तुम्हारे लिए
प्रेम की कविता
क्या कभी बर्फ के टुकड़े को
स्पर्श कर देखा है?
क्या सुनी है आधी रात को चातकी की रुलाई?
क्या महसूस की है
हरसिंगार की वो खुशबू?
प्रियतम, तुम नील कल्पना-सागर के
कोई मतवाले मन के तो नहीं!
फिर भी ढूंढ रही हूँ
तुम्हारी गहराइयों में
अपने जीवन की पूर्णता।
निर्लज्ज है मेरा यह संपूर्ण अस्तित्व।
आर्तनाद के प्रचंड प्रहार से
चूर-चूर हुए किसी खंडहर की तरह,
हृदय के अंतस का कमरा, नीरव और निःशब्द है,
हर पल, मेरे इस सूने हृदय में
तुम्हारे लिए, प्रेम की कविता।
मनीषा शर्मा
पता- जलुकबाड़ी, गुवाहाटी
