

रामलीला मैदान की हुंकार: लोकतंत्र के नाम पर सत्ता और विपक्ष, दोनों का इम्तिहान!
वोट चोरी के आरोप, संस्थाओं पर कब्जे का दावा और सत्ता परिवर्तन की चुनौती… सवाल सिर्फ मोदी सरकार का नहीं, देश के लोकतंत्र और राजनीतिक विश्वसनीयता का भी है।
देवानंद सिंह
रामलीला मैदान से राहुल गांधी ने इंडिया गठबंधन के साथ मिलकर देश की राजनीति को एक नया संदेश देने की कोशिश की है। मंच से उठी आवाज में वोट चोरी का आरोप था, संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का सवाल था और केंद्र की मोदी सरकार को सीधी चुनौती भी। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि आरएसएस ने देश की तमाम संस्थाओं पर कब्जा जमा लिया है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को खत्म नहीं होने देंगे, संविधान से बड़ा कोई नहीं है। हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई, सभी के अधिकारों की रक्षा करनी होगी। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग भी उन्होंने उठाई। यहां तक कि राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को भी खुली चुनौती दे डाली।
ममता बनर्जी ने कहा कि हम हारे नहीं, हमें हराया गया है। अखिलेश यादव ने लोकसभा चुनाव को ट्रेलर बताते हुए विधानसभा चुनाव में पूरी फिल्म दिखाने की बात कही। तेजस्वी यादव ने शकुनि के पासे का जिक्र कर सियासी तंज कसा। कुल मिलाकर रामलीला मैदान विपक्षी एकजुटता और सत्ता परिवर्तन की हुंकार का मंच बन गया।
लेकिन लोकतंत्र में केवल सत्ता पक्ष से सवाल पूछना ही पर्याप्त नहीं है। विपक्ष को भी अपने सवालों का जवाब देना होगा। यदि वोट चोरी हुई है तो उसके प्रमाण क्या हैं? चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर संदेह है तो उसकी जांच का संवैधानिक रास्ता क्या है? ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग के पीछे ठोस आधार क्या हैं? लोकतंत्र आरोपों से नहीं, प्रमाणों और पारदर्शिता से मजबूत होता है।
दूसरी ओर भाजपा और अमित शाह ने 1984 के सिख विरोधी दंगों की याद दिलाकर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा किया। निश्चित रूप से 1984 का वह काला अध्याय देश के माथे पर कलंक है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या हर राजनीतिक बहस को अतीत के जख्मों में उलझाकर वर्तमान के सवालों से बचा जा सकता है? इतिहास का हिसाब भी होना चाहिए और वर्तमान की जवाबदेही भी।
इस पूरे घटनाक्रम में एक टेलीविजन चैनल का खाली जगहों को दिखाकर रैली की भीड़ का आकलन करने में जुट जाना भी पत्रकारिता की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है। भीड़ कम थी या ज्यादा, यह खबर का हिस्सा हो सकता है, लेकिन किसी राजनीतिक रैली के संदेश को केवल खाली कुर्सियों के आधार पर खारिज करना पत्रकारिता नहीं हो सकती। उसी तरह भीड़ जुटाकर जनसमर्थन का प्रमाणपत्र बांटना भी उचित नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल भाजपा से है। यदि सरकार को अपने लोकतांत्रिक जनादेश पर भरोसा है तो उसे विपक्ष के सवालों का जवाब देने से परहेज क्यों होना चाहिए? संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर उठते सवालों को राजनीतिक विरोध बताकर खारिज नहीं किया जा सकता।
और विपक्ष से भी सवाल है कि लोकतंत्र बचाने की लड़ाई क्या केवल नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने का अभियान है? क्या गठबंधन के पास देश के लिए कोई साझा वैकल्पिक दृष्टि, नीति और कार्यक्रम भी है? केवल यह कहना कि हम हारे नहीं, हमें हराया गया, जनता के विश्वास को जीतने के लिए पर्याप्त नहीं है।
लोकतंत्र में न प्रधानमंत्री देश से बड़े हैं, न विपक्ष का कोई नेता संविधान से बड़ा है। सत्ता पक्ष को अहंकार से बचना होगा और विपक्ष को अवसरवाद से। चुनाव आयोग को निष्पक्षता साबित करनी होगी और मीडिया को सत्ता तथा विपक्ष, दोनों से समान दूरी रखनी होगी।
याद रखिए, लोकतंत्र किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है। यह जनता की अमानत है। इसे बचाने की जिम्मेदारी केवल विपक्ष की नहीं, सत्ता पक्ष की भी है। सवाल पूछना देशद्रोह नहीं और सवालों का जवाब देना कमजोरी नहीं। यही लोकतंत्र की असली ताकत है।
राष्ट्र संवाद की स्पष्ट राय है देश को सत्ता की चाटुकारिता नहीं, जवाबदेही चाहिए और विपक्ष की नारेबाजी नहीं, विश्वसनीय विकल्प चाहिए।

