
इस दिवाली आसमान नहीं, अपना नजरिया रोशन कीजिए और उत्सव को एक नई सार्थकता प्रदान करें। उत्सव वही है जो हर जीव के चेहरे पर मुस्कान लाए। जिस खुशी में किसी की आँखें नम हों, वह कैसी दिवाली? दिवाली की रात कहीं खुशियों के धमाके गूँजते हैं, तो कहीं यही गूँज खौफ बन जाती है। आसमान में फूटता एक पटाखा किसी बच्चे को माँ की गोद में दुबकने, हृदय रोगी को बेचैन होने, बुजुर्ग को रातभर जागने और बेजुबान जानवर को पलंग के नीचे छिपने पर मजबूर कर देता है।
इस दिवाली आसमान नहीं, अपना नजरिया रोशन कीजिए
उत्सव का यह अनदेखा दर्द अब शहरों की सोच बदल रहा है। लोग समझने लगे हैं कि अपनी खुशी के लिए दूसरों का सुकून छीनना जरूरी नहीं। यही वजह है कि कुछ परिवार धमाकों के बजाय दीयों की रोशनी, अपनों का साथ और सुकून भरी रात चुन रहे हैं। ‘साइलेंट दिवाली’ का बढ़ता चलन इसी नई संवेदना का प्रतीक है। यह केवल पटाखों से दूरी नहीं, बल्कि दूसरों के दर्द को समझने और उनके सुकून का सम्मान करने की सामाजिक पहल है।
शहरों में बढ़ता शोर सुकून दुर्लभ बना रहा है। हॉर्न, निर्माण कार्यों की ठक-ठक, बाजारों का कोलाहल और मोबाइल की सूचनाएँ सुबह से ही कानों को चैन नहीं लेने देतीं। दिवाली पर पटाखे ध्वनि-प्रदूषण बढ़ा देते हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, आवासीय क्षेत्रों में रात का ध्वनि स्तर 45 और शांत क्षेत्रों में 40 डेसिबल से अधिक नहीं होना चाहिए। दिल्ली, पुणे और गाजियाबाद में दिवाली की रात यह स्तर अक्सर 70 से 90 डेसिबल तक पहुँच जाता है। दिल्ली के करोल बाग में 2025 की दिवाली पर 93.5 डेसिबल दर्ज हुआ। एक जोरदार पटाखा 140 से 160 डेसिबल तक शोर पैदा कर सकता है।
पटाखों का शोर थम जाता है, लेकिन उसका असर शरीर और मन पर देर तक रहता है। ध्वनि प्रदूषण दिखाई नहीं देता, फिर भी भीतर तक नुकसान पहुँचाता है। छोटे बच्चों का श्रवण तंत्र अभी विकसित हो रहा होता है, जबकि बुजुर्गों और हृदय रोगियों के लिए अचानक होने वाले धमाके परेशानी बढ़ा सकते हैं। चिकित्सकीय अध्ययन अत्यधिक शोर को तनाव हार्मोन बढ़ने, नींद टूटने और हृदय संबंधी जोखिमों से जोड़ते हैं। इसका असर पशु-पक्षियों पर भी पड़ता है। पालतू कुत्ते-बिल्लियाँ डरकर छिप जाते हैं और पक्षी घबराकर बसेरों से उड़ जाते हैं। आखिर किसी की खुशी दूसरों के स्वास्थ्य, नींद और मानसिक शांति से बढ़कर कैसे हो सकती है?
बदलाव तब आता है, जब लोग नियमों के डर से नहीं, दूसरों की तकलीफ समझकर व्यवहार बदलते हैं। पुणे के कई मोहल्लों में निवासी समूहों ने हाल के वर्षों में शांत दिवाली मनाने का फैसला किया है। किसी ने पालतू जानवरों का डर देखा, किसी ने अस्पताल के मरीजों की परेशानी महसूस की, तो किसी ने धमाकों के बीच बच्चों को कानों पर हाथ रखे पाया। तमिलनाडु के कुछ गाँवों में पक्षियों की सुरक्षा के लिए दशकों से बिना पटाखों के दिवाली मनाई जाती है।
लॉकडाउन ने शहरों को शांति का महत्त्व समझाया। सड़कें सूनी हुईं, यातायात थमा और बरसों से गूँजता शोर अचानक कम हो गया। लोगों ने महसूस किया कि शांति केवल शोर का अभाव नहीं, बल्कि जीवन की जरूरत है। घरों में रहने के अनुभव ने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति भी जागरूक किया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों ने इस बदलाव को दिशा दी। पटाखों के इस्तेमाल, समय-सीमा और ग्रीन पटाखों को लेकर नियम बने, लेकिन असली बदलाव परिवारों के फैसलों से आ रहा है।
शांत दिवाली शहरों को वह सुकून लौटा सकती है, जिसे वे विकास की दौड़ में पीछे छोड़ आए हैं। कल्पना कीजिए, जब बुजुर्ग बेखौफ बरामदे में बैठे हों, अस्पताल के पास रहने वाला मरीज चैन से सो रहा हो, बच्चे दादा-दादी की कहानियाँ सुन रहे हों और पालतू जानवर धमाकों से घबराकर न छिप रहे हों। यह दृश्य किसी बड़े आयोजन से कम उत्सवपूर्ण नहीं।
फिर भी इस बदलाव की राह आसान नहीं है। पटाखों का कारोबार, बाजार का दबाव, बच्चों का आकर्षण और पुरानी आदतें लोगों को पुराने ढर्रे पर लौटाती हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन तभी संभव है, जब नागरिक भी अपनी जिम्मेदारी समझें। दिवाली की सार्थकता धमाकों में नहीं, उन चेहरों की मुस्कान में है, जिन्हें इस रात सुकून मिले।
लेखक: कृति आरके जैन

