*आज का भारत और कविवर दिनकर जी की कमी*
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आज का भारत बहुत तेज दौड़ रहा है – हमारे पास 5G है, चांद पर चंद्रयान है, दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बनने का सपना है। पर इस तेज दौड़ में कहीं न कहीं हमारा मन पीछे छूट गया है और यहीं पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की कमी सबसे ज्यादा खलती है।
समाज है, समृद्धि है पर मन का संतुलन नहीं है।युवाओं के पास जोश है, पर दिशा नहीं। दिनकर कहते थे – “शक्ति और क्षमा दोनों जब साथ होती है, तभी मनुष्य महान होता है।” आज सोशल मीडिया पर शक्ति तो दिखती है, गाली-गलौज, ट्रोलिंग के रूप में, पर क्षमा कहीं नहीं।राष्ट्रवाद है, पर राष्ट्र-चिंतन नहीं है। हम सब जय हिंद तो बोलते हैं, पर दिनकर जैसा कोई यह नहीं पूछ रहा – “भारत कैसा हो? सिर्फ अमीर हो या न्यायी भी हो ?”
सभी सुविधाओं की मृग मरीचिका में भटक रहे पर संवेदना कहीं नहीं है। समाज का चित्र और चरित्र पर नजर दौड़ाएं तो OTT, AI, पैसा सब है, पर पड़ोसी भूखा है तो हमें फर्क नहीं पड़ता।
दिनकर ने लिखा था – “जब तक मन में भूखे की पीड़ा नहीं, तब तक कविता नहीं।”
सच कहिए तो दिनकर सिर्फ कवि नहीं थे, वो भारत की आत्मा के पहरेदार थे।
जब संसद में शोर होता है, तब दिनकर की पंक्ति याद आती है – “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।” आज जनता की आवाज को कविता में कोई नहीं उठा रहा।
जब आज का युवा हताश होता है तो जंतर-मंतर पहुंच जाता है।
उसे कोई नहीं कहता – “रश्मिरथी” की तरह – “मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।”
चारों ओर आज युद्ध का माहौल है – रूस-यूक्रेन, इजराइल-फिलिस्तीन। ऐसे में दिनकर का “कुरुक्षेत्र” याद आता है, जहाँ उन्होंने पूछा था – युद्ध क्यों जरूरी है? शांति की कीमत क्या है?
आज भारत को मिसाइल से ज्यादा एक ‘मन’ की जरूरत है। दिनकर वो मन थे। उन्होंने हमें सिखाया था कि कविता सिर्फ तुकबंदी नहीं, एक आग है।इसलिए आज के भारत को एक बार फिर दिनकर को पढ़ने की जरूरत है, सिर्फ पाठ्यक्रम में नहीं, जीवन में भी।

डॉ कल्याणी कबीर
शिक्षाविद और साहित्यकार

