क्या जेडीयू में सक्रिय भूमिका में आने वाले हैं निशांत कुमार ?
देवानंद सिंह
बिहार की राजनीति अपने आप में एक जटिल और बहुपरतीय परिघटना रही है, जहां सत्ता की धुरी जातीय समीकरणों, पारिवारिक वफादारियों और सत्ताधारी चेहरों की विश्वसनीयता के बीच घूमती रही है। बीते दो दशकों से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस परिदृश्य पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी है, लेकिन अब जब नीतीश कुमार की आयु, सेहत और उनके सक्रिय राजनीति से धीरे-धीरे किनारा करने की संभावनाओं को लेकर चर्चाएं गहराने लगी हैं, तब उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। इन्हीं सवालों के बीच निशांत कुमार के रूप में एक नया नाम धीरे-धीरे उभर रहा है।

नीतीश कुमार के इकलौते बेटे निशांत कुमार ने अपने जन्मदिन पर जब यह बयान दिया कि मेरे पिताजी ही मुख्यमंत्री होंगे और एनडीए सरकार अच्छे बहुमत से बनेगी, तो एक शांत-चित्त, मीडिया से दूर रहने वाले, सार्वजनिक जीवन से परहेज़ करने वाले बेटे के मुंह से निकला यह राजनीतिक कथन बिहार के सियासी गलियारों में जैसे एक धमाके की तरह गूंजा। वर्षों तक निजी जीवन में सादगी और गुमनामी बरतने वाले निशांत कुमार अचानक जेडीयू के संभावित भविष्य के तौर पर देखे जाने लगे।

निशांत कुमार ने रांची से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है, और अब लगभग 50 वर्ष की आयु के हो चले हैं। उन्होंने न तो विवाह किया है और न ही किसी तरह की व्यावसायिक या राजनीतिक सक्रियता सार्वजनिक रूप से दिखाई है। इसके बावजूद, अब वे बिहार की सियासत में एक संभावित उत्तराधिकारी के रूप में देखे जा रहे हैं, केवल इसलिए नहीं कि वे नीतीश कुमार के पुत्र हैं, बल्कि इसलिए भी कि जेडीयू में नीतीश के बाद कोई सर्वमान्य चेहरा नज़र नहीं आता।

नीतीश कुमार ने अपनी राजनीतिक यात्रा में अनेक नेताओं को तैयार करने का दावा किया, लेकिन उनमें से कोई भी नेता स्थायी रूप से पार्टी के ‘दूसरे नंबर’ का चेहरा नहीं बन सका। कभी आरसीपी सिंह, कभी प्रशांत किशोर, कभी ललन सिंह और कभी संजय झा को नीतीश के सबसे भरोसेमंद सिपहसालारों के रूप में देखा गया, लेकिन इनमें से कोई भी उनके उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित नहीं हो पाया। उपेंद्र कुशवाहा, जो कभी नीतीश के बहुत क़रीब माने जाते थे, उन्होंने भी अंततः जेडीयू से अलग राह पकड़ ली और अब अपनी खोई हुई राजनीतिक ज़मीन की तलाश में हैं।

जेडीयू की यही सच्चाई कि पार्टी नीतीश कुमार के बिना कल्पनातीत है, उसे उत्तराधिकारी संकट से जूझने पर मजबूर करती है। यही कारण है कि जब निशांत कुमार जैसे अब तक सियासत से दूर व्यक्ति कोई राजनीतिक बयान देते हैं, तो पार्टी और मीडिया दोनों उसे बड़ी दिलचस्पी से देखता है। बिहार की राजनीति में परिवारवाद एक विवादास्पद किंतु निर्विवादित सच्चाई है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) में लालू प्रसाद यादव ने अपने बेटे तेजस्वी यादव को राजनीति में उतारा और अब वह राज्य की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता हैं। कांग्रेस में राहुल गांधी, शिवसेना में उद्धव ठाकरे और डीएमके में स्टालिन जैसे उदाहरणों की लंबी फेहरिस्त भारत की राजनीति में फैली है। ऐसे में, यह आश्चर्य नहीं है कि जेडीयू के भीतर भी नेतृत्व की विरासत को आगे बढ़ाने की बात हो रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार, चाहे परिवारवाद की जितनी आलोचना की जाए, हकीकत यही है कि करुणानिधि, मुलायम सिंह या लालू यादव जैसे नेताओं की विरासत उनके पुत्रों ने आगे बढ़ाई है, जबकि जयललिता और मायावती की गैर-वंशवादी राजनीति के बाद उनकी पार्टी की हालत कमजोर हो गई है। इस नजरिए से देखें तो जेडीयू के नेताओं के लिए निशांत कुमार एक संभावित विकल्प हैं, भले ही उन्होंने अभी तक सार्वजनिक रूप से कोई राजनीतिक दायित्व स्वीकार नहीं किया है।
निशांत कुमार की अब तक की जीवनशैली शालीन, निजी और गैर-राजनीतिक रही है। कुछ विशेषज्ञों की राय में निशांत की चर्चा केवल इसलिए होती है, क्योंकि वे नीतीश के बेटे हैं। उनके अनुसार, राजनीति के लिहाज से उन्हें अभी तैयार होना बाकी है, लेकिन कई जेडीयू नेताओं और राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि निशांत का ‘लो प्रोफाइल’ होना ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी बन सकती है, एक ऐसा चेहरा, जिस पर आरोपों का कोई दाग नहीं, जो पढ़ा-लिखा और विवेकशील है, और जिसे जनता ‘थके हुए’ राजनीतिक चेहरों के बजाय एक ताज़गी के रूप में देख सकती है।

लेकिन इस विचारधारा में भी खतरे हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि अब तक निशांत ने नेता के तौर पर कुछ भी नहीं किया है, इसलिए उनके बारे में कोई राय बनाना जल्दबाज़ी होगी। उनकी लोकप्रियता का आधार अभी केवल नाम और पारिवारिक पहचान है। यही नहीं, बीजेपी के पास बिहार में कोई सर्वमान्य मुख्यमंत्री चेहरा नहीं है, और वो राजस्थान या मध्य प्रदेश की तरह बिहार में नेतृत्व परिवर्तन का प्रयोग नहीं कर सकती, जिससे एनडीए के भीतर बेचैनी और बढ़ गई है।
राजद और कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियों के लिए निशांत कुमार का उभार कुछ हद तक राहत भी हो सकता है। अगर जेडीयू पारिवारिक उत्तराधिकार को अपनाती है, तो राजद पर लगने वाला वंशवाद का आरोप कम प्रभावशाली हो जाएगा। इस संदर्भ में पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी का बयान उल्लेखनीय है, जिसमें उन्होंने कहा, अगर, नीतीश कुमार से बिहार नहीं संभल रहा, तो अपने बेटे को ले आएं, वही राज्य चलाएंगे।

यह बयान जितना व्यंग्यात्मक था, उतना ही राजनीति के उस अनकहे नियम को उजागर करता है जिसमें नेतृत्व की वैधता केवल योग्यता से नहीं, बल्कि परंपरा और वंशानुगत शक्ति से भी तय होती है। निशांत कुमार की उपस्थिति को लेकर जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने स्पष्ट किया कि निशांत राजनीति में कब आएंगे यह फैसला खुद उनका या उनके पिता का होगा। लेकिन जिस तरह पार्टी के भीतर, गठबंधन में और मीडिया में निशांत की चर्चा शुरू हुई है, वह इस बात का संकेत है कि जेडीयू उन्हें नेतृत्व के प्रतीक के रूप में सामने लाना चाहती है, भले ही अभी उनके पास अनुभव न हो, लेकिन वह भावनात्मक, जातीय और वैचारिक उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार्य हो सकते हैं।
बिहार में कोयरी-कुर्मी जातियों का जो परंपरागत वोट बैंक जेडीयू के साथ रहा है, उसे निशांत के नेतृत्व में बनाए रखने की भी उम्मीद जताई जा रही है। यह सामाजिक समीकरण ही जेडीयू की राजनीतिक बुनियाद है, और उसे मजबूत बनाए रखने के लिए एक भरोसेमंद नाम और चेहरा जरूरी है। कुल मिलाकर, बिहार की राजनीति में जहां सब कुछ संभावनाओं पर टिका है, वहां निशांत कुमार का उभार भी एक संभावित, लेकिन अनिश्चित कथा बन गया है। अभी उन्होंने न तो कोई सार्वजनिक अभियान चलाया है, न ही पार्टी में कोई पद लिया है। लेकिन राजनीतिक सूझबूझ रखने वाले विश्लेषकों की मानें, तो जेडीयू को अब नीतीश के बाद की तैयारी करनी ही होगी, और अगर कोई चेहरा स्वाभाविक उत्तराधिकारी की तरह दिखता है, तो वो निशांत ही हैं।

हालांकि राजनीति केवल नाम और वंश पर नहीं टिकती, उसके लिए ज़मीन पर मेहनत, नेतृत्व की क्षमता, जनता से संवाद और संकट प्रबंधन का कौशल भी चाहिए। आने वाले महीनों में अगर निशांत इन क्षेत्रों में कोई सक्रियता दिखाते हैं, तो वे सचमुच जेडीयू के ‘उत्तराधिकारी’ बन सकते हैं। लेकिन अगर वे उसी लो-प्रोफाइल शैली में बने रहते हैं, तो यह संभावना केवल चर्चा तक ही सीमित रह जाएगी। फिलहाल, बिहार के राजनीतिक भविष्य का सवाल एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुका है जहां एक नया चेहरा ज़रूरी है, सवाल यह है कि क्या निशांत कुमार वह चेहरा बन पाएंगे या जेडीयू एक बार फिर नेतृत्व शून्यता का शिकार होगी? समय इसका उत्तर देगा।

