
जमशेदपुर की राजनीति में टाटा स्टील की भूमिका जितनी महत्वपूर्ण है, मानगो की राजनीति में जलापूर्ति, बिजली और बुनियादी ढांचे के सवाल उतने ही निर्णायक हैं। इन मुद्दों से कोई भी जनप्रतिनिधि मुंह नहीं मोड़ सकता। लेकिन अब जनता को केवल आश्वासन नहीं, परिणाम चाहिए। विभाग को जवाब देना होगा, संवेदक की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, नगर निगम को सक्रिय होना होगा और जनप्रतिनिधियों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर काम करना होगा।
क्योंकि पानी कोई राजनीतिक एहसान नहीं, जनता की बुनियादी जरूरत है। मानगो को अब आरोप-प्रत्यारोप नहीं, जवाबदेही चाहिए; बयान नहीं, समाधान चाहिए; और राजनीति नहीं, स्थायी जलापूर्ति व्यवस्था चाहिए। जब तक विभाग, संवेदक, नगर निगम और जनप्रतिनिधि अपनी-अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से नहीं निभाएंगे, तब तक मानगो की जनता पानी के लिए परेशान होती रहेगी और जलापूर्ति योजना राजनीति का मुद्दा बनी रहेगी।
मानगो को 50 एमएलडी का सपोर्टिंग प्लांट कब मिलेगा?
घोषणा हुई, योजना ठंडे बस्ते में, जिम्मेदार कौन?
मानगो की बढ़ती आबादी के अनुसार जलापूर्ति व्यवस्था को मजबूत करने के लिए वर्ष 2012 में स्थापित वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के साथ ही भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2024 तक एक अतिरिक्त सपोर्टिंग प्लांट के निर्माण की आवश्यकता दर्शाई गई थी। लेकिन सवाल यह है कि निर्धारित समयसीमा बीत जाने के बाद भी इस दिशा में अब तक क्या ठोस पहल हुई? क्या संबंधित विभाग ने आबादी के बढ़ते दबाव का आकलन नहीं किया, या फिर जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं में मानगो की जलापूर्ति व्यवस्था शामिल ही नहीं रही?
पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने मानगो के गांधी मैदान में आयोजित एक विशाल जनसभा में क्षेत्र के लिए 50 एमएलडी क्षमता वाले जलापूर्ति प्लांट की घोषणा की थी। इस घोषणा से मानगो के लोगों में उम्मीद जगी थी कि आने वाले वर्षों में पानी की समस्या से राहत मिलेगी। लेकिन आज सवाल यह है कि उस घोषणा का क्या हुआ? क्या योजना को प्रशासनिक स्वीकृति मिली, बजट आवंटित हुआ, जमीन चिह्नित की गई या निर्माण की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया गया? यदि योजना आगे नहीं बढ़ी, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
मानगो की लगभग चार लाख की आबादी को देखते हुए जलापूर्ति के लिए भविष्य की योजना बनाना कोई राजनीतिक एहसान नहीं, बल्कि प्रशासनिक जिम्मेदारी है। विधायक, मंत्री, नगर निगम और संबंधित विभाग आखिर इस मुद्दे पर कितने गंभीर रहे? जनता को अब केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि योजना की वर्तमान स्थिति, निर्माण की समयसीमा और जवाबदेही का स्पष्ट विवरण चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल 50 एमएलडी प्लांट की घोषणा आखिर ठंडे बस्ते में क्यों चली गई? मानगो की जनता जानना चाहती है कि उसकी प्यास बुझाने वाली इस महत्वपूर्ण योजना का भविष्य क्या है और इसके लिए जवाबदेह कौन होगा?

