लेखक: देवानंद सिंह
भारत-बांग्लादेश सीमा की सुरक्षा केवल किसी एक राज्य का विषय नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता, आंतरिक सुरक्षा और सीमावर्ती क्षेत्रों के भविष्य से जुड़ा गंभीर राष्ट्रीय प्रश्न है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का यह कहना कि जब तक सीमाएं सुरक्षित नहीं होंगी, तब तक पश्चिम बंगाल और भारत सुरक्षित नहीं रह सकते, इसी व्यापक चिंता को रेखांकित करता है। सीमा पर बाड़ लगाने के लिए जमीन उपलब्ध कराने में कथित देरी को लेकर उन्होंने पश्चिम बंगाल की पूर्ववर्ती सरकार पर सवाल उठाए हैं। इन आरोपों की राजनीतिक व्याख्या अपनी जगह हो सकती है, लेकिन सीमा सुरक्षा की आवश्यकता पर किसी प्रकार का विवाद नहीं होना चाहिए।
भारत-बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा चुनौतियाँ
भारत-बांग्लादेश सीमा अत्यंत संवेदनशील है। इसके कई हिस्सों में भौगोलिक परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण हैं। अवैध घुसपैठ, तस्करी, मानव तस्करी और सीमा पार होने वाली अन्य आपराधिक गतिविधियों को रोकना सुरक्षा एजेंसियों के लिए लगातार चुनौती बना हुआ है। ऐसे में सीमा पर बाड़, आधुनिक निगरानी प्रणाली, पर्याप्त सुरक्षा बल और बेहतर आधारभूत संरचना समय की आवश्यकता हैं।
गृह मंत्री ने दावा किया कि सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए केंद्र ने 2014 से 1,129 एकड़ जमीन की मांग की थी और सिलीगुड़ी गलियारे की सुरक्षा के लिए भी 560 एकड़ जमीन की आवश्यकता थी। यदि ये दावे तथ्यात्मक रूप से सही हैं, तो निश्चित रूप से यह सवाल उठता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी परियोजनाओं के लिए जमीन उपलब्ध कराने में इतनी लंबी प्रक्रिया क्यों चली। लेकिन इस सवाल का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में नहीं, बल्कि पारदर्शी तथ्यों और जवाबदेही में है। गृह मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट पर संबंधित विवरण उपलब्ध हैं।
सिलीगुड़ी गलियारा भारत के रणनीतिक भूगोल में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह देश के पूर्वोत्तर राज्यों को शेष भारत से जोड़ने वाला संकरा भू-भाग है। इसकी संवेदनशीलता को देखते हुए यहां किसी भी प्रकार की सुरक्षा कमजोरी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है। इसलिए इस क्षेत्र में सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने की हर पहल का स्वागत होना चाहिए।
राज्य और केंद्र के बीच राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में सहयोग की भावना सर्वोपरि होनी चाहिए। सीमा सुरक्षा बल, सशस्त्र सीमा बल और अन्य सुरक्षा एजेंसियां किसी राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि राष्ट्र की संस्थाएं हैं। उनके कार्यक्रमों में राज्य सरकार की भागीदारी को भी राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय संस्थागत सहयोग के रूप में देखा जाना चाहिए।
शाह ने सिलीगुड़ी में 80 एकड़ भूमि पर सीमा सुरक्षा प्रशासन मुख्यालय बनाने की घोषणा की है। साथ ही सिलीगुड़ी-नई दिल्ली परिवहन गलियारे की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही है। यदि इन परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से जमीन पर उतारा जाता है तो इससे सुरक्षा के साथ-साथ सीमावर्ती क्षेत्रों के आर्थिक और परिवहन विकास को भी गति मिल सकती है।
हालांकि सीमा सुरक्षा केवल बाड़ लगाने से सुनिश्चित नहीं होगी। आधुनिक सेंसर, ड्रोन, कैमरा निगरानी, खुफिया तंत्र, स्थानीय प्रशासन और सीमा सुरक्षा बलों के बीच बेहतर समन्वय भी जरूरी है। सीमावर्ती आबादी को सुरक्षा व्यवस्था का साझेदार बनाना और उनके आर्थिक-सामाजिक हितों का ध्यान रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि सीमा सुरक्षा को चुनावी मुद्दे के रूप में इस्तेमाल करने की बजाय राष्ट्रीय सहमति का विषय बनाया जाए। केंद्र और राज्य के बीच जितना बेहतर समन्वय होगा, सुरक्षा व्यवस्था उतनी ही प्रभावी होगी।
भारत की सीमाएं केवल नक्शे पर खींची गई रेखाएं नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र की अस्मिता और संप्रभुता की सीमा हैं। इसलिए बाड़ लगाने के लिए जमीन हो, सुरक्षा मुख्यालय का निर्माण हो या संवेदनशील सिलीगुड़ी गलियारे की निगरानी हर निर्णय में राजनीति से ऊपर राष्ट्रहित होना चाहिए। आरोपों की राजनीति कुछ समय के लिए सुर्खियां बटोर सकती है, लेकिन मजबूत सीमा व्यवस्था ही देश को वास्तविक सुरक्षा दे सकती है। यही समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

