लेखक: इंद्र यादव
इंद्र यादव!मुंबई! भाइयो और बहनो, आजकल पत्रकार बनना आसान नहीं रहा। पहले लोग सोचते थे कि पत्रकार सिर्फ सच लिखता है। लेकिन अब हकीकत कुछ और है। आज का पत्रकार एक हाथ में कलम रखता है और दूसरे हाथ में झोला लेकर दुकान-दुकान, दफ्तर-दफ्तर घूमता है। क्यों? विज्ञापन लेने के लिए। क्योंकि बिना विज्ञापन के अखबार नहीं चलता। और बिना अखबार के रोटी नहीं मिलती।
सोचो जरा। एक पत्रकार सुबह उठता है। उसके दिमाग में दो सवाल घूमते हैं। पहला—आज कौन सी खबर लिखूँ जो सच हो? दूसरा—आज किस दुकानदार या कंपनी के पास जाऊँ ताकि विज्ञापन मिल जाए! दोनों सवाल एक साथ चलते हैं। और अक्सर दूसरा सवाल पहले सवाल को हरा देता है।
विज्ञापन और पत्रकारिता का रिश्ता
अब समझो मजाक क्या है। पत्रकार किसी दुकान पर जाता है विज्ञापन माँगने। दुकानदार कहता है—भाई साहब, विज्ञापन तो दे देंगे। लेकिन हमारी दुकान के बारे में कुछ बुरा मत लिखना। वरना अगले महीने विज्ञापन बंद। पत्रकार के सामने दो रास्ते होते हैं। एक—सच लिखो और भूखे रहो। दूसरा—चुप रहो या थोड़ी सी झूठ बोलो और रोटी कमाओ। ज्यादातर लोग दूसरा रास्ता चुन लेते हैं। क्योंकि पेट की आग सबसे तेज होती है।
और ये रिश्ते बनाने का खेल तो और भी मजेदार है। विज्ञापन के लिए रिश्ते बनाने पड़ते हैं। मुस्कान लगानी पड़ती है। तारीफ करनी पड़ती है। कभी-कभी झूठी तारीफ भी। फिर क्या होता है? जो रिश्ता विज्ञापन के लिए बनाया गया था, वही रिश्ता सच को दबा देता है। कोई कारखाना गंदगी फैला रहा हो, कोई अधिकारी गलत काम कर रहा हो—सब दब जाता है। क्योंकि “उन्होंने तो विज्ञापन दिया है ना!
पहले कलम का काम था आईना दिखाना। लोगों को उनकी गलतियाँ बताना। समाज को सच का चेहरा दिखाना। लेकिन आज वही कलम कई बार चेहरा चमकाने का काम करने लगी है। जैसे मेकअप आर्टिस्ट। गलती छुपाओ, खूबसूरती बढ़ाओ, और विज्ञापन का पैसा ले लो। अखबार में पढ़ो तो लगेगा सब कुछ बढ़िया चल रहा है। लेकिन सड़क पर जाकर देखो तो पता चलेगा कि हालत कुछ और है।
लोग कहते हैं—अरे छोड़ो यार, ये तो बिजनेस है। हाँ, बिजनेस है। अखबार छापने के लिए कागज चाहिए, स्याही चाहिए, मशीन चाहिए, कर्मचारियों को तनख्वाह देनी होती है। ये सब विज्ञापन के पैसे से ही चलता है। लेकिन सवाल ये है कि अखबार चलने से पत्रकारिता भी चलती है क्या! जवाब है—नहीं।
अखबार कागज का एक गुच्छा है। उस पर खबरें छपती हैं। लेकिन पत्रकारिता कुछ और चीज है। पत्रकारिता वो चीज है जो सच बोलने की हिम्मत रखती है। जो गरीब की आवाज बनती है। जो ताकतवर के सामने भी सिर नहीं झुकाती। और ये हिम्मत पैसे से नहीं आती। ये हिम्मत स्वाभिमान से आती है।
आज भी कुछ पत्रकार ऐसे हैं जो मुश्किल में भी अपनी कलम नहीं बेचते। गरीबी झेलते हैं। सत्ता के लोगों से डरते नहीं। विज्ञापनदाता के दबाव में नहीं आते। ऐसे लोगों को सलाम है। क्योंकि वही असली पत्रकार हैं। बाकी जो सिर्फ विज्ञापन के पीछे भाग रहे हैं, वो अखबार चला रहे हैं, पत्रकारिता नहीं।
आखिर में एक बात साफ समझ लो। विज्ञापन से अखबार चल सकता है। छापाखाना चल सकता है। ऑफिस का किराया निकल सकता है। लेकिन पत्रकारिता नहीं चल सकती। पत्रकारिता तो उस स्वाभिमान से चलती है जिसकी कीमत कोई भी विज्ञापनदाता नहीं चुका सकता। वो स्वाभिमान जो भूखा रहकर भी सच लिखने को मजबूर करता है।
अगर ये स्वाभिमान मर गया तो कल अखबार तो बिकेगा, लेकिन उसमें खबर नहीं होगी। सिर्फ विज्ञापन होंगे। और तब लोग पूछेंगे—ये अखबार है या दुकान का कैटलॉग!
कलम का दर्द समझने वाले ही समझ सकते हैं। बाकी लोग तो सिर्फ हँसकर कह देंगे—बिजनेस है भाई!
अधिक जानकारी के लिए देखें The Hindu।

