लेखक: देवानंद सिंह
लोकतंत्र में राजनीतिक मर्यादा केवल शब्दकोश की परिभाषा नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों के आचरण का वह प्रतिबिंब है जो जनमानस में विश्वास कायम रखता है। पटना में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के उस बयान—’मोदी का बाप भी जाएगा’—ने एक बार फिर इस मर्यादा को तार-तार कर दिया है। भाजपा ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत पिता का अपमान बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी और माफी की मांग की, लेकिन इस प्रकरण को केवल कांग्रेस बनाम भाजपा के संकीर्ण चश्मे से देखना समस्या की जड़ तक नहीं पहुंचाता।
राजनीतिक मर्यादा का पतन: खड़गे के बयान से उठे सवाल
विवाद का केंद्र बिंदु एक वरिष्ठ नेता की जुबान फिसलना मात्र नहीं है, बल्कि यह उस प्रवृत्ति का लक्षण है जहां व्यक्तिगत कटाक्ष को राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मान लिया गया है। खड़गे जैसे अनुभवी राजनेता, जो दशकों से सार्वजनिक जीवन में हैं, यदि ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं तो यह संकेत देता है कि राजनीतिक विमर्श का स्तर कितना गिर चुका है। भाजपा के प्रवक्ताओं ने इसे ‘संस्कारहीनता’ की पराकाष्ठा बताया, वहीं कांग्रेस ने इसे ‘भाषाई व्याख्या’ का मुद्दा बनाकर टालने का प्रयास किया।
यह पहली बार नहीं है जब संसदीय भाषा की सीमाएं लांघी गई हैं। प्रधानमंत्री मोदी स्वयं विपक्षी नेताओं के लिए ‘शहजादा’, ‘युवराज’ या ‘कांग्रेस की विधवा’ जैसे संबोधनों का प्रयोग करते रहे हैं। विपक्ष की ओर से भी ‘चौकीदार चोर है’ से लेकर ‘मौत का सौदागर’ तक के नारे गूंजते रहे हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि अमर्यादित भाषा किसी एक दल की बपौती नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था का स्थायी भाव बनती जा रही है।
क्यों देते हैं नेता विवादित बयान?
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इसके पीछे तीन प्रमुख कारक काम करते हैं:
- मीडिया अटेंशन: नीतिगत बहस की तुलना में एक विवादित टिप्पणी प्राइम टाइम और सोशल मीडिया ट्रेंड हासिल करना आसान होता है।
- कोर वोटर को साधना: कठोर भाषा समर्थक आधार में जोश भरती है और उन्हें ‘योद्धा’ होने का अहसास दिलाती है।
- मुद्दों से भटकाव: बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे जटिल सवालों से ध्यान हटाने के लिए व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप का सहारा लिया जाता है।
कानून का डर और नैतिक जिम्मेदारी
क्या नेताओं को कानून का डर नहीं रह गया है? संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 संसद व विधानसभाओं में कही गई बातों पर विशेषाधिकार देते हैं, लेकिन सदन के बाहर दिए गए बयान इस कवच से बाहर हैं। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 499-500 (मानहानि), 153ए (वैमनस्य फैलाना) और 506 (आपराधिक धमकी) जैसे प्रावधान लागू हो सकते हैं।
समस्या कानून के अभाव की नहीं, बल्कि चयनात्मक क्रियान्वयन की है। प्रभावशाली नेताओं के मामलों में पुलिस जांच, अदालती सुनवाई और फैसले की गति अक्सर संदेह के घेरे में रहती है। सामान्य नागरिक पर त्वरित कार्रवाई होती है, जबकि सत्ताधारी या प्रमुख विपक्षी नेताओं के मामले सालों तक लंबित रहते हैं। यह ‘कानून के समक्ष समानता’ (अनुच्छेद 14) की अवधारणा को कमजोर करता है।
नैतिकता बनाम कानूनी बाध्यता
कानून न्यूनतम मानक तय करता है, लेकिन राजनीति में नैतिक जिम्मेदारी का पैमाना उससे ऊंचा होना चाहिए। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था—”संविधान चाहे जितना अच्छा हो, अगर उसे चलाने वाले लोग बुरे होंगे तो संविधान बुरा साबित होगा।” आज यह कथन शब्दशः चरितार्थ हो रहा है। नेता कानून की धाराओं की आड़ लेकर नैतिक पतन को जायज ठहराने लगे हैं।
मीडिया और जनता की भूमिका
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और मतदाता—दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि वे इस गिरावट को रोकें। मीडिया अक्सर विवादित बयानों को ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बनाकर टीआरपी बटोरता है, बिना संदर्भ और तथ्य की पड़ताल के। इससे नेताओं को प्रोत्साहन मिलता है कि ‘बुरा बोलो, ज्यादा दिखो।’
जनता को भी भावनात्मक उन्माद से निकलकर ठोस सवाल पूछने होंगे: आपके क्षेत्र में सड़क कब बनेगी? अस्पताल में डॉक्टर क्यों नहीं हैं? युवाओं को रोजगार देने की ठोस योजना क्या है? जब मतदाता ‘जुबान’ नहीं ‘काम’ पर वोट देगा, तभी नेता मजबूर होंगे मर्यादा में रहने को।
समाधान की राह: संस्थागत सुधार और आत्मनियमन
चुनाव आयोग की आचार संहिता दंतविहीन साबित हुई है। इसे कानूनी दर्जा देकर उल्लंघन पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध जैसे कड़े प्रावधान जोड़ने होंगे। राजनीतिक दलों को आंतरिक लोकतंत्र मजबूत कर अपने नेताओं के लिए आचार संहिता बनानी चाहिए, जिसका उल्लंघन पर टिकट काटने या निष्कासन का प्रावधान हो।
भारत निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर आदर्श आचार संहिता के प्रावधान देखे जा सकते हैं, लेकिन इच्छाशक्ति के अभाव में ये कागजी शेर बने हुए हैं।
अंततः, सत्ता हो या विपक्ष, राजनीतिक मर्यादा सबके लिए समान होनी चाहिए। तीखी आलोचना और वैचारिक असहमति लोकतंत्र की प्राणवायु हैं, लेकिन व्यक्तिगत अपमान, परिवार पर हमला और नफरत भरी भाषा को ‘राजनीतिक चतुराई’ मानना देश के भविष्य के लिए घातक है। देश को ऐसी राजनीति चाहिए जिसमें शब्द समाधान का रास्ता खोलें, विवाद और नफरत का नहीं। कानून का भय अपनी जगह जरूरी है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है नेताओं में संवैधानिक मूल्यों के प्रति सच्ची श्रद्धा और नैतिक साहस।

