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    Home » कोल्हान में भाजपा की रणनीति दरकिनार करना नहीं दिग्गजों को ‘मार्गदर्शक भूमिका’ में सीमित करना?
    Breaking News Headlines राष्ट्रीय संपादकीय

    कोल्हान में भाजपा की रणनीति दरकिनार करना नहीं दिग्गजों को ‘मार्गदर्शक भूमिका’ में सीमित करना?

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीJanuary 17, 2026No Comments3 Mins Read
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    कोल्हान में भाजपा की रणनीति दरकिनार करना नहीं, दिग्गजों को ‘मार्गदर्शक भूमिका’ में सीमित करना?
    देवानंद सिंह
    झारखंड भाजपा द्वारा राष्ट्रीय परिषद के लिए 21 नाम भेजे जाने को केवल संगठनात्मक सूची मानना राजनीतिक दृष्टि से अधूरा आकलन होगा। इससे जुड़ा सबसे अहम तथ्य यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास, अर्जुन मुंडा, चंपई सोरेन और मधु कोड़ा को राष्ट्रीय परिषद में शामिल किया जाना, उन्हें पूरी तरह हाशिये पर डालने का संकेत नहीं देता।
    बल्कि यह कदम इस बात की ओर इशारा करता है कि भाजपा राष्ट्रीय नेतृत्व इन दिग्गज नेताओं को सीधे संगठनात्मक संघर्ष की अग्रिम पंक्ति से हटाकर, नीति और मार्गदर्शन की भूमिका में देखना चाहता है। दूसरे शब्दों में, यह उन्हें “सक्रिय सत्ता-संघर्ष” से बाहर कर, एक तरह से मार्गदर्शक मंडल जैसी स्थिति में रखने की रणनीति भी हो सकती है—हालांकि औपचारिक रूप से ऐसा कोई मंडल घोषित नहीं किया गया है।

     

     

    राष्ट्रीय परिषद में भेजना: सम्मान या सीमांकन?

    राष्ट्रीय परिषद भाजपा की सर्वोच्च नीति-निर्धारण संस्था है। वहां भेजा जाना अपने आप में सम्मान की बात है। लेकिन राजनीतिक व्यवहार में यह भी देखा गया है कि कई राज्यों में पुराने और प्रभावशाली नेताओं को राष्ट्रीय मंच देकर, राज्यस्तरीय निर्णय प्रक्रिया से दूर रखा जाता है, ताकि संगठनात्मक नियंत्रण नए नेतृत्व के हाथ में रहे।

     

    झारखंड के मामले में भी यही फार्मूला लागू होता दिख रहा है। प्रदेश अध्यक्ष का चेहरा बदलना, संगठन चुनावों में एकल नामांकन और अब राष्ट्रीय परिषद की सूची—ये सभी संकेत देते हैं कि पार्टी राज्य में नई टीम को खुला मैदान देना चाहती है, जबकि पुराने नेता “ऊपर” रहकर दिशा-निर्देश तक सीमित रहेंगे।

     

     

    कोल्हान क्षेत्र में इन चारों नेताओं की अपनी-अपनी सामाजिक और राजनीतिक पकड़ रही है। ऐसे में उन्हें पूरी तरह दरकिनार करना भाजपा के लिए आत्मघाती हो सकता था। राष्ट्रीय परिषद में शामिल कर पार्टी ने यह संतुलन साधने की कोशिश की है कि
    न तो दिग्गजों को अपमानित किया जाए,
    और न ही उन्हें राज्य की दैनिक राजनीति में निर्णायक भूमिका दी जाए।

     

    यह रणनीति बताती है कि भाजपा व्यक्तित्व आधारित राजनीति से हटकर संगठनात्मक नियंत्रण को प्राथमिकता दे रही है।

    अर्जुन मुंडा और चंपई सोरेन जैसे आदिवासी चेहरों को राष्ट्रीय परिषद में स्थान देकर भाजपा यह संदेश भी देना चाहती है कि वह आदिवासी नेतृत्व को नकार नहीं रही। लेकिन साथ ही यह भी साफ है कि आदिवासी राजनीति की नई परिभाषा और नया चेहरा गढ़ने की कोशिश जारी है।

     

     

    बहरहाल झारखंड भाजपा का यह कदम दिग्गज नेताओं को “किनारे लगाने” से ज्यादा उन्हें संगठनात्मक मार्गदर्शक की भूमिका में सीमित करने की रणनीति जैसा दिखता है। यह सम्मानजनक विदाई नहीं, बल्कि नियंत्रित सक्रियता का मॉडल है—जहां अनुभव का उपयोग होगा, लेकिन निर्णय का अधिकार नई पीढ़ी के हाथ में रहेगा।

     

    अब असली सवाल यह नहीं कि भाजपा को इन नेताओं की जरूरत है या नहीं, बल्कि यह है कि नई टीम उनके अनुभव का कितना उपयोग कर पाती है और कोल्हान जैसे क्षेत्रों में भरोसा बनाए रख पाती है या नहीं।

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