Close Menu
Rashtra SamvadRashtra Samvad
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • होम
    • राष्ट्रीय
    • अन्तर्राष्ट्रीय
    • राज्यों से
      • झारखंड
      • बिहार
      • उत्तर प्रदेश
      • ओड़िशा
    • संपादकीय
      • मेहमान का पन्ना
      • साहित्य
      • खबरीलाल
    • खेल
    • वीडियो
    • ईपेपर
    Topics:
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Home » इस दिवाली आसमान नहीं, अपना नजरिया रोशन कीजिए
    Headlines धर्म मेहमान का पन्ना शिक्षा संपादकीय

    इस दिवाली आसमान नहीं, अपना नजरिया रोशन कीजिए

    Devanand SinghBy Devanand SinghNovember 8, 2026No Comments4 Mins Read
    Share Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    इस दिवाली आसमान नहीं, अपना नजरिया रोशन कीजिए
    Share
    Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link

    इस दिवाली आसमान नहीं, अपना नजरिया रोशन कीजिए और उत्सव को एक नई सार्थकता प्रदान करें। उत्सव वही है जो हर जीव के चेहरे पर मुस्कान लाए। जिस खुशी में किसी की आँखें नम हों, वह कैसी दिवाली? दिवाली की रात कहीं खुशियों के धमाके गूँजते हैं, तो कहीं यही गूँज खौफ बन जाती है। आसमान में फूटता एक पटाखा किसी बच्चे को माँ की गोद में दुबकने, हृदय रोगी को बेचैन होने, बुजुर्ग को रातभर जागने और बेजुबान जानवर को पलंग के नीचे छिपने पर मजबूर कर देता है।

    इस दिवाली आसमान नहीं, अपना नजरिया रोशन कीजिए

    उत्सव का यह अनदेखा दर्द अब शहरों की सोच बदल रहा है। लोग समझने लगे हैं कि अपनी खुशी के लिए दूसरों का सुकून छीनना जरूरी नहीं। यही वजह है कि कुछ परिवार धमाकों के बजाय दीयों की रोशनी, अपनों का साथ और सुकून भरी रात चुन रहे हैं। ‘साइलेंट दिवाली’ का बढ़ता चलन इसी नई संवेदना का प्रतीक है। यह केवल पटाखों से दूरी नहीं, बल्कि दूसरों के दर्द को समझने और उनके सुकून का सम्मान करने की सामाजिक पहल है।

    शहरों में बढ़ता शोर सुकून दुर्लभ बना रहा है। हॉर्न, निर्माण कार्यों की ठक-ठक, बाजारों का कोलाहल और मोबाइल की सूचनाएँ सुबह से ही कानों को चैन नहीं लेने देतीं। दिवाली पर पटाखे ध्वनि-प्रदूषण बढ़ा देते हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, आवासीय क्षेत्रों में रात का ध्वनि स्तर 45 और शांत क्षेत्रों में 40 डेसिबल से अधिक नहीं होना चाहिए। दिल्ली, पुणे और गाजियाबाद में दिवाली की रात यह स्तर अक्सर 70 से 90 डेसिबल तक पहुँच जाता है। दिल्ली के करोल बाग में 2025 की दिवाली पर 93.5 डेसिबल दर्ज हुआ। एक जोरदार पटाखा 140 से 160 डेसिबल तक शोर पैदा कर सकता है।

    पटाखों का शोर थम जाता है, लेकिन उसका असर शरीर और मन पर देर तक रहता है। ध्वनि प्रदूषण दिखाई नहीं देता, फिर भी भीतर तक नुकसान पहुँचाता है। छोटे बच्चों का श्रवण तंत्र अभी विकसित हो रहा होता है, जबकि बुजुर्गों और हृदय रोगियों के लिए अचानक होने वाले धमाके परेशानी बढ़ा सकते हैं। चिकित्सकीय अध्ययन अत्यधिक शोर को तनाव हार्मोन बढ़ने, नींद टूटने और हृदय संबंधी जोखिमों से जोड़ते हैं। इसका असर पशु-पक्षियों पर भी पड़ता है। पालतू कुत्ते-बिल्लियाँ डरकर छिप जाते हैं और पक्षी घबराकर बसेरों से उड़ जाते हैं। आखिर किसी की खुशी दूसरों के स्वास्थ्य, नींद और मानसिक शांति से बढ़कर कैसे हो सकती है?

    बदलाव तब आता है, जब लोग नियमों के डर से नहीं, दूसरों की तकलीफ समझकर व्यवहार बदलते हैं। पुणे के कई मोहल्लों में निवासी समूहों ने हाल के वर्षों में शांत दिवाली मनाने का फैसला किया है। किसी ने पालतू जानवरों का डर देखा, किसी ने अस्पताल के मरीजों की परेशानी महसूस की, तो किसी ने धमाकों के बीच बच्चों को कानों पर हाथ रखे पाया। तमिलनाडु के कुछ गाँवों में पक्षियों की सुरक्षा के लिए दशकों से बिना पटाखों के दिवाली मनाई जाती है।

    लॉकडाउन ने शहरों को शांति का महत्त्व समझाया। सड़कें सूनी हुईं, यातायात थमा और बरसों से गूँजता शोर अचानक कम हो गया। लोगों ने महसूस किया कि शांति केवल शोर का अभाव नहीं, बल्कि जीवन की जरूरत है। घरों में रहने के अनुभव ने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति भी जागरूक किया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों ने इस बदलाव को दिशा दी। पटाखों के इस्तेमाल, समय-सीमा और ग्रीन पटाखों को लेकर नियम बने, लेकिन असली बदलाव परिवारों के फैसलों से आ रहा है।

    शांत दिवाली शहरों को वह सुकून लौटा सकती है, जिसे वे विकास की दौड़ में पीछे छोड़ आए हैं। कल्पना कीजिए, जब बुजुर्ग बेखौफ बरामदे में बैठे हों, अस्पताल के पास रहने वाला मरीज चैन से सो रहा हो, बच्चे दादा-दादी की कहानियाँ सुन रहे हों और पालतू जानवर धमाकों से घबराकर न छिप रहे हों। यह दृश्य किसी बड़े आयोजन से कम उत्सवपूर्ण नहीं।

    फिर भी इस बदलाव की राह आसान नहीं है। पटाखों का कारोबार, बाजार का दबाव, बच्चों का आकर्षण और पुरानी आदतें लोगों को पुराने ढर्रे पर लौटाती हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन तभी संभव है, जब नागरिक भी अपनी जिम्मेदारी समझें। दिवाली की सार्थकता धमाकों में नहीं, उन चेहरों की मुस्कान में है, जिन्हें इस रात सुकून मिले।

    लेखक: कृति आरके जैन

    दिवाली ध्वनि प्रदूषण पर्यावरण संरक्षण सामाजिक संवेदना सुरक्षित दिवाली
    Share. Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Previous Articleदीपावली के पाँच पर्व और उनसे जुड़ी धार्मिक परंपराएँ
    Next Article दीपावली : एक पर्व, अनेक परंपराएं, लेकिन संदेश एक अंधकार पर प्रकाश की विजय

    Related Posts

    इस दीपावली बनें सच्चा मनी मैग्नेट

    November 8, 2026

    दीपावली : एक पर्व, अनेक परंपराएं, लेकिन संदेश एक अंधकार पर प्रकाश की विजय

    November 8, 2026

    दीपावली के पाँच पर्व और उनसे जुड़ी धार्मिक परंपराएँ

    November 8, 2026

    Comments are closed.

    अभी-अभी

    इस दीपावली बनें सच्चा मनी मैग्नेट

    दीपावली : एक पर्व, अनेक परंपराएं, लेकिन संदेश एक अंधकार पर प्रकाश की विजय

    इस दिवाली आसमान नहीं, अपना नजरिया रोशन कीजिए

    दीपावली के पाँच पर्व और उनसे जुड़ी धार्मिक परंपराएँ

    गाजियाबाद पुलिस चौकी ब्लास्ट में नया मोड़, आतंकी संगठन ने सोशल मीडिया पर ली जिम्मेदारी

    LocoWin Casino betaalmethoden: storten en opnemen met kaart, e-wallet en crypto

    प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों को दी दिवाली की शुभकामनाएं, बोले- जवानों के साथ मनाऊंगा त्योहार

    आदिवासी कार्यकर्ता निशा भगत पंचतत्व में विलीन, न्याय की मांग को लेकर झारखंड में उबाल; सीबीआई जांच की मांग तेज

    अयोध्या में 10वें भव्य दीपोत्सव की धूम, लाखों दीपों से जगमगाई रामनगरी; ड्रोन शो और आतिशबाजी ने मोहा मन

    मरीजों को तेज और परेशानी मुक्त सेवाएं देने के लिए टीएमएच ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया

    Facebook X (Twitter) Telegram WhatsApp
    © 2026 News Samvad. Designed by Cryptonix Labs .

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.