पाकिस्तान की आड़ में चीन का छद्म युद्ध
देवानंद सिंह
‘ऑपरेशन सिंदूर’ अब सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि भारत की सुरक्षा नीति, तकनीकी क्षमताओं, और रणनीतिक चेतना के लिए एक कठोर चेतावनी बन चुका है, क्योंकि डिप्टी चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ (कैपेबिलिटी एंड सस्टेनेंस) लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर. सिंह द्वारा ‘फिक्की’ के मंच से दिए गए वक्तव्य ने न केवल पाकिस्तान के साथ हुए हालिया संघर्ष की पेचीदगियों को उजागर किया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि उस संघर्ष की पृष्ठभूमि में चीन एक निर्णायक कारक के रूप में मौजूद था। इससे यह प्रश्न भी उठता है कि भारत की विदेश और रक्षा नीति चीन-पाक गठजोड़ के सामने कितनी सशक्त और पारदर्शी है?

लेफ्टिनेंट जनरल सिंह का यह कहना कि पाकिस्तान तो सिर्फ़ सामने दिखने वाला चेहरा था और हमें चीन से मिलने वाली सहायता स्पष्ट रूप से दिखी, एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्वीकारोक्ति है। भारत की पारंपरिक रणनीतिक सोच में पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान और उत्तरी सीमा पर चीन को दो अलग-अलग मोर्चों के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन अब यह द्वैधता विलीन होती दिख रही है और एक सम्मिलित ‘टू इन वन’ दुश्मन की अवधारणा उभर रही है, जिसमें चीन प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं, परंतु अपने तकनीकी, सैन्य और खुफिया सहायता से पाकिस्तान के पीछे सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

चीन द्वारा पाकिस्तान को 81% सैन्य हार्डवेयर उपलब्ध कराना न केवल द्विपक्षीय रक्षा सहयोग का प्रमाण है, बल्कि यह उस छद्म युद्ध नीति का हिस्सा भी है, जिसके तहत चीन, भारत के खिलाफ अपनी शक्ति का अप्रत्यक्ष प्रदर्शन करता है। यह रणनीति ‘डेनाइबिलिटी’ को बनाए रखते हुए, पाकिस्तान को आगे कर एक प्रकार की लाइव वारफेयर टेस्टिंग लैब तैयार कर रही है। चीन की ‘लाइव लैब’ और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध का नया चेहरा लेफ्टिनेंट जनरल सिंह का यह अवलोकन कि चीन अपने हथियारों को अलग-अलग सिस्टम्स के ख़िलाफ़ आज़मा सकता है, केवल एक सैन्य मूल्यांकन नहीं, बल्कि एक रणनीतिक चेतावनी है। जिस प्रकार से ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की सेना को लाइव इनपुट प्राप्त हो रहे थे, जिनके बारे में पाकिस्तान के डीजीएमओ ने भारतीय सैन्य कमांड से बातचीत में संकेत भी दिया, वह भारतीय रक्षा संरचनाओं में सूचना सुरक्षा और साइबर खुफिया की कमियों को उजागर करता है।

यह स्थिति दर्शाती है कि चीन अब पारंपरिक सीमा संघर्ष से आगे निकलकर, सूचना युद्ध, इलेक्ट्रॉनिक खुफिया, साइबर निगरानी और AI-आधारित युद्ध प्रणालियों की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है और भारत को यदि इसकी काट विकसित करनी है तो उसे ‘रिएक्टिव’ की बजाय ‘प्रोएक्टिव’ टेक्नोलॉजिकल रणनीति अपनानी होगी।

राहुल आर. सिंह के वक्तव्य में तुर्की का उल्लेख विशेष ध्यान देने योग्य है। तुर्की न केवल पाकिस्तान को ड्रोन तकनीक और प्रशिक्षित सैन्य विशेषज्ञ प्रदान कर रहा था, बल्कि वह एक वैकल्पिक इस्लामी शक्ति के रूप में, पाकिस्तान और चीन के सैन्य गठजोड़ को वैचारिक समर्थन भी दे रहा था। हालिया वर्षों में तुर्की के विदेश नीति रुख में जिस प्रकार इस्लामी राष्ट्रों के समर्थन का आग्रह बढ़ा है, वह भारत के लिए पश्चिम एशिया में रणनीतिक दायरे को पुनर्परिभाषित करने की चुनौती प्रस्तुत करता है।

जब पाकिस्तान को भारतीय सैन्य इकाई की स्थिति की लाइव जानकारी मिल रही थी, तब यह स्पष्ट हुआ कि चीन के पास ‘सिग्नल इंटेलिजेंस’ और ‘रियल टाइम डेटा ट्रांसमिशन’ की शक्तिशाली प्रणाली मौजूद है। इस संदर्भ में, लेफ्टिनेंट जनरल सिंह का यह सुझाव कि भारत को इस क्षेत्र में तत्काल तकनीकी सुधार करने होंगे, न केवल एक सैन्य सुधार का आग्रह है, बल्कि यह संप्रभुता और सामरिक अखंडता की रक्षा का आह्वान है।
सैन्य जरूरतों के लिए डिपेंडेंसी आज एक रणनीतिक कमज़ोरी बन चुकी है। लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने इस ओर इशारा करते हुए बताया कि कई सैन्य उपकरण और ड्रोन समय पर न मिल पाने के कारण ज़मीनी हालात प्रभावित हुए। भारत की ‘आत्मनिर्भर भारत’ नीति के संदर्भ में यह एक गंभीर प्रश्न है — क्या यह नीति केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित रह गई है या वास्तविक ज़मीनी क्रियान्वयन की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं? यह विफलता बताती है कि भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता आज भी आयात पर अत्यधिक निर्भर है, विशेषकर अति-आवश्यक श्रेणी के ड्रोन, संचार उपकरण और युद्ध प्रणालियों के लिए। और जब समय पर उपकरण न पहुंचे, तो रणभूमि में रणनीति का संतुलन आसानी से विरोधी पक्ष के पक्ष में झुक सकता है।

लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर. सिंह के वक्तव्य ने केवल सैन्य जगत में हलचल नहीं मचाई, बल्कि राजनीतिक क्षेत्र में भी बहस को हवा दी। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस मौके पर सरकार पर तीखा हमला करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 19 जून 2020 को दिए गए उस बयान की याद दिलाई जिसमें कहा गया था कि कोई भारतीय सीमा में नहीं घुसा।
जयराम रमेश का यह आरोप कि प्रधानमंत्री ने उस चीन को क्लीन चिट दी, जो आज पाकिस्तान की वायुसेना को असाधारण समर्थन दे रहा है, सरकार की चीन नीति की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है। इसके साथ ही, उनका यह दावा कि हाल में चीन ने पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ कुनमिंग में त्रिपक्षीय बैठक की है, भारत की कूटनीतिक चुनौती को और गंभीर बनाता है।

चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा ऐतिहासिक उच्चता पर है, यह तब है जब सैन्य मोर्चे पर दोनों देशों के बीच तनाव व्याप्त है। यह स्थिति उस रणनीतिक द्वैधता को दर्शाती है जिसमें एक ओर सीमा पर सैनिक तैनात हैं और दूसरी ओर आर्थिक निर्भरता निरंतर गहराती जा रही है।क्या भारत को चीन के साथ ‘व्यापारिक बहिष्कार’ जैसी नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए? या फिर वैकल्पिक आपूर्ति शृंखलाएं तैयार कर उसके प्रभाव को न्यूनतम करने का प्रयास होना चाहिए? वर्तमान व्यवस्था में न तो पूरी तरह कूटनीतिक सख्ती है, न ही व्यापारिक प्रतिबंधों की स्पष्टता यह एक असंगत स्थिति है।

लेफ्टिनेंट जनरल सिंह का बयान किसी राजनीतिक दल के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है। भारत अब उस युग में प्रवेश कर चुका है जहां युद्ध सिर्फ टैंक और तोपों से नहीं, बल्कि डेटा, ड्रोन, एल्गोरिद्म और कम्युनिकेशन इंटरसेप्शन से लड़े जाते हैं। चीन-पाक गठजोड़ अब एक वास्तविकता है, और तुर्की जैसा तीसरा सहयोगी इस समीकरण को और जटिल बना सकता है।
इस स्थिति में आवश्यकता है कि भारत की सुरक्षा नीति को तात्कालिक राजनीतिक लाभ से मुक्त किया जाए और सैन्य नेतृत्व की सच्चाइयों को संसद में स्थान दिया जाए। यदि देश की सुरक्षा से जुड़ी गंभीर बातें सिर्फ सार्वजनिक मंचों पर सैन्य अधिकारी कहें और संसद में उन पर चर्चा से बचा जाए, तो यह लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा — दोनों के लिए खतरे की घंटी है।
अंततः, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सबसे बड़ी सीख यही है, हमारी सीमाएं अब केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि तकनीकी, खुफिया और राजनीतिक भी हैं। अगर भारत को इन बहुआयामी सीमाओं की रक्षा करनी है, तो उसे अपनी रणनीति को उतनी ही बहुआयामी और एकीकृत बनाना होगा, वरना ‘पाकिस्तान’ सिर्फ चेहरा रहेगा और असली लड़ाई चीन जैसे मुखौटेधारी शत्रुओं से जारी रहेगी।

