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    Home » वैश्विक न्याय के लिए जरूरी है सुरक्षा परिषद का पुनर्गठन: भारत की समान वीटो अधिकार की मांग
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    वैश्विक न्याय के लिए जरूरी है सुरक्षा परिषद का पुनर्गठन: भारत की समान वीटो अधिकार की मांग

    Devanand SinghBy Devanand SinghOctober 29, 2026No Comments3 Mins Read
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    सुरक्षा परिषद का पुनर्गठन
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    लेखक: महेन्द्र तिवारी

    संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद का पुनर्गठन आज वैश्विक न्याय और शांति की स्थापना के लिए सबसे अनिवार्य मांग बन चुकी है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 1945 में गठित इस संस्था की वर्तमान संरचना 21वीं सदी की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करती, जिससे इसकी प्रासंगिकता और निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गए हैं।

    क्यों अनिवार्य है सुरक्षा परिषद का पुनर्गठन

    वर्तमान में सुरक्षा परिषद के 15 सदस्य हैं, जिनमें चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका पांच स्थायी सदस्य हैं जिन्हें वीटो का विशेषाधिकार प्राप्त है। शेष 10 अस्थायी सदस्य दो वर्ष के लिए चुने जाते हैं। किसी भी गैर-प्रक्रियात्मक प्रस्ताव को पारित करने के लिए नौ सदस्यों के समर्थन के साथ किसी स्थायी सदस्य का नकारात्मक मत न होना आवश्यक है। यह व्यवस्था एकल देश को भी अंतरराष्ट्रीय सहमति को बाधित करने की शक्ति देती है।

    सैद्धांतिक रूप से वीटो का उद्देश्य बड़ी शक्तियों को संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था में बनाए रखना था, लेकिन व्यवहार में यह अंतरराष्ट्रीय सहमति और मानवीय संकटों पर त्वरित कार्रवाई में सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरा है। भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वतनेनी ने 26 अक्टूबर 2026 को महासभा में हुई चर्चा के दौरान स्पष्ट किया कि जब तक वीटो अधिकार अस्तित्व में है, सुधार के बाद गठित परिषद के सभी स्थायी सदस्यों को समान अधिकार मिलने चाहिए।

    भारत का रुख: समान जिम्मेदारी के साथ समान अधिकार

    भारत का तर्क है कि नए स्थायी सदस्यों को वीटो से वंचित रखकर परिषद का विस्तार करना वास्तविक सुधार नहीं होगा। इससे स्थायी सदस्यों की दो श्रेणियाँ बन जाएंगी और मौजूदा शक्तिशाली देशों का प्रभुत्व कायम रहेगा। भारत ने इसे असमानता को स्थायी रूप देने वाला कदम बताया है। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना से अब तक वीटो का इस्तेमाल 331 बार किया जा चुका है, जिनमें से अधिकांश तीन देशों द्वारा किए गए हैं, जबकि दो स्थायी सदस्यों ने साढ़े तीन दशक से वीटो का प्रयोग नहीं किया है।

    भारत दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देशों में से एक है और वैश्विक अर्थव्यवस्था, शांति अभियानों तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग में महत्वपूर्ण योगदान देता है। वह लंबे समय से स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है। जी-4 समूह (भारत, ब्राजील, जर्मनी, जापान) और अफ्रीकी देश भी व्यापक सुधार और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं। अधिक जानकारी के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद आधिकारिक वेबसाइट देखें।

    सुधार की राह में संवैधानिक चुनौतियाँ

    सबसे बड़ी संस्थागत बाधा संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 108 में निहित संशोधन प्रक्रिया है। इसके लिए महासभा में दो-तिहाई बहुमत और सभी मौजूदा पांच स्थायी सदस्यों सहित सदस्य देशों के अनुमोदन की आवश्यकता होती है। इसका अर्थ है कि जिन देशों के विशेषाधिकारों में बदलाव की बात है, उनकी सहमति के बिना सुधार लागू करना लगभग असंभव है। यही कारण है कि दशकों की चर्चा के बावजूद ठोस परिणाम नहीं निकल सका है।

    समयबद्ध वार्ता और पारदर्शिता की आवश्यकता

    भारत ने इस गतिरोध को तोड़ने के लिए समयबद्ध और ठोस वार्ता पर जोर दिया है। केवल चर्चाओं से परिणाम नहीं निकलेंगे; सदस्य देशों को लिखित प्रस्तावों, स्पष्ट समयसीमा और निश्चित लक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ना होगा। साथ ही वीटो के उपयोग में संयम, निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने पर भी विचार आवश्यक है।

    अंततः, सुरक्षा परिषद में सुधार का प्रश्न केवल भारत की सदस्यता तक सीमित नहीं है। यह उस वैश्विक व्यवस्था के भविष्य से जुड़ा है जिसमें युद्ध और शांति जैसे गंभीर निर्णय लिए जाते हैं। यदि संयुक्त राष्ट्र को विश्व समुदाय का वास्तविक प्रतिनिधि बनना है, तो उसे बदलती परिस्थितियों के अनुरूप अपनी संरचना में सुधार करना ही होगा। शक्ति और समानता, प्रतिनिधित्व और प्रभावशीलता के बीच संतुलन स्थापित करके ही संयुक्त राष्ट्र को अधिक विश्वसनीय, न्यायपूर्ण और सक्षम संस्था बनाया जा सकता है।

    भारत विदेश नीति वीटो अधिकार वैश्विक शासन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार
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