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    Home » नये भारत के लिये अर्जुन की आंख चाहिए
    Breaking News मेहमान का पन्ना राष्ट्रीय

    नये भारत के लिये अर्जुन की आंख चाहिए

    Devanand SinghBy Devanand SinghMay 4, 2019No Comments7 Mins Read
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    ललित गर्ग
    सत्रहवीं लोकसभा चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दलों की रणनीति और चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों में नेताओं की मनोदशा एवं मंशा को समझा जा सकता है। इन दलों एवं उनके नेताओं के सामने देश नहीं, चुनाव जीतने का ही लक्ष्य प्रमुख है। प्रतिष्ठित दलों के महत्वपूर्ण पदधारी शीर्ष नेताओं के व्यवहार एवं बयानों के विरोधाभास चकित करने वाले हैं। इस मामले में कांग्रेस हो या सपा-बसपा का गठबंधन, कुछ ज्यादा ही हड़बड़ी और विरोधाभास दिखा रहे हंै। राजनीतिक दलों की विचारशून्यता एवं सिद्धांतहीनता ने चुनाव समर को भ्रम और विरोधाभासों में उलझा दिया है। स्थिति यह है कि जैसे-जैसे चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, राजनीतिक दल सारी मर्यादाएं भूलकर एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने लगे हैं। सभी वर्तमान नेतृत्व यानी मोदी को हटाने का विकल्प खोज रहे हंै, उनके सामने राष्ट्र नहीं, एक व्यक्ति है। इस तरह की स्थितियां एक स्वस्थ एवं आदर्श लोकतंत्र के लिये एक बड़ी चुनौती है, चिन्ता का कारण है।
    सभी पार्टियां सरकार बनाने का दावा पेश कर रही हैं और अपने को ही विकल्प बता रही हैं तथा मतदाता सोच रहा है कि देश में नेतृत्व का निर्णय मेरे मत से ही होगा। इस वक्त मतदाता मालिक बन जाता है और मालिक याचक। बस केवल इसी से लोकतंत्र परिलक्षित है। बाकी सभी मर्यादाएं, प्रक्रियाएं हम तोड़ने में लगे हुए हैं। जो नेतृत्व स्वतंत्रता प्राप्ति का शस्त्र बना था, वही नेतृत्व जब तक पुनः प्रतिष्ठित नहीं होगा तब तक मत, मतदाता और मतपेटियां सही परिणाम नहीं दे सकेंगी। आज देश को एक सफल एवं सक्षम नेतृत्व की अपेक्षा है, जो राष्ट्रहित को सर्वोपरि माने। आज देश को एक अर्जुन चाहिए, जो मछली की आंख पर निशाने की भांति भ्रष्टाचार, राजनीतिक अपराध, महंगाई, बेरोजगारी, राष्ट्रीय असुरक्षा, बढ़ती आबादी आदि समस्याओं पर ही अपनी आंख गडाए रखें। इस माने में भारत की राष्ट्रीय राजनीति में धूमकेतु की तरह उभरने वाले नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता एवं उनकी योजनाओं में उजाला दिखाई दे रहा है। 2014 के आम चुनाव में मोदी के व्यक्तित्व की अग्नि परीक्षा थी, जिस पर वह खरे उतरे, लेकिन अब 2019 में देश की जनता मोदी के पांच वर्षीय कृतित्व को सामने रखकर अपना फैसला देगी। ऐसे में धरातल पर दिखने वाली लोकहितैषी विकास योजनाएं मतदाता के पैमाना का आधार बन रही है। कम-से-कम मतदाता की उलझन कुछ तो कम हुई है कि वह राजनीतिक दलों के स्वार्थों एवं देश हित के बीच अपना निर्णय दे सकेगी।
    सत्तर वर्षीय लोकतंत्र के राजनीति में जिस तरह के आदर्श मूल्यों की स्थापना होनी चाहिए, ऐसा नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है। उसका विसंगतियों एवं विषमताओं से ग्रस्त होना गहन चिन्ता का सबब है। इन चुनावों में राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों की जो सूची सामने आई है उसमें हत्या, हत्या के प्रयास, भ्रष्टाचार, घोटाले और तस्करी के आरोपी शामिल हैं। राजनीतिक दल कब ईमानदार और पढ़े-लिखे, योग्य एवं पात्र लोगों को उम्मीदवार बनायेंगे, कब तक सुधार की अवधारणा संदिग्ध बनी रहेगी? हमें राजनीति की विकृतियों से छुटकारा पाने के लिये एक क्रांति घटित करनी होगी, आवश्यकता सम्पूर्ण क्रांति की नहीं, सतत क्रांति की है।
    सम्पूर्ण राष्ट्र के राजनीतिक परिवेश एवं विभिन्न राजनीतिक दलों की वर्तमान स्थितियों को देखते हुए बड़ा दुखद अहसास होता है कि अपवाद को छोड़कर किसी भी राजनीतिक दल में कोई अर्जुन नजर नहीं आ रहा जो मछली की आंख पर निशाना लगा सके। कोई युधिष्ठिर नहीं जो धर्म का पालन करने वाला हो। ऐसा कोई नेता नजर नहीं आ रहा जो स्वयं को संस्कारों में ढाल, मजदूरों की तरह श्रम करने का प्रण ले सके। केजरीवाल जैसे लोग किन्हीं आदर्शो एवं मूल्यों के साथ राजनीति में उतरे थे परन्तु राजनीति की चकाचैंध ने उन्हें ऐसा धृतराष्ट्र बना दिया कि मूल्यों की आंखों पर पट्टी बांध ये अपने राजनीतिक जीवन की भाग्यरेखा तलाशते में ही जुटे हैं। सभी राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है और परिवारवाद तथा व्यक्तिवाद ही छाया पड़ा है। कोई अपने बेटे को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहती है तो कोई अपने बेटे को मुख्यमंत्री के रूप में। किसी का पूरा परिवार ही राजनीति में है, इसलिए विरासत संभालने की जंग भी जारी है।
    नये-नये नेतृत्व उभर रहे हैं लेकिन सभी ने देश-सेवा के स्थान पर स्व-सेवा में ही एक सुख मान रखा है। आधुनिक युग में नैतिकता जितनी जरूरी मूल्य हो गई है उसके चरितार्थ होने की सम्भावनाओं को उतना ही कठिन कर दिया गया है। ऐसा लगता है मानो ऐसे तत्व पूरी तरह छा गए हैं। खाओ, पीओ, मौज करो। सब कुछ हमारा है। हम ही सभी चीजों के मापदण्ड हंै। हमें लूटपाट करने का पूरा अधिकार है। हम समाज में, राष्ट्र में, संतुलन व संयम नहीं रहने देंगे। यही आधुनिक सभ्यता का घोषणा पत्र है, जिस पर लगता है कि हम सभी ने हस्ताक्षर किये हैं। भला इन स्थितियों के बीच वास्तविक जीत कैसे हासिल हो? आखिर जीत तो हमेशा सत्य की ही होती है और सत्य इन तथाकथित राजनीतिक दलों के पास नहीं है। महाभारत युद्ध में भी तो ऐसा ही परिदृश्य था। कौरवों की तरफ से सेनापति की बागडोर आचार्य द्रोण ने संभाल ली थी। एक दिन दुर्योधन आचार्य पर बड़े क्रोधित होकर बोले-‘‘गुरुवर कहां गया आपका शौर्य और तेज? अर्जुन तो हमें लगता है समूल नाश कर देगा। आप के तीरों में जंग क्यों लग गई। बात क्या है?’’ आज लगभग हर राजनीतिक दल और उनके नेतृत्व के सम्मुख यही प्रश्न खड़ा है और इस प्रश्न का उत्तर उन्हीं के पास है। राजनीति की दूषित हवाओं ने हर राजनीतिक दल और उसकी चेतना को दूषित कर दिया है। सत्ता और स्वार्थ ने अपनी आकांक्षी योजनाओं को पूर्णता देने में नैतिक कायरता दिखाई है। इसकी वजह से लोगों में विश्वास इस कदर उठ गया है कि चैराहे पर खड़े आदमी को सही रास्ता दिखाने वाला भी झूठा-सा लगता है। आंखें उस चेहरे पर सचाई की साक्षी ढूंढती है। यही कारण है कि दुर्योधन की बात पर आचार्य द्रोण को कहना पड़ा, ‘‘दुर्योधन मेरी बात ध्यान से सुनो । हमारा जीवन इधर ऐश्वर्य में गुजरा है। मैंने गुरुकुल के चलते स्वयं ‘गुरु’ की मर्यादा का हनन किया है। हम सब राग रंग में व्यस्त रहे हैं। सुविधाभोगी हो गए हैं, पर अर्जुन के साथ वह बात नहीं। उसे लाक्षागृह में जलना पड़ा है, उसकी आंखों के सामने द्रौपदी को नग्न करने का दुःसाहस किया गया है, उसे दर-दर भटकना पड़ा है, उसके बेटे को सारे महारथियों ने घेर कर मार डाला है, विराट नगर में उसे नपुंसकों की तरह दिन गुजारने को मजबूर होना पड़ा। अतः उसके वाणों में तेज होगा कि तुम्हारे वाणों में, यह निर्णय तुम स्वयं कर लो। दुर्योधन वापस चला गया। लगभग यही स्थिति आज के राजनीतिक दलों के सम्मुख खड़ी है। किसी भी राजनीतिक दल के पास आदर्श चेहरा नहीं है, कोई पवित्र एजेंडा नहीं है, किसी के पास बांटने को रोशनी के टुकड़े नहीं हैं, जो नया आलोक दे सकें।
    यह वक्त राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों को कोसने की बजाय मतदाताओं के जागने का है। आज मतदाता विवेक से कम, सहज वृति से ज्यादा परिचालित हो रहा है। इसका अभिप्रायः यह है कि मतदाता को लोकतंत्र का प्रशिक्षण बिल्कुल नहीं हुआ। सबसेे बड़ी जरूरत है कि मतदाता जागे, उसे लोकतंत्र का प्रशिक्षण मिले। हमें किसी पार्टी विशेष का विकल्प नहीं खोजना है। किसी व्यक्ति विशेष का विकल्प नहीं खोजना है। विकल्प तो खोजना है भ्रष्टाचार का, अकुशलता का, प्रदूषण का, भीड़तंत्र का, गरीबी के सन्नाटे का, महंगाई का, राजनीतिक अपराधों का, राष्ट्रीय असुरक्षा का। यह सब लम्बे समय तक त्याग, परिश्रम और संघर्ष से ही सम्भव है। अल्पसंख्यक तुष्टीकरण, भ्रष्टाचार और पाक समर्थित आतंकवाद को नजरअंदाज करने वाली राष्ट्रघाती नीतियों की जगह अब इस देश को सुरक्षित जीवन और विकास चाहिए, इस तरह की परिवर्तित सोच मोदी सरकार की राष्ट्रहितैषी नीतियों का ही सुफल है, अर्जुन की आंख की तरह उनका निशाना सशक्त एवं नये भारत के निर्माण पर लगा है। शायद इसीलिए मोदी इस आम चुनाव के केंद्र में है, वे अपने विजय रथ को आगे बढ़ा रहे हैं।

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