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    Home » अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026: नारी शक्ति का नया युग और वास्तविक चुनौतियां
    अन्तर्राष्ट्रीय धर्म मेहमान का पन्ना संपादकीय

    अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026: नारी शक्ति का नया युग और वास्तविक चुनौतियां

    Devanand SinghBy Devanand SinghMarch 8, 2026Updated:March 8, 2026No Comments7 Mins Read
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    भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता
    अंतरराष्ट्रीय-महिला-दिवस
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    अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026 नारी शक्ति, समानता और महिलाओं के अधिकारों पर विचार करने का महत्वपूर्ण अवसर है।

    -ः ललित गर्ग:-

    मानव सभ्यता के विकास की कथा में यदि किसी शक्ति ने सबसे अधिक सृजन किया है, तो वह नारी शक्ति है। वह जीवन की जननी है, संस्कृति की वाहक है और समाज की संवेदनशील आत्मा है। भारतीय परंपरा ने नारी को केवल एक सामाजिक भूमिका तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे ‘माता’ के रूप में सर्वोच्च आदर दिया। ‘मातृदेवो भवः’ की वाणी से लेकर ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ की घोषणा तक हमारी संस्कृति में नारी के प्रति श्रद्धा का अद्वितीय भाव दिखाई देता है। यही कारण है कि भारत में धरती, गौ और मातृभूमि तक को ‘माता’ कहकर संबोधित किया गया। किन्तु विडम्बना यह है कि जिस समाज ने नारी को देवी का दर्जा दिया, उसी समाज में आज भी नारी असुरक्षा, भेदभाव और हिंसा का सामना कर रही है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026 हमें केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं देता, बल्कि यह अवसर देता है कि हम नारी की वास्तविक स्थिति का गंभीर आत्ममंथन करें। विश्व स्तर पर किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि नारी की स्थिति में प्रगति अवश्य हुई है, किन्तु समानता, सुरक्षा एवं स्वतंत्रता की यात्रा अभी लंबी है। विश्व आर्थिक मंच की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2025 के अनुसार विश्व में लैंगिक समानता का लगभग 68.8 प्रतिशत अंतर ही समाप्त हो पाया है, अर्थात् अभी भी लगभग एक तिहाई अंतर शेष है। आर्थिक भागीदारी के क्षेत्र में यह अंतर सबसे अधिक है, जहाँ समानता केवल लगभग 61 प्रतिशत तक ही पहुँची है।
    वर्ल्ड इकनोमिक फोरम कि स्थिति बताती है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में तो महिलाएँ लगभग बराबरी के स्तर तक पहुँच गई हैं, परंतु आर्थिक अवसरों और राजनीतिक नेतृत्व में अभी भी उनकी भागीदारी सीमित है। वैश्विक स्तर पर महिलाएँ कुल कार्यबल का लगभग 42 प्रतिशत ही हैं और शीर्ष प्रबंधकीय पदों पर उनकी हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई के आसपास है। भारत में भी स्थिति मिश्रित है। एक ओर भारतीय महिलाएँ अंतरिक्ष, विज्ञान, सेना, राजनीति और प्रशासन में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर श्रम बाजार में उनकी भागीदारी अभी भी कम है। हाल के आँकड़ों के अनुसार भारत में महिला श्रम भागीदारी दर लगभग 32 प्रतिशत है और बड़ी संख्या में महिलाएँ घरेलू दायित्वों के कारण रोजगार से बाहर रहती हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड के यह आँकड़े केवल संख्या नहीं हैं, यह समाज की संरचना, सोच और अवसरों की असमानता को उजागर करते हैं। आज दुनिया के अनेक देशों में महिलाएँ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, वैज्ञानिक, सैन्य अधिकारी और उद्योगपति के रूप में नेतृत्व कर रही हैं। भारत में भी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, वैज्ञानिक और फाइटर पायलट के रूप में महिलाओं की उपस्थिति इस परिवर्तन का प्रमाण बनी है और बन रही है। किंतु इसके साथ यह भी सत्य है कि दुनिया में अभी भी केवल सीमित देशों में ही महिलाएँ सर्वोच्च राजनीतिक पदों पर हैं और समान वेतन का प्रश्न अभी भी अधूरा है। कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार महिलाओं को समान कार्य के लिए पुरुषों की तुलना में औसतन कम वेतन मिलता है। एक और चिंताजनक तथ्य यह है कि संघर्ष, युद्ध और संकट की स्थितियों का सबसे अधिक दुष्प्रभाव महिलाओं पर पड़ता है। हाल के वैश्विक अध्ययनों के अनुसार 2024 में लगभग 67 करोड़ महिलाएँ ऐसे क्षेत्रों में रह रही थीं जो किसी न किसी प्रकार के हिंसक संघर्ष से प्रभावित थे।
    नये युग की समस्याएं जैसे जलवायु परिवर्तन, युद्ध, आतंकवाद, गरीबी और डिजिटल असमानता भी महिलाओं के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी कर रही हैं। यदि इन समस्याओं पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले दशकों में करोड़ों महिलाएँ और लड़कियाँ अत्यधिक गरीबी की ओर धकेली जा सकती हैं। इतिहास के पन्ने यह भी बताते हैं कि जब-जब समाज संकट में पड़ा, तब-तब नारी शक्ति ने असाधारण साहस का परिचय दिया। स्वतंत्रता संग्राम में रानी चेनम्मा, बेगम हजरत महल, रानी अवन्तीबाई, सरोजिनी नायडू और दुर्गा भाभी जैसी वीरांगनाओं ने यह सिद्ध किया कि नारी केवल करुणा की प्रतिमा नहीं, बल्कि संघर्ष और साहस की भी प्रतीक है। लेकिन इतिहास के इन गौरवपूर्ण अध्यायों के बावजूद सामाजिक वास्तविकता कई बार पीड़ादायक दिखाई देती है। दहेज, भू्रण हत्या, घरेलू हिंसा, मानव तस्करी और यौन अपराध आज भी दुनिया के अनेक समाजों में मौजूद हैं। यह केवल कानून का नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता का प्रश्न है। दरअसल नारी समस्या का मूल कारण केवल बाहरी संरचनाएँ नहीं हैं, बल्कि वह सोच है जिसने सदियों तक नारी को ‘कमजोर’ मानकर उसकी क्षमता को सीमित करने का प्रयास किया।
    जब समाज नारी को केवल भूमिका से जोड़ता है, व्यक्ति के रूप में नहीं देखता, तभी असमानता जन्म लेती है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026 का वैश्विक संदेश भी इसी दिशा में संकेत करता है- ‘‘सभी महिलाओं और लड़कियों के लिए अधिकार, न्याय और वास्तविक कार्रवाई।’’ यह संदेश हमें याद दिलाता है कि आज भी दुनिया में महिलाओं को पुरुषों के समान कानूनी अधिकार पूरी तरह प्राप्त नहीं हैं और औसतन उन्हें पुरुषों के मुकाबले लगभग 64 प्रतिशत ही कानूनी अधिकार प्राप्त हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ कि यह स्थिति हमें सोचने के लिए बाध्य करती है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन कानूनों को सामाजिक चेतना में बदलना भी आवश्यक है। नारी सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ केवल अधिकार देना नहीं है, बल्कि अवसर, सम्मान और निर्णय लेने की स्वतंत्रता देना है। शिक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल साक्षरता, आर्थिक स्वावलंबन और राजनीतिक भागीदारी, ये पाँच स्तंभ नारी सशक्तिकरण की वास्तविक नींव हैं। परंतु इस परिवर्तन की शुरुआत घर से ही होगी। यदि परिवार में बेटी और बेटे को समान अवसर मिलते हैं, यदि शिक्षा में भेदभाव समाप्त होता है, यदि विवाह और दहेज जैसी कुप्रथाओं को समाज स्वयं अस्वीकार करता है, तभी नारी की वास्तविक मुक्ति संभव है।
    महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उल्लेखनीय कदम उठाये हैं। चाहे उज्ज्वला योजना के द्वारा उन्हें गैस सिलिंडर दिलाना हो, गावों में घरों और शौचालय का निर्माण हो या नारी शक्ति वंदन अधिनियम को संसद में पास कराना। आज दुनिया के सभी देश इस बात को मान रहे है की मोदी के नेतृत्व में भारत की महिलाएं बहुत आगे बढ़ रही है। खेल जगत से लेकर मनोरंजन जगत तक और राजनीति से लेकर सैन्य व रक्षा तक में महिलाएं बड़ी भूमिका में हैं। बात भारतीय या अभारतीय नारी की नहीं, बल्कि उसके प्रति दृष्टिकोण की है। आवश्यकता इस दृष्टिकोण को बदलने की है, जरूरत सम्पूर्ण विश्व में नारी के प्रति उपेक्षा एवं प्रताड़ना को समाप्त करने की है। इस दिवस की सार्थकता तभी है जब महिलाओं को विकास में सहभागी ही न बनाये बल्कि उनके अस्तित्व एवं अस्मिता को नौंचने की वीभत्सताओं एवं त्रासदियों पर विराम लगे, ऐसा वातावरण बनाये।
    नारी को भी अपने भीतर की शक्ति को पहचानना होगा। इतिहास गवाह है कि जब नारी ने अपने आत्मबल को पहचाना है, तब समाज की दिशा बदल गई है। शिक्षा और आत्मविश्वास नारी के लिए वही भूमिका निभाते हैं जो प्रकाश अंधकार के लिए करता है। आज की नारी केवल अधिकारों की मांग करने वाली नहीं, बल्कि परिवर्तन की निर्माता है। वह विज्ञान में शोध कर रही है, आकाश में विमान उड़ा रही है, संसद में कानून बना रही है, और समाज में नेतृत्व कर रही है। फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि नारी सम्मान का प्रश्न केवल महिलाओं का नहीं, बल्कि पूरे समाज की सभ्यता का प्रश्न है। जिस समाज में नारी सुरक्षित, सम्मानित और आत्मनिर्भर होती है, वही समाज वास्तव में विकसित और मानवीय कहलाता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि नारी को सम्मान देने का कार्य केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि पूरे वर्ष की सामाजिक चेतना होना चाहिए। जब समाज यह स्वीकार कर लेगा कि नारी केवल परिवार की आधारशिला नहीं, बल्कि भविष्य की निर्माता है, तब वह दिन दूर नहीं होगा जब ‘नारी सशक्तिकरण’ शब्द की आवश्यकता ही समाप्त हो जाएगी-क्योंकि नारी स्वाभाविक रूप से सशक्त होगी और तब शायद दुनिया सचमुच उस आदर्श को जी पाएगी, जिसे भारतीय संस्कृति ने हजारों वर्ष पहले कहा था-“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।”

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