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    Home » विदेश नीति को संभालने की जरूरत है  ! :निशिकांत ठाकुर
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    विदेश नीति को संभालने की जरूरत है  ! :निशिकांत ठाकुर

    News DeskBy News DeskJuly 6, 2025No Comments7 Mins Read
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    विदेश नीति को संभालने की जरूरत है  !
    निशिकांत ठाकुर

    यह बात बिल्कुल सच है कि किसी भी जीव के  ईश्वर  प्रदत्त मूल स्वरूप को बदला नहीं जा सकता, लेकिन आज के चिकित्सकीय संसार में अब यह असंभव नहीं रहा  । पर, कुछ जीव ऐसे होते हैं जिसके मूल स्वरूप को चाहे हम जितना भी चिकित्सकीय पद्धति से  ठीक कर लें, लेकिन वर्षों की मेहनत के बावजूद इसमें परिवर्तन नहीं आता । अक्षरशः यही हाल पाकिस्तान का है चाहे आजादी के बाद हो या पहले –पता नहीं उसके मन में कितना बैर भारत के प्रति था कि उसने अखंड भारत को  खंड खंड में बांट ही दिया । उसके बाद भी उसे संभलने के कई अवसर दिए गए, लेकिन उसने तो जिद ही पकड़ लिया कि भारत में शांति कभी नहीं आने देगा। किसी न किसी तरह से षडयंत्र रचकर उसे परेशान करता रहेगा । जो खबर छनकर आ रही है उसके अनुसार आज भी  किसी न किसी तरह षडयंत्र रचकर  हम भारतीयों को डराने की   योजना बना  रहा है ।  भारतीय सीमा के पार पाक अधीकृत गुलाम कश्मीर में फिर आतंकी ठिकाना बना रहा है । जहां वह अपने आतंकी संगठनों के रंगरूटों को प्रशिक्षित  करेगा और  कहीं  न कहीं किसी न किसी प्रकार भारत की सीमा में घुसकर आतंकी हमला करेगा, फिर चूहों की तरह बिलों में घुस जाएगा  । पिछले दिनों  भारत द्वारा उसके अरमानों को ध्वस्त करने का प्रयास किया गया,लेकिन ऐसों जीवों  की पूंछ कहां सीधी होती है!

     

    जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार पाक अधिकृत गुलाम कश्मीर के मुरीदके , लश्कर और बहावलपुर में फिर से जेहादियों का गढ़ बना दिया गया है ।  पाकिस्तान के आईएसआई ने हाल फिलहाल शीर्ष कमांडरों की बैठक बुलाई थी । उनका उद्देश्य है कि भविष्य में भारत से कैसे बदला लिया जाए । प्रायः यही होता है। जिसमें वह कभी सफल नहीं हुआ है। लेकिन,  उनके अधिकारी केवल इसी प्रयास में रहते हैं कि किसी न किसी तरह भारत की सीमा में घुसकर निर्दोषों का कत्लेआम किया जाए ।  भारतीय सुरक्षा बल घात लगाकर सीमा में घुसने के प्रयास को विफल करते आ रहे हैं । अब तो यह बात भी सामने आ रही है कि आतंकी  संगठन में भर्ती किए जाने को लेकर पाकिस्तान के कई शहरों में रैलियां निकाली  जा रही हैं और लोगों को  भारतीय सैनिकों द्वारा नष्ट किए गएआतंकी  ठिकानों के साथ साथ उन आतंकियों की तस्वीरें दिखाई जा रही हैं जिन्हें  मौत के घाट उतार दिया गया है । उन नष्ट  आतंकी ठिकाने और मौत के घाट उतार दिए गए आतंकियों को दिखाकर उन्हें जोश में लाने के लिए उन युवाओं को आतंकी  बनाया जा रहा है , जो हताश हो चुके हैं  और जिनके पास रोजगार नामक कुछ भी नहीं है। सुरक्षा बल से जब इस पर बात की गई तो उनका कहना था कि उनकी करतूतों का पता सबको है और उन्हें विफल करने के लिए हम पूरी तरह सक्षम और तैयार हैं। इस स्तंभकार ने अपनी जम्मू –कश्मीर की अनेक यात्राओं में वहां के निवासियों से बात की तो उन्होंने भावुक स्वर में कहा कि पाकिस्तान तो खुद कंगला है । उन्हें तो हिन्दुस्तानी नेताओं द्वारा ही धन मुहैया कराया जाता है ताकि यहां आकर  आतंक फैलाएं और उनकी राजनीति फलती–फूलती रहे ।

     

    यह बात तो प्रत्येक भारतीय की समझ में आती है कि पाकिस्तान का जन्म ही भारत के विरोध में हुआ है, इसलिए  तरह– तरह से समय –समय पर अपनी भड़ास भारत पर निकलता रहता है, लेकिन पिछले कुछ सालों में जिस तरह से हमारे पड़ोसियों से हमारे संबंध बिगड़े हैं, वह किसलिए ? कहीं न कहीं हमारी विदेश नीति में कोई न कोई कमी रही है जिसके कारण हमारे संबंध पड़ोसी देशों सहित विश्व के कई ताकतवर देशों से खराब हुए है ।  जिस बंगलादेश का निर्माण ही भारतीय हस्तक्षेप के कारण हुआ वह भी हमें आंखें दिखाने लगता है , ऐसा क्यों ! बात  केवल बंगला देश की ही नहीं है ।श्रीलंका  जिससे हमारा संबंध आध्यात्मिक रहा है वह भी भारत से दूरी बनाकर चीन की ओर आकर्षित हो गया है और अपना बंदरगाह जो भारत के सबसे नज़दीक है उसे  चीन के हवाले कर दिया । अब  रही हमारे  सबसे नजदीकी पड़ोसी देश नेपाल की,  जिससे हमारा संबंध  आध्यात्मिक और बेटी– रोटी का रहा है वह भी चीन की ओर आकर्षित होकर हमसे दूरी बना लिया है । यहां तक कि नेपाल  में जब भी कोई सरकार बनती थी उसके जो भी प्रधान होते थे वे सबसे पहले भारत आकर अपने संबंधों को मजबूत करने के अपने भाव को स्पष्ट करते रहे हैं, लेकिन अब क्या हो गया कि नई सरकार बनते ही उसके प्रधानमंत्री चीन जाकर  अपनी विश्वसनीयता प्रकट करते हैं । आखिर  क्या कारण है कि हमारी विदेश नीति में कुछ कमी आई है ? इसपर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है ।

     

    यह तो रही हमारे पड़ोसी देशों के साथ  समस्या की बात। जिसके कारणों को सरकार के उच्च पद पर बैठे राजनेताओं ने भी लगभग समझ लिया है , इसीलिए पूरे देश में यह कानाफूसी शुरू हो गई है कि भारत की विदेश नीति में निश्चित रूप से कोई कमी है जिसे हमारे विदेश मंत्री संभाल नहीं पा रहे हैं इसलिए  इसमें बदलाव की जरूरत है । अब तो यहां तक चर्चा है कि कांग्रेसी वरिष्ठ नेता सांसद शशि थरूर को विदेश मंत्री के रूप में भारतीय जनता पार्टी में शामिल कराने का मन बना लिया है । यहां तक कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में  कांग्रेस अध्यक्ष ने पत्रकारों के एक प्रश्न के उत्तर में कहा  कि उनकी अंग्रेजी अच्छी है और सत्तारूढ़ दल के पास ऐसे व्यक्ति नहीं है । उनका यह कहना स्पष्ट करता है कि कांग्रेस ने भी यह मन बना लिया है कि किसी के आने –जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता । कांग्रेस आजादी के दीवानों की पार्टी रही जिसे मिटाने की कोशिश वर्षों अंग्रेजों ने भी की थी, लेकिन वे सफल नहीं हो सके । ऐसा इसलिए कि मुख्यधारा से अपने को अवसरवादी लोग ही अलग करते हैं और फिर कुछ दिनों बाद समाज की सोच से बाहर भी हो जाते हैं  । सरकार ने यही सोचकर  एस जयशंकर को विदेश मंत्री बनाया था कि उन्होंने विदेश मंत्रालय में रहकर भारत के लिए काम  किया है, लिहाजा वे सफल विदेशमंत्री रहेंगे । पर, अब हर तरफ से निराशा हाथ लगने के बाद सरकार ने  अपनी सोच को बदला है, अतः निकट भविष्य में कुछ न कुछ तो बदलाव अवश्य होगा ।

     

    अब आप अमेरिकी संबंधों के बारे में जान ही चुके होंगे कि भारत के साथ– साथ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने किस प्रकार नतमस्तक होने के लिए मजबूर किया । उसके बाद तो अब अति हो गई जब अमेरिका में उच्च पढ़ाई के लिए गए छात्रों के साथ किया जा रहा है । वहां अध्ययन के लिए गए भारतीय छात्रों को अब अपना पासपोर्ट लेकर बाजार और क्लास में जाना पड़ता है । अमेरिका का कहर इस तरह से बढ़ गया है कि जो छात्र अपने पूर्व निर्धारित कार्यकम में स्वदेश आते हैं उन्हें  पुनः वापस अमेरिका आने से वर्जित कर देता है । यहां तक कि सोशल मीडिया साइलेंस का पालन किया जाता है । राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का राज भारतीय छात्रों पर भारी पड़ रहा है । छात्रों के वीसा में सख्ती और डिपोर्ट किए जाने का खतरा बढ़ गया है । ज्ञात हो कि अब पहले जैसी स्थिति  नहीं रही । भारतीय छात्रों का अमेरिकन स्वप्न अधर में लटक गया है।  अपने पड़ोसी सहित विश्व से दुश्मनी लेकर आखिर क्या हासिल होने वाला है ? इस मुद्दे के हर पहलू पर जल्द से जल्द निर्णय लेना ही पड़ेगा अन्यथा विश्व से कटकर भारत अलग –थलग होकर क्या करेगा । वैसे इस बात को कोई स्वीकार करे या न करे ,

     

    लेकिन सरकार ने अपने सहित देशहित में कुछ न कुछ ठोस कदम उठाने का फैसला कर ही लिया  होगा  । जिसकी परिणति स्वरूप विदेश नीतियों में परिवर्तन और  उधार पर सरकार और देश को चलना छोड़ना पड़ेगा , तभी हालात बदलेंगे। क्योंकि यह बदलाव का समय है और यह जरूरी भी  है ।

    (लेखक वरिष्ट पत्रकार और स्तंभकार हैं)

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