*मां पाउड़ी: सरायकेला राजमहल से सिंहभूम की लोकआस्था तक*
*सिंहभूम की पुरानी धार्मिक विरासत से जुड़ी देवी, सरायकेला राजमहल में आज भी निभते हैं पूजा, शस्त्र आराधना और नुआखाई के अनुष्ठान*
मृत्युंजय बर्मन,
राष्ट्र संवाद संवाददाता, सरायकेला
राजसत्ता चली गई, पर सरायकेला राजमहल की देवी वहीं स्थापित हैं। करीब चार सौ वर्षों से मां पाउड़ी के दरबार में सरायकेला की राजपरंपरा आज भी जीवित है। कहते हैं, सिंहभूम की धरती पर मां पाउड़ी की आस्था की जड़ें राजसत्ता से भी पुरानी हैं। मां पाउड़ी देवी को किस लोकविश्वास ने उन्हें अपना आराध्य बनाया और कैसे एक स्थानीय आस्था सरायकेला के राजवंश की इष्टदेवी बन गई, इन सवालों के साथ मां पाउड़ी की कथा आज भी कौतुहल जगाती है। सरायकेला राजमहल की ऊंची दीवारों के भीतर इस परंपरा ने सत्ता के उत्थान-पतन, रियासतों के विलय और बदलते समय को देखा है, लेकिन उसकी लौ बुझी नहीं। जिउतियाष्टमी से महाष्टमी तक 16 दिनों की साधना, अखंड ज्योति, शस्त्र पूजा, राजपरिवार की महिलाओं द्वारा तैयार भोग और नुआखाई पर नई फसल के पहले अन्न का अर्पण आज भी उस विरासत को जीवित रखते हैं, जहां लोकआस्था, राजपरंपरा और चार सदियों का इतिहास एक ही धागे में बंधा दिखाई देता है।
मां पाउड़ी की परंपरा को केवल सरायकेला राजपरिवार की धार्मिक परंपरा मानना इसके इतिहास को सीमित कर देना होगा। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि उनकी आस्था सरायकेला रियासत से भी पुरानी और सिंहभूम के व्यापक भूभाग में फैली हुई थी। कालांतर में यही देवी सिंह राजवंश की राजकीय और पारिवारिक आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनीं। आज राजमहल परिसर स्थित मां पाउड़ी मंदिर इसी लंबी परंपरा की जीवित कड़ी है।
मां पाउड़ी की धार्मिक परंपरा की महत्वपूर्ण विशेषता उनका भुइयां परंपरा से संबंध है। 1872 में ई.टी. डाल्टन ने सिंहभूम के राजा की आराध्य देवी के रूप में पावड़ी देवी का उल्लेख किया और उन्हें भुइयां देवी बताया। यह महत्वपूर्ण औपनिवेशिक प्रमाण है कि 19वीं सदी तक मां पाउड़ी की पहचान राजपरिवार की आस्था के साथ भुइयां धार्मिक परंपरा से भी जुड़ी थी।
इससे पहले का महत्वपूर्ण दस्तावेज 1820 का है। उस समय पोड़ाहाट के राजा घनश्याम सिंह और सरायकेला के शासक के बीच पाउड़ी देवी की मूर्ति को लेकर विवाद ब्रिटिश प्रशासन तक पहुंचा था। 1 फरवरी 1820 के पोरहाट राजा के समझौते तथा उससे जुड़े ब्रिटिश अभिलेखों में पाउड़ी देवी की मूर्ति को सरायकेला से वापस पाने की इच्छा का उल्लेख मिलता है। इससे संकेत मिलता है कि उस समय तक देवी की मूर्ति और उनकी धार्मिक प्रतिष्ठा दो राजसत्ताओं के लिए महत्वपूर्ण विषय बन चुकी थी।
पाउड़ी देवी की आस्था इसके बाद भी राजमहल तक सीमित नहीं रही। 19वीं सदी के उत्तरार्ध और बाद के विवरणों में सरायकेला और पोरहाट सहित सिंहभूम के विभिन्न हिस्सों में देवी के मंदिरों और पूजा-स्थलों का उल्लेख मिलता है। इससे उनकी पूजा की व्यापक क्षेत्रीय परंपरा का पता चलता है।
मां पाउड़ी की आराधना का एक महत्वपूर्ण पक्ष नुआखाई जंताल है। 1954 के सिंहदेव के विवरण को उद्धृत करते हुए किए गए शोध में उल्लेख है कि नई फसल का चावल पहले मां पाउड़ी को अर्पित किया जाता था और उसके बाद ही नए चावल के सेवन की परंपरा थी। इस प्रकार जंताल केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहा, बल्कि नई फसल, कृषि जीवन और सामुदायिक आस्था से जुड़ा पर्व भी बना।
यहीं मां पाउड़ी की परंपरा राजमहल से निकलकर व्यापक लोकजीवन से जुड़ती दिखाई देती है। एक ओर वह भुइयां धार्मिक परंपरा से जुड़ी देवी हैं, दूसरी ओर सिंहभूम के राजवंश की संरक्षक और इष्टदेवी के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। नई फसल के अर्पण की परंपरा ने उन्हें क्षेत्र की कृषि संस्कृति से भी जोड़ दिया।
सरायकेला राजमहल में मां पाउड़ी की पूजा का अपना विशिष्ट अनुशासन है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार सामान्य दिनों में देवी के दर्शन की परंपरा अत्यंत सीमित रही है। राजपरिवार से जुड़े सदस्यों के हवाले से प्रकाशित विवरणों में बताया गया है कि देवी की प्रतिमा राजमहल परिसर स्थित मंदिर में रहती है और परंपरा के अनुसार राजपरिवार के चुनिंदा सदस्यों तथा देहुरी की ही नियमित धार्मिक भूमिका रही है।
दुर्गोत्सव के दौरान यह परंपरा अपने विशिष्ट स्वरूप में सामने आती है। राजपरंपरा के अनुसार जिउतियाष्टमी से महाष्टमी तक 16 दिनों तक दुर्गापूजा का अनुष्ठान चलता है। पूजा के शुरुआती चरण मां पाउड़ी मंदिर से जुड़े रहते हैं। षष्ठी के अवसर पर शस्त्र पूजा की परंपरा निभाई जाती है और इसके बाद राजमहल के सामने स्थित दुर्गा मंदिर में दुर्गापूजा के अन्य अनुष्ठान आगे बढ़ते हैं।
इस परंपरा में शस्त्र पूजा का भी अपना महत्व है। यह राजवंश की पुरानी सैन्य और राजकीय परंपरा की स्मृति से जुड़ी मानी जाती है। देवी आराधना के साथ शस्त्रों की पूजा यह दर्शाती है कि रियासत के दौर में धार्मिक आस्था और राजकीय दायित्वों के बीच गहरा संबंध था।
दुर्गोत्सव का नवमी का नुआखाई अनुष्ठान मां पाउड़ी की परंपरा को फिर कृषि संस्कृति से जोड़ता है। नई फसल से तैयार चावल का भोग मां पाउड़ी को अर्पित किया जाता है और राजपरिवार के सदस्य प्रसाद ग्रहण करते हैं। इस अनुष्ठान में देवी के प्रति कृतज्ञता के साथ नई फसल और समृद्धि की कामना का भाव भी जुड़ा हुआ है।
समय के साथ सरायकेला की राजनीतिक सत्ता समाप्त हुई, लेकिन राजमहल की धार्मिक परंपरा समाप्त नहीं हुई। आज भी मां पाउड़ी की पूजा, दुर्गोत्सव के 16 दिवसीय अनुष्ठान, शस्त्र आराधना और नुआखाई पर नई फसल अर्पित करने की परंपरा उस सांस्कृतिक निरंतरता की याद दिलाती है।
मां पाउड़ी की कहानी केवल एक राजपरिवार की इष्टदेवी की कहानी नहीं है। यह सिंहभूम की स्थानीय और भुइयां धार्मिक परंपरा, राजवंशीय आस्था, कृषि संस्कृति और दुर्गोत्सव के बीच सदियों में बने उस संबंध की कहानी है, जिसकी सबसे जीवंत छाप आज भी सरायकेला राजमहल में दिखाई देती है।

