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    Home » ब्रिक्स में भारत की कूटनीतिक धमक, अब घोषणापत्र नहीं परिणाम की बारी
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    ब्रिक्स में भारत की कूटनीतिक धमक, अब घोषणापत्र नहीं परिणाम की बारी

    Devanand SinghBy Devanand SinghSeptember 14, 2026No Comments4 Mins Read
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    भारत की कूटनीतिक
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    लेखक: देवानंद सिंह

    नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का साझा घोषणापत्र सर्वसम्मति से स्वीकार होना भारत की कूटनीतिक क्षमता का स्पष्ट प्रमाण है। दुनिया जब युद्ध, आर्थिक प्रतिबंध, व्यापारिक तनाव और बदलते शक्ति-संतुलन के दौर से गुजर रही है, तब अलग-अलग हितों वाले देशों को एक साझा दस्तावेज पर सहमत कराना सामान्य उपलब्धि नहीं है। खासकर तब, जब पश्चिम एशिया का संघर्ष ब्रिक्स के भीतर भी मतभेदों की जमीन तैयार कर रहा हो। भारत ने इन मतभेदों के बीच संवाद का रास्ता निकालकर यह संदेश दिया है कि वैश्विक राजनीति में उसकी भूमिका अब केवल दर्शक की नहीं, बल्कि दिशा तय करने वाले देश की है।

    नई दिल्ली घोषणापत्र पर विदेशी पत्रकारों की सकारात्मक प्रतिक्रिया इस बदलते कूटनीतिक परिदृश्य की पुष्टि करती है। किसी ने इसे बड़ी उपलब्धि कहा तो किसी ने अच्छा कदम। चीन के पत्रकार ने वैश्विक शासन, शांति और व्यावहारिक सहयोग को इसकी प्रमुख विशेषता माना, जबकि मिस्र की पत्रकार ने आतंकवाद के खिलाफ बिना दोहरे मापदंड के रुख को महत्वपूर्ण बताया। इन प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है कि भारत में आयोजित यह सम्मेलन केवल औपचारिक बैठक नहीं रहा, बल्कि दुनिया की नजरें इसकी कार्यवाही और भारत की भूमिका पर टिकी रहीं।

    फिर भी उत्सव से आगे बढ़कर असली सवाल पूछना जरूरी है। घोषणापत्र में पश्चिम एशिया के संघर्ष, आतंकवाद, एकतरफा प्रतिबंध और विकासशील देशों के हितों जैसे गंभीर मुद्दों का उल्लेख है, लेकिन क्या केवल चिंता व्यक्त करने और संवाद की अपील से इन समस्याओं का समाधान होगा? इंडोनेशियाई पत्रकार की टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है कि घोषणापत्र अच्छा कदम जरूर है, लेकिन इसमें ठोस समाधान की कमी दिखाई देती है। यही वह कसौटी है जिस पर ब्रिक्स और भारत के नेतृत्व को आगे परखा जाएगा।

    ब्रिक्स की शक्ति उसकी बढ़ती सदस्यता में ही नहीं, बल्कि इस तथ्य में है कि इसमें दुनिया के अलग-अलग राजनीतिक और आर्थिक हितों वाले देश एक मंच पर आते हैं। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के बीच क्षेत्रीय तनाव के बावजूद सर्वसम्मति बनना बताता है कि संवाद की गुंजाइश अभी खत्म नहीं हुई है। लेकिन यही विविधता ब्रिक्स की कमजोरी भी बन सकती है, यदि सदस्य देश साझा हितों से अधिक अपने-अपने भू-राजनीतिक एजेंडे को प्राथमिकता देने लगें। इसलिए अब ब्रिक्स को बयान जारी करने वाले मंच से आगे बढ़कर ठोस आर्थिक और कूटनीतिक परिणाम देने वाला संगठन बनना होगा।

    भारत की कूटनीतिक रणनीति: आगे की राह

    भारत के लिए इस सम्मेलन का महत्व और भी बड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की मुलाकात ने द्विपक्षीय संबंधों में संवाद की संभावनाओं को फिर सामने ला दिया है। सीमा पर शांति और सौहार्द को संबंधों के विकास की आवश्यक आधारशिला बताकर भारत ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। चीन के साथ संबंधों में सुधार भारत चाहता है, लेकिन यह सुधार राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा पर स्थायी शांति की कीमत पर नहीं हो सकता। संवाद तभी सार्थक होगा, जब वह जमीन पर विश्वास बहाली में दिखाई दे।

    भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि उसने बदलती वैश्विक राजनीति में किसी एक खेमे का हिस्सा बनने के बजाय अपने हितों के अनुरूप बहुपक्षीय संतुलन कायम रखा है। रूस के साथ पुराने संबंध, अमेरिका और पश्चिम के साथ बढ़ती रणनीतिक साझेदारी तथा चीन के साथ कठिन परिस्थितियों के बावजूद संवाद—यह संतुलन भारत की बढ़ती कूटनीतिक क्षमता का परिचायक है। ब्रिक्स में भारत की सक्रिय भूमिका इसी स्वतंत्र रणनीतिक सोच का विस्तार है।

    अब अगला कदम घोषणापत्र को जमीन पर उतारना है। न्यू डेवलपमेंट बैंक जैसे संस्थानों के जरिए विकासशील देशों को वित्तीय सहायता, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, तकनीकी सहयोग और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों को व्यावहारिक रूप देना होगा। वैश्विक दक्षिण की आवाज बनने का दावा तभी सार्थक होगा, जब ब्रिक्स के फैसलों का लाभ उन देशों की अर्थव्यवस्थाओं और आम नागरिकों तक पहुंचे जो लंबे समय से वैश्विक व्यवस्था में अधिक न्यायपूर्ण हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं।

    नई दिल्ली सम्मेलन ने भारत को नेतृत्व का अवसर दिया है। अब इस अवसर को उपलब्धि में और उपलब्धि को स्थायी प्रभाव में बदलना होगा। विदेशी पत्रकारों की सराहना निश्चित रूप से उत्साह बढ़ाने वाली है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी देश की असली प्रतिष्ठा तालियों से नहीं, उसके परिणामों से तय होती है। नई दिल्ली घोषणापत्र को यदि ठोस पहलों में बदला गया तो यह केवल एक कूटनीतिक दस्तावेज नहीं रहेगा, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में वैश्विक दक्षिण के बढ़ते प्रभाव का महत्वपूर्ण अध्याय बनेगा।

    नई दिल्ली में सहमति बन गई है। अब दुनिया भारत से यह देखना चाहती है कि इस सहमति को समाधान में बदलने की क्षमता कितनी है।

    कूटनीति नई दिल्ली घोषणापत्र ब्रिक्स वैश्विक राजनीति
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