क्या ममता बनर्जी तलाश रही बीजेपी के हिंदुत्व की काट ?
देवानंद सिंह
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर धर्म, संस्कृति और चुनावी रणनीति के चौराहे पर खड़ी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा 30 अप्रैल को दीघा में उद्घाटित ‘जगन्नाथ धाम’ मंदिर न केवल धार्मिक महत्व का प्रतीक बन गया है, बल्कि यह अब सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष का केंद्र भी बन चुका है। मंदिर निर्माण, नामकरण, प्रसाद वितरण और उसके पीछे की राजनीतिक रणनीति इन सभी मुद्दों ने मिलकर इस प्रोजेक्ट को विशुद्ध धार्मिक योजना से एक सियासी अखाड़े में बदल दिया है।

ओडिशा के प्रसिद्ध जगन्नाथ पुरी मंदिर की तर्ज पर बने दीघा के इस मंदिर पर राज्य सरकार ने करीब 250 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इस खर्च और मंदिर की प्रेरणा ने इसे एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में सत्तारूढ़ दल की ‘धार्मिक प्राथमिकताओं’ का प्रतीक बना दिया है, जिसने स्वाभाविक रूप से सवाल उठाए हैं कि क्या यह राज्य के संसाधनों का सही इस्तेमाल है? क्या यह धर्म और राज्य के बीच सीमारेखा के उल्लंघन का मामला है? बीजेपी और अन्य विपक्षी दलों जैसे कांग्रेस और माकपा ने इस पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि एक लोकतांत्रिक सरकार को सार्वजनिक धन का उपयोग धार्मिक ढांचे के निर्माण के लिए नहीं करना चाहिए। विशेष रूप से तब, जब राज्य में स्वास्थ्य, शिक्षा, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं जैसे क्षेत्रों में अनेक चुनौतियां बरकरार हैं।

मंदिर के नाम और वहां स्थापित प्रतिमाओं को लेकर भी विवाद कम नहीं हुआ है। ओडिशा सरकार ने राज्य सरकार को पत्र भेजकर मंदिर के ‘जगन्नाथ, नामकरण पर आपत्ति जताई। यह स्पष्ट संकेत है कि यह धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत अब क्षेत्रीय अस्मिता और परंपरा की दावेदारी का मुद्दा बन गई है। कुछ आरोपों के मुताबिक दीघा मंदिर की मूर्ति के निर्माण में पुरी मंदिर की लकड़ी का उपयोग हुआ है, जिससे यह प्रतीत होता है कि पश्चिम बंगाल सरकार न केवल प्रतीकात्मक समानता बल्कि आध्यात्मिक अधिकार के स्तर पर भी पुरी मंदिर के समकक्ष एक वैकल्पिक केंद्र बनाने का प्रयास कर रही है।

17 जून से ममता सरकार ने इस मंदिर के प्रसाद को ‘घर-घर’ पहुंचाने की योजना शुरू की। हिडको, जिसने मंदिर का निर्माण किया है, अब प्रसाद वितरण की इस महायोजना को कार्यान्वित कर रही है। करीब 20 रुपये प्रति पैकेट की लागत से 1.4 करोड़ घरों में इसे पहुंचाया जा रहा है, यानी कुल लागत लगभग 42 करोड़ रुपए होगा। ऐसे में, यहां सवाल उठते हैं कि क्या यह धार्मिक सेवा है, लोक कल्याण योजना है या फिर एक मास अपील आधारित राजनीतिक दांव?

बीजेपी ने आरोप लगाया कि यह सरकारी फंड की बर्बादी है। शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं ने इसे हिंदू भावनाओं से खिलवाड़ बताते हुए कहा कि दीघा के मुस्लिम दुकानदारों से मिठाई लेकर उसे प्रसाद के तौर पर वितरित करना तुष्टिकरण की चरम सीमा है। बीजेपी के लिए पश्चिम बंगाल एक असहज लेकिन महत्वपूर्ण चुनावी रणभूमि बन चुका है। राज्य में हिंदुत्व की राजनीति को मजबूत करने के प्रयासों में मंदिर, राम नवमी, और धार्मिक जुलूसों का उपयोग हो रहा है। ऐसे में, ममता बनर्जी का यह मंदिर और प्रसाद योजना विपक्ष के उस नैरेटिव को सीधे चुनौती देती है जिसमें टीएमसी को केवल अल्पसंख्यकों की समर्थक पार्टी के रूप में पेश किया जाता रहा है।

टीएमसी का दावा है कि भगवान का प्रसाद सबके लिए होता है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और नगर विकास मंत्री फिरहाद हकीम ने स्पष्ट किया कि प्रसाद सभी धर्मों के लोगों को दिया जा रहा है और इसमें कोई भेदभाव नहीं हो रहा। उनका यह भी कहना था कि बीजेपी धार्मिक प्रतीकों को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है।
दिलचस्प बात यह है कि इस सियासी शोर-शराबे से आम जनता लगभग अछूती दिख रही है। सिंगूर से लेकर भांगड़ तक, मुस्लिम नामों वाले परिवारों ने भी प्रसाद के पैकेट को बिना किसी झिझक के स्वीकार किया है। मुस्लिम महिलाएं कहती हैं, “सरकार ने भेजा है, तो लेने में क्या दिक्कत है?” इससे स्पष्ट है कि राज्य की जनता के लिए यह विवाद कोई गंभीर चिंता का विषय नहीं है। वह उसे सरकारी सेवा की तरह देख रही है, न कि धार्मिक पहचान के रूप में।

इस्कॉन के प्रवक्ता कहते हैं कि मंदिर में भगवान को अर्पित किया गया लगभग 300 किलो खोया सभी जिलों में भेजा गया है, जिससे मिठाई बनाई गई और फिर उसे पैकेट में भरकर वितरित किया गया। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, राज्य में हिंदुत्व की राजनीति के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए ममता बनर्जी यह रणनीति अपना रही हैं। मंदिर निर्माण और प्रसाद वितरण, दोनों एक प्रकार का संदेश हैं कि तृणमूल कांग्रेस भी धार्मिक आस्थाओं को समझती और सम्मान देती है, लेकिन यह सवाल भी उतना ही ज़रूरी है कि जब राज्य आर्थिक तंगी, बेरोजगारी और मूलभूत ढांचागत समस्याओं से जूझ रहा है, तब क्या यह व्यय उचित है?

विशेषज्ञों के अनुसार, इस पहल को ममता बनर्जी की एक रणनीतिक राजनीतिक पारी का हिस्सा मानती हैं। उनके अनुसार, ममता अब ‘अल्पसंख्यकों की हितैषी’ वाली छवि को संतुलित करने की कोशिश कर रही हैं ताकि हिंदू वोट बैंक को भी लुभाया जा सके। विशेषज्ञों ने कहा, घर-घर प्रसाद वितरण भी इसी राजनीतिक संतुलन साधने का हिस्सा है।
कुल मिलाकर, दीघा का जगन्नाथ मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है। यह ममता बनर्जी की एक बड़ी राजनीतिक योजना का प्रतीक बन चुका है, एक ऐसा प्रतीक जो न केवल बीजेपी के हिंदुत्ववादी एजेंडे को टक्कर देता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि तृणमूल कांग्रेस अब धार्मिक राजनीति को केवल आलोचना के बजाय, एक रणनीतिक उपकरण के रूप में अपना रही है। आने वाले विधानसभा चुनावों में
यह योजना कितनी सफल होगी, यह तो समय बताएगा, लेकिन इतना तय है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति अब धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक पहचान के बीच के धुंधले होते अंतर की तरफ एक निर्णायक मोड़ ले चुकी है, और इस मोड़ पर ममता बनर्जी, मंदिर के प्रसाद के सहारे, अपनी धर्मनिरपेक्षता की नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश कर रही हैं।

