जिस थाप पर झूमता है झारखंड, उसे मिली पहचान
*मांदर अब सिर्फ अखड़े की आवाज नहीं, GI रजिस्ट्री में भी झारखंड की पहचान*
मृत्युंजय बर्मन,
राष्ट्र संवाद संवाददाता
झारखंड की लोक-संस्कृति की कल्पना मांदर की थाप के बिना अधूरी है। अखड़े की मिट्टी हो या सरहुल-करम का उत्सव, विवाह की खुशी हो या सामुदायिक नृत्य, मांदर की थाप झारखंडी जीवन के हर उस रंग में घुली है, जहां गीत, नृत्य और समुदाय एक साथ सांस लेते हैं। यह सिर्फ एक वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपरा, सामुदायिक जुड़ाव और सांस्कृतिक स्मृति की आवाज है।
अब इसी आवाज को देश की आधिकारिक पहचान मिल गई है। ‘Mandar of Jharkhand’ को भौगोलिक संकेतक (GI) के रूप में पंजीकृत किया गया है। मांदर की थाप, जो अब तक झारखंड के गांवों और अखड़ों में संस्कृति की पहचान थी, GI के बाद उसकी भौगोलिक और पारंपरिक विशिष्टता के रूप में भी दर्ज हो गई है।
मांदर की खासियत उसकी पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया में भी छिपी है। स्थानीय मिट्टी से तैयार शरीर, चमड़े की मढ़ाई और हाथों की कारीगरी मिलकर इसकी विशिष्ट ध्वनि पैदा करती है। GI प्रक्रिया में मांदर की परंपरा और पहचान को प्रमाणित करने के लिए पुराने मानवशास्त्रीय एवं ऐतिहासिक दस्तावेजों का भी सहारा लिया गया।
*असली चुनौती अब शुरू होती है*
जीआई टैग मिलना उपलब्धि है, लेकिन इसका वास्तविक लाभ तभी दिखाई देगा जब मांदर बनाने वाले कारीगरों तक उसका आर्थिक लाभ पहुंचे।
रायडीह और झारखंड के दूसरे क्षेत्रों में मांदर बनाने वाले कारीगरों को बेहतर बाजार, उचित मूल्य, प्रशिक्षण, ब्रांडिंग और प्रमाणित उत्पाद की पहचान उपलब्ध कराना अगला महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
यदि जीआई टैग केवल सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज होकर रह गया, तो उपलब्धि अधूरी रहेगी। लेकिन यदि इसके साथ कारीगरों का पंजीकरण, प्रमाणित उत्पाद, बाजार से सीधा जुड़ाव, ई-कॉमर्स, पर्यटन और सांस्कृतिक आयोजनों में प्रचार जैसी पहल जुड़ती है, तो मांदर झारखंड की सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था का माध्यम भी बन सकता है। जिस मांदर की थाप ने सदियों तक झारखंड को पहचान दी, अब उसी मांदर के नाम के साथ झारखंड की पहचान आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज हो गई है।

