ईरान मिडिल ईस्ट तनाव इन दिनों अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है। हाल के सैन्य हमलों और जवाबी कार्रवाइयों के बीच क्षेत्र में युद्ध का खतरा बढ़ गया है।
देवानंद सिंह
मध्य-पूर्व एक बार फिर युद्ध और कूटनीति के चौराहे पर खड़ा दिखाई दे रहा है। हाल के दिनों में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरानी ठिकानों पर किए गए हमलों के बाद क्षेत्र में जिस तरह की सैन्य टकराव की स्थिति बनी, उसने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया। इसी पृष्ठभूमि में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन का पड़ोसी देशों से माफी मांगना और मिसाइल तथा ड्रोन हमले रोकने का संकेत देना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और कूटनीतिक कदम माना जा रहा है।
पेजेश्कियन ने स्पष्ट कहा है कि जब तक पड़ोसी देशों की ओर से ईरान पर हमला नहीं होता, तब तक ईरान उन पर किसी तरह का सैन्य हमला नहीं करेगा। उन्होंने उन देशों से सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी है, जिन पर ईरान ने हाल के संघर्ष के दौरान हमले किए थे। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, इस फैसले को ईरान की अस्थायी नेतृत्व परिषद की मंजूरी भी मिल चुकी है। यह बयान ऐसे समय आया है जब पूरे क्षेत्र में कई दिनों से लगातार तनाव, हमले और जवाबी कार्रवाई का दौर जारी था।
दरअसल, मध्य-पूर्व लंबे समय से भू-राजनीतिक संघर्षों का केंद्र रहा है। अमेरिका, इजरायल, ईरान और खाड़ी देशों के बीच शक्ति संतुलन की राजनीति हमेशा से यहां के हालात को जटिल बनाती रही है। पिछले सप्ताह जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई रणनीतिक ठिकानों पर हमले किए, तो यह टकराव अचानक बेहद गंभीर रूप ले बैठा। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई समेत कई लोगों के मारे जाने की खबरों ने स्थिति को और विस्फोटक बना दिया।
इसके बाद ईरान ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी और क्षेत्र में अमेरिकी तथा इजरायली हितों से जुड़े कई स्थानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इन घटनाओं ने पूरे मध्य-पूर्व में व्यापक युद्ध की आशंका को जन्म दे दिया। खाड़ी क्षेत्र के कई देश, जो पहले से ही सुरक्षा और आर्थिक अस्थिरता के जोखिम से जूझ रहे हैं, अचानक खुद को इस संघर्ष की चपेट में पाते दिखे। यही कारण है कि अब ईरान के राष्ट्रपति द्वारा दिया गया यह बयान क्षेत्रीय राजनीति में एक संभावित मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।
पेजेश्कियन का यह कहना कि “ईरान नहीं चाहता कि यह संकट पूरे क्षेत्र में फैले”, केवल एक औपचारिक कूटनीतिक बयान नहीं है। इसके पीछे कई व्यावहारिक कारण भी हैं। पहला, लगातार युद्ध की स्थिति से ईरान की अर्थव्यवस्था और आंतरिक स्थिरता पर गंभीर दबाव पड़ सकता है। पहले से ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा ईरान लंबे समय तक बड़े पैमाने पर सैन्य संघर्ष को झेलने की स्थिति में नहीं है।
दूसरा, खाड़ी देशों के साथ संबंधों को पूरी तरह बिगाड़ना ईरान के लिए रणनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों में ईरान ने सऊदी अरब समेत कई खाड़ी देशों के साथ संबंध सुधारने की दिशा में कदम उठाए थे। ऐसे में यदि संघर्ष पूरे क्षेत्र में फैलता है, तो वह कूटनीतिक प्रयास भी कमजोर पड़ सकते हैं।
हालांकि, इस बयान के साथ ही ईरान ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिका या इजरायल के दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने अपने भाषण में कहा कि ईरानी जनता कभी सरेंडर नहीं करेगी और देश अपनी रक्षा करने का अधिकार रखता है। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग ईरान के आत्मसमर्पण की उम्मीद कर रहे हैं, उन्हें अपनी यह इच्छा अपने साथ कब्र में ले जानी होगी।
इस बयान से यह साफ हो जाता है कि ईरान फिलहाल दोहरी रणनीति अपना रहा है—एक ओर वह पड़ोसी देशों के साथ तनाव कम करना चाहता है, वहीं दूसरी ओर वह अपने विरोधियों के सामने कमजोरी का संदेश भी नहीं देना चाहता। यह संतुलन बनाना किसी भी देश के लिए आसान नहीं होता, विशेषकर तब जब युद्ध जैसी परिस्थितियां पैदा हो चुकी हों।
मध्य-पूर्व की राजनीति में अक्सर देखा गया है कि युद्ध और शांति के बीच की दूरी बहुत कम होती है। एक छोटी सी घटना भी बड़े संघर्ष का रूप ले सकती है। ऐसे में ईरान द्वारा उठाया गया यह कदम यदि ईमानदारी से लागू किया जाता है, तो यह पूरे क्षेत्र में तनाव कम करने की दिशा में एक सकारात्मक पहल साबित हो सकता है।
लेकिन यह भी सच है कि केवल एक बयान से हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हो जाएंगे। इसके लिए सभी पक्षों को संयम और संवाद का रास्ता अपनाना होगा। अमेरिका, इजरायल और खाड़ी देशों को भी यह समझना होगा कि लगातार सैन्य कार्रवाई से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। कूटनीति और बातचीत ही वह रास्ता है, जो क्षेत्र में स्थायी शांति ला सकता है।
आज दुनिया पहले से ही कई संकटों का सामना कर रही है—यूक्रेन युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा संकट और वैश्विक राजनीतिक तनाव। ऐसे में यदि मध्य-पूर्व में भी बड़ा युद्ध छिड़ता है, तो उसका असर केवल इस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा।
इस दृष्टि से देखा जाए तो ईरान के राष्ट्रपति का यह बयान केवल क्षेत्रीय राजनीति का मुद्दा नहीं है, बल्कि वैश्विक स्थिरता से भी जुड़ा हुआ है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले दिनों में ईरान और उसके विरोधी देश इस स्थिति को किस दिशा में ले जाते हैं।
यदि सभी पक्ष संयम बरतते हैं और संवाद को प्राथमिकता देते हैं, तो यह संकट शांति की दिशा में एक नया अवसर भी बन सकता है। लेकिन यदि आरोप-प्रत्यारोप और सैन्य कार्रवाई का सिलसिला जारी रहा, तो मध्य-पूर्व एक बार फिर लंबे और विनाशकारी संघर्ष के दौर में प्रवेश कर सकता है।
यही कारण है कि इस समय सबसे बड़ी जरूरत है विवेक, कूटनीति और शांति की। क्योंकि युद्ध चाहे किसी भी पक्ष का हो, उसकी सबसे बड़ी कीमत हमेशा आम जनता को ही चुकानी पड़ती है।

