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    Home » जल-संकट पर भागवत का सीधा संवाद
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    जल-संकट पर भागवत का सीधा संवाद

    Devanand SinghBy Devanand SinghDecember 29, 2022No Comments7 Mins Read
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    ललित गर्ग
    जल प्रदूषण एवं पीने के स्वच्छ जल की निरन्तर घटती मात्रा को लेकर बड़े खतरे खड़े हैं। धरती पर जीवन के लिये जल सबसे जरूरी वस्तु है, जल है तो जीवन है। जल ही किसी भी प्रकार के जीवन और उसके अस्तित्व को संभव बनाता है। जीव मंडल में पारिस्थितिकी संतुलन को यह बनाये रखता है। पीने, नहाने, ऊर्जा उत्पादन, फसलों की सिंचाई, सीवेज के निपटान, उत्पादन प्रक्रिया आदि बहुत उद्देश्यों को पूरा करने के लिये स्वच्छ जल बहुत जरूरी है। जल-संकट के प्रति सचेेत करते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर-संघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जल का भंडारण बढ़ाने की बात कहीं। उन्होंने कहा कि जल को जितना बचा सकते हैं बचाएं और जितना बढ़ा सकते हैं बढ़ाएं क्योंकि जल पृथ्वी की संचित संपत्ति है। हम जल को कैसे स्टोर कर सके, इसका उपाय करना चाहिए। भागवत की इस पर्यावरण चिन्ता की परिक्रमा करने के बाद ऐसा लगा कि भारतीय परम्परा का मंचमहाभूत एक कल्पवृक्ष है, जिसकी छांव में रहने वाले लोग पूरी तरह से निश्चिंत रहते हैं।

    संघ प्रमुख ने पर्यावरण पर भारतीय ज्ञान परंपरा आधारित समकालीन विमर्श स्थापित करने के लिए पंचमहाभूत के जल तत्व पर सुजलाम अंतरराष्ट्रीय सेमिनार को संबोधित करते हुए जल का संयमित उपयोग करने एवं जल को बचाने का आह्वान किया, जो जल-संकट से उभरने की एक रोशनी दे रहा है। उज्जैन में सुजलाम जल महोत्सव में मोहन भागवत ने महाकाल में 60 किलो चांदी से बनाए गए जल स्तंभ का भी अनावरण किया। यह सम्मेलन ‘सुमंगलम’ नामक कार्यक्रमों की एक श्रृंखला का हिस्सा है। इसका उद्देश्य प्रकृति के पांच मूल तत्वों या ‘पंचमहाभूत’ – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अंतरिक्ष की शुद्धता को सुरक्षित रखने की अनूठी भारतीय अवधारणा को प्रस्तुत करना है। पर्यावरण संकट पर भारत सहित पूरी दुनिया में गहरा संकट देखने को मिल रहा है। इस महासंकट से निजात दिलाने में भारत सक्षम है। पर्यावरण संरक्षण के लिए पंचतत्वों को समझने और व्यापक नीति बनाने के मकसद से देश में सुमंगलम अभियान शुरू किया गया है।

    संघ एवं भागवत की बहुआयामी प्रवृत्तियों में एक है पर्यावरण। जल प्रदूषण एवं पीने लायक जल की घटती मात्रा दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती बन चुका हैं। पर्यावरण से जुड़ी इस तरह की समस्याओं एवं खतरों को लेकर वैश्विक स्तर पर चिन्ता तो जाहिर की जाती है, मगर अब तक इस दिशा में कोई खास समाधान की पहल नहीं हो सकी है। परिणाम है कि बढ़ती जनसंख्या के कारण तेज औद्योगिकीकरण और अनियोजित शहरीकरण बढ़ रहा है जो बड़े और छोटे पानी के स्रोतों में ढेर सारा कचरा छोड़ रहें हैं जो अंततः पानी की गुणवत्ता को गिरा रहा है। जल में ऐसे प्रदूषकों के सीधे और लगातार मिलने से पानी में उपलब्ध खतरनाक सूक्ष्म जीवों को मारने की क्षमता वाले ओजोन के घटने के कारण जल की स्व-शुद्धिकरण क्षमता घट रही है। इससे जल की रसायनिक, भौतिक और जैविक विशेषताएं बिगड़ रही है जो पूरे विश्व में सभी पौड़-पौधों, मानव और जानवरों के लिये बहुत खतरनाक है।

    पशु और पौधों की बहुत सारी महत्वपूर्ण प्रजातियाँ जल प्रदूषकों के कारण खत्म हो चुकी है। ये एक वैश्विक समस्या है जो विकसित और विकासशील दोनों देशों को प्रभावित कर रही हैं। खनन, कृषि, मछली पालन, स्टॉकब्रिडींग, विभिन्न उद्योग, शहरी मानव क्रियाएँ, शहरीकरण, निर्माण उद्योगों की बढ़ती संख्या, घरेलू सीवेज आदि के कारण बड़े स्तर पर जल एवं जलस्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। मोहन भागवत ने इन संकटों से मुक्ति के लिये सार्थक उपक्रम किये जाने की आवश्यकता व्यक्त करते हुए शाकाहार को अपनाने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा कि मांसाहार से पानी की खपत बढ़ गई है। मांसाहार नहीं होगा तो कत्लखाने बंद हो जाएंगे। बेहतर यह है कि शाकाहारी बने। हमें किसी भी तरह जल का अनादर न करना चाहिए। हमारी प्रकृति का सम्मान हो और इसकी सदैव पूजा की जाना चाहिए।
    पूरे विश्व के लिये शुद्ध जल की मात्रा का लगातार घटना एवं जल प्रदूषण एक बड़ा पर्यावरणीय और सामाजिक मुद्दा है। यह अपने चरम बिंदु पर पहुँच चुका है। इन संकटों से घिरती विश्व मानवता को बचाने के लिये डॉ. भागवत ने जहां प्रकृति को बचाने के लिये हर प्रकार से कोशिश करने की बात कहीं वहीं उन्होंने खेती के धंधे की पद्धति में बदलाव भी करना पड़े तो करने का सुझाव दिया। हमें अधिक से अधिक जैविक खेती करने की आवश्यकता है। जल का भंडारण अधिक से अधिक धरती पर किया जाए। पानी की खपत कैसे कम हो, कम पानी में हमारा काम हो, इस पर जोर देना जरूरी है। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी), नागपुर ने चेताया है कि नदी जल का 70 प्रतिशत बड़े स्तर पर प्रदूषित हो गया है।
    भारत की मुख्य नदी व्यवस्था जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, यमुना आदि बड़े पैमाने पर प्रभावित हो चुकी है। भारत में मुख्य नदी खासतौर से गंगा भारतीय संस्कृति और विरासत से अत्यधिक गहरे रूप में जुड़ी हुई है। आमतौर पर लोग जल्दी सुबह नहाते हैं और किसी भी व्रत या उत्सव में गंगा जल को देवी-देवताओं को अर्पण करते हैं। अपने पूजा को संपन्न करने के मिथक में गंगा में पूजा विधि से जुड़ी सभी सामग्री एवं अस्थि विसर्जन कर देते हैं। इसी गंगा नदी एवं अन्य नदियों में उद्योगों से चीनी मिल, भट्टी, ग्लिस्रिन, टिन, पेंट, साबुन, कताई, रेयान, सिल्क, सूत आदि जो जहरीले कचरे बड़ी मात्रा में मिलते हैैं। 1984 में, गंगा के जल प्रदूषण को रोकने के लिये गंगा एक्शन प्लान को शुरु करने के लिये सरकार द्वारा एक केन्द्रिय गंगा प्राधिकरण की स्थापना की गयी थी। सरकार जल प्रदूषण एवं जल संरक्षण के लिये जागरूक बनी है, लेकिन सरकार के साथ जनता को भी जागना होगा।
    दुनिया की बहुत सारी नदियों की तरह भारतीय नदियों का पानी भी प्रदूषित हो चुका है, जबकि इन नदियों को हमारी संस्कृति में हमेशा पवित्र जगह दी जाती रही है। भारत के लोग इन नदियों से मुंह नहीं फेर सकते क्योंकि वे उनकी जीवनरेखाएं हैं और भारत का भविष्य कई रूपों में इन्हीं नदियों की सेहत से जुड़ा हुआ है। भारत में जल प्रदूषण सबसे गंभीर पर्यावरण संबंधी खतरों में से एक बनकर उभरा है। इसके सबसे बड़े स्रोत शहरी सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट हैं जो बिना शोधित किए हुए नदियों में प्रवाहित किए जा रहे हैं। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद शहरों में उत्पन्न कुल अपशिष्ट जल का केवल 10 प्रतिशत हिस्सा ही शोधित किया जा रहा है और बाकी ऐसे ही नदियों, तालाबों एवं महासागरों में प्रवाहित किया जा रहा है। जल प्रदूषण की समस्या से मानव तो बुरी तरह प्रभावित होते ही हैं, जलीय जीव जन्तु, जलीय पादप तथा पशु पक्षी भी प्रभावित होते हैं। खास तौर पर कुछ समुद्री हिस्सों एवं नदियों में तो जल प्रदूषण की वजह से जलीय जीवन समाप्तप्राय हो चुका है। जल बचाने के मुख्य साधन है नदी, ताल एवं कूप। इन्हें अपनाओं, रक्षा करो, अभय दो, इन्हें मरुस्थल के हवाले न करो। अन्तिम समय यही तुम्हारे जीवन और जीवनी को बचायेंगे। ख्यात पर्यावरणविद अनुपम मिश्र तो ‘अब भी खरे है तालाब’ कहते कहते स्वर्गस्थ हो गये।
    मोहन भागवत की अवधारणा है कि पंच महाभूतों में पैदा हुए असंतुलन से उत्पन्न विकृतियों के संकट से उभरना आवश्यक है। अपनी-अपनी शक्ति अनुसार पंच महाभूतों पर अलग-अलग स्थानों पर कार्य करना आवश्यक है। पिछले कुछ समय से दुनिया में पर्यावरण के विनाश एवं जल प्रदूषण को लेकर काफी चर्चा हो रही है। मानव की गतिविधियों के कारण पृथ्वी एवं प्रकृति के वायुमंडल पर जो विषैले असर पड़ रहे हैं, उनसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी चिंतित हैं। पंचमहाभूत के जल तत्व पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार एक महाअनुष्ठान है जिसमें अनेक देश-विदेश के विशिष्ट व्यक्तित्व पर्यावरण संरक्षण के इस महाकुंभ में जन-जन को अभिप्रेरित करते हुए पर्यावरण एवं जल संरक्षण को नया जीवन प्रदान करेंगे। चूंकि प्रकृति मनुष्य की हर जरूरत को पूरा करती है, इसलिए यह जिम्मेदारी हरेक व्यक्ति की है कि वह प्रकृति की रक्षा के लिए अपनी ओर से भी कुछ प्रयास करे।

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