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    Home » आतिशबाजी रहित उत्सवों की परम्परा का सूत्रपात हो
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    आतिशबाजी रहित उत्सवों की परम्परा का सूत्रपात हो

    News DeskBy News DeskSeptember 21, 2025Updated:September 21, 2025No Comments7 Mins Read
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    आतिशबाजी रहित उत्सवों की परम्परा का सूत्रपात हो
    – ललित गर्ग –
    पर्यावरण संकट हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। बढ़ता प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों की लगातार हो रही क्षति ने जीवन को असहज और असुरक्षित बना दिया है। यह संकट किसी दूर के भविष्य की चिंता नहीं है, बल्कि हमारे रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित कर रहा है। राजधानी दिल्ली इसका सबसे जीवंत उदाहरण है, जहाँ दीपावली और अन्य त्योहारों के बाद वायु गुणवत्ता इतनी खराब हो जाती है कि सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है। इसका एक प्रमुख कारण पटाखों का प्रयोग है। पटाखे और आतिशबाज़ी कुछ क्षणों के लिए उत्सव का शोर और रोशनी जरूर बिखेरते हैं, लेकिन उनके पीछे छूट जाता है जहरीला धुआं, असहनीय शोर, सांस लेने में तकलीफ और एक असंतुलित वातावरण। इस स्थिति में दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पटाखों पर अंकुश लगाने के संदर्भ में देश की शीर्ष अदालत की टिप्पणी संवेदनशील और मार्गदर्शक होने के साथ-साथ जनजागरूकता बढ़ाने वाली है।

     

     

     

     

    कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि यदि साफ वायु राष्ट्रीय राजधानी के विशिष्ट लोगों का हक है तो यह हक शेष देश के हर व्यक्ति को भी मिलना चाहिए। दिल्ली ही नहीं, सम्पूर्ण देश में वायु प्रदूषण को नियंत्रण करना जरूरी है।
    दुनिया भर के प्रदूषित देशों में भारत पांचवें नंबर पर है, दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर भी हमारे ही देश में हैं, ऐसे तेरह शहर दुनिया के शीर्ष बीस प्रदूषित शहरों में शुमार हैं, इन चिन्ताजनक हालातों में हवा को जहरीला बनाने वाले पटाखे निरंकुश रूप से जलाना एक आत्मघाती कदम ही है। पटाखों के दुष्प्रभाव स्पष्ट और प्रमाणित हैं। वे वातावरण में जहरीली गैसों का उत्सर्जन करते हैं, जिससे हवा की गुणवत्ता अचानक बेहद खराब हो जाती है। दीपावली की रात पटाखों से निकलने वाला धुआं कई दिनों तक हवा में बना रहता है और सांस की तकलीफ, आंखों में जलन, हृदय रोग और दमा जैसी बीमारियों को और गंभीर कर देता है।

     

     

     

    पटाखों से होने वाला ध्वनि प्रदूषण बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए भय और असहनीय पीड़ा का कारण बनता है। पशु-पक्षियों की स्थिति भी दयनीय हो जाती है, उनके जीवन में असुरक्षा और बेचैनी घुल जाती है। यह सब जानते हुए भी आतिशबाज़ी को लेकर समाज में अब भी ढिलाई और परंपरा के नाम पर अनदेखी जारी रहना दुर्भाग्यपूर्ण एवं विडम्बनापूर्ण है।
    दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में दीपावली के बाद की स्थिति किसी आपदा से कम नहीं होती। पिछले वर्ष दीपावली के दौरान दिल्ली के कई इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई 300 से ऊपर चला गया और “बहुत खराब” से “गंभीर” श्रेणी में दर्ज हुआ। यह हर साल का दोहराया जाने वाला दृश्य है और हर साल सरकार, समाज और न्यायपालिका को इसे लेकर चिंतित होना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस विकट स्थिति को गंभीरता से लिया है और हाल के वर्षों में बार-बार स्पष्ट किया है कि केवल दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश में पटाखों पर रोक लगनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के आलोक में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अब चाहे दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बर्नीहाट हो या पंजाब व राजस्थान के सबसे अधिक प्रदूषित शहर हों, उन्हें भी पटाखों के नियमन का लाभ मिलना चाहिए। हाल ही में अदालत ने सरकारों को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए कि पटाखों के उत्पादन,

     

     

     

    बिक्री और भंडारण पर पूर्ण रोक हो, और जो भी इन नियमों का उल्लंघन करे उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए। अदालत का यह रुख केवल कानूनी आदेश नहीं है, बल्कि समाज को चेताने वाला संदेश भी है कि अब हमें अपने उत्सवों की परिभाषा बदलनी होगी।
    दिल्ली सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुरूप पर्यावरण संरक्षण अधिनियम की धारा 5 के तहत पटाखों पर पूर्ण और स्थायी प्रतिबंध लागू किया है। इस प्रतिबंध के अनुसार न तो पटाखों का उत्पादन हो सकता है, न बिक्री और न ही भंडारण या उपयोग। यह कदम पर्यावरण और नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जरूरी था। लेकिन केवल सरकारी आदेश और अदालत के निर्देश काफी नहीं होंगे, जब तक समाज स्वयं अपनी सोच और व्यवहार में बदलाव नहीं लाता। परंपराओं को बदलने में समय लगता है, लेकिन जैसे लोग धीरे-धीरे प्लास्टिक के खिलाफ खड़े हुए और विकल्प तलाशने लगे,

     

     

     

    वैसे ही आतिशबाज़ी से मुक्त त्योहारों को भी अपनाया जा सकता है। सवाल यह है कि हम लोग क्यों नहीं सोचते कि हमारे पटाखे जलाने से श्वास रोगों से जूझते तमाम लोगों का जीना दुश्वार हो जाता है। यह एक हकीकत है कि देश के तमाम शहरों में हवा ही नहीं, पानी व मिट्टी तक में जहरीले तत्वों का समावेश हो चुका है। जो न केवल हमारी आबोहवा के लिये बल्कि हमारे शरीर के लिये भी घातक साबित हो रहा है। यही वजह है कि हाल के वर्षों में देश में श्वसन तंत्र से जुड़े रोगों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। साथ ही प्रदूषित हवा के प्रभाव में सांस संबंधी रोगों से लोगों के मरने का आंकड़ा भी बढ़ा है।

     

     

     

    कहीं न कहीं हमारे वातावरण में बढ़ता प्रदूषण ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने वाले कारकों में वृद्धि भी कर रहा है। लेकिन पटाखों से होने वाला प्रदूषण ऐसा है जो हमारे संयम के जरिये रोका जा सकता है। चिंता की बात यह है कि पटाखों के जलने से निकलने वाले कण हमारे श्वसनतंत्र को नुकसान पहुंचाने के साथ ही हमारे खून में घुल रहे हैं। जिसमें पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे महीन कण फेफड़ों में प्रवेश करके गंभीर रोगों को जन्म दे रहे हैं। इतना ही नहीं पटाखे जलाने के कारण जहरीली रासायानिक गैसों के रिसाव से हमारे पारिस्थितिकीय तंत्र को गंभीर क्षति पहुंच रही है। इससे ओजोन परत भी क्षतिग्रस्त हो रही है। साथ ही ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी हमारे वायुमंडल में जलवायु परिवर्तन के संकटों को बढ़ाने में भूमिका निभा रहा है।

     

     

    त्योहार और उत्सव हमारे जीवन का हिस्सा हैं। वे सामाजिक जुड़ाव, सांस्कृतिक गौरव और सामूहिक खुशी का प्रतीक हैं। लेकिन जब खुशी मनाने का तरीका ही हमारे स्वास्थ्य और जीवन के लिए संकट बन जाए, तब उस पर गंभीर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है। दीपावली पर पटाखों की परंपरा समाज में गहराई तक पैठ चुकी है। लोग इसे परंपरा, रौनक और आनंद का प्रतीक मानते हैं। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि “बिना पटाखों के त्योहार अधूरा लगता है।” लेकिन यह सोच आज के समय में बेहद खतरनाक साबित हो रही है। त्योहार की असली रौनक दीपों की जगमगाहट, परिवार की एकजुटता, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामूहिक उत्सवों में है। संगीत, नाटक, कला और पारंपरिक दीपक किसी भी पटाखे से कहीं अधिक स्थायी आनंद दे सकते हैं।

     

     

    समय आ गया है कि हम यह स्वीकार करें कि आतिशबाज़ी अब हमारी खुशियों का हिस्सा नहीं रह सकती। खुशियों का असली मतलब है एक-दूसरे के साथ का आनंद, स्वच्छ वातावरण में खुलकर सांस लेना और समाज में शांति और प्रेम का संचार करना। अगर हम चाहते हैं कि हमारी अगली पीढ़ी सुरक्षित और स्वस्थ जीवन जी सके, तो आतिशबाज़ी को त्यागना ही होगा। सरकारें अपनी नीतियों से इस दिशा में पहल कर चुकी हैं, अदालत ने भी कठोर आदेश दिए हैं, अब बारी समाज की है कि वह अपनी सोच बदले और अपने त्योहारों को पटाखों के बिना भी और अधिक रोशन और सार्थक बनाए। एक नागरिक के तौर पर

     

     

     

    हमारी जिम्मेदारी व संवेदनशीलता ही हमें इस संकट से उबार सकता है। विगत में सख्त कानून लागू करने के बावजूद नागरिकों के गैर-जिम्मेदार व्यवहार से प्रदूषण का संकट बढ़ा ही है। जब हम प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना त्योहार मनाएंगे, तभी सच्चे अर्थों में हमारे उत्सव जीवनदायी और सार्थक बनेंगे। यही समय है कि हम सामूहिक रूप से एक नई परंपरा गढ़ें, आतिशबाज़ी रहित त्योहारों की परंपरा, ताकि आने वाली पीढ़ियां हमें दोष न दें कि हमने उनके हिस्से की स्वच्छ हवा और सुरक्षित पर्यावरण छीन लिया।

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