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    Home » झारखंड गठन के 26 साल बाद भी शहीदों के सपने अधूरे: आनंद मोहन
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    झारखंड गठन के 26 साल बाद भी शहीदों के सपने अधूरे: आनंद मोहन

    Devanand SinghBy Devanand SinghSeptember 14, 2026No Comments2 Mins Read
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    झारखंड गठन के 26 साल बाद भी शहीदों के सपने अधूरे: आनंद मोहन

    राष्ट्र संवाद संवाददाता

    जमशेदपुर। पूर्व सांसद एवं बिहार पीपुल्स पार्टी के संस्थापक आनंद मोहन ने झारखंड राज्य गठन के उद्देश्यों, विकास की वर्तमान स्थिति, छात्र आंदोलनों और आरक्षण व्यवस्था को लेकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि झारखंड अलग राज्य बनने के बाद भी आंदोलनकारियों और शहीदों के सपनों को पूरी तरह साकार नहीं किया जा सका है।

    आनंद मोहन ने कहा कि झारखंड आंदोलन जिस विकास और समृद्धि के विजन के साथ लड़ा गया था, वह अपेक्षित रूप से धरातल पर नहीं उतर पाया। उन्होंने कहा कि राज्य गठन के समय यह धारणा बनाई गई थी कि विभाजन के बाद बिहार विकास की दौड़ में पिछड़ जाएगा, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार ने कानून-व्यवस्था, आधारभूत संरचना और विकास के कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। इसके विपरीत, प्रचुर खनिज संपदा से संपन्न झारखंड अपनी संभावनाओं के अनुरूप विकास नहीं कर सका।

    उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के मामले में झारखंड देश के सबसे समृद्ध राज्यों में गिना जाता है, फिर भी राज्य अपेक्षित आर्थिक और सामाजिक प्रगति हासिल नहीं कर पाया। आनंद मोहन ने इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व के साथ-साथ समाज के प्रबुद्ध वर्ग की निष्क्रियता को भी जिम्मेदार ठहराया।

    छात्र आंदोलनों और युवाओं के बढ़ते आक्रोश पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं और प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं से छात्रों का भविष्य प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि अभिभावक कर्ज लेकर बच्चों की पढ़ाई कराते हैं और जब परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं तो युवाओं का आक्रोश स्वाभाविक है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण आंदोलनों का सम्मान होना चाहिए और सरकारों को युवाओं की समस्याओं का समाधान करना चाहिए।

    आरक्षण व्यवस्था को लेकर आनंद मोहन ने एक नया सुझाव भी दिया। उन्होंने कहा कि आरक्षण का लाभ लेकर जो लोग उच्च प्रशासनिक, राजनीतिक या संवैधानिक पदों तक पहुंच चुके हैं, उनके परिवारों को आरक्षण की सुविधा से बाहर करने पर विचार होना चाहिए। उनका मानना है कि इससे आरक्षण का लाभ समाज के उन अंतिम और वास्तविक जरूरतमंद लोगों तक पहुंच सकेगा, जो अब भी विकास की मुख्यधारा से दूर हैं।

    उन्होंने कहा कि झारखंड गठन के 26 वर्षों के करीब पहुंचते इस दौर में राज्य के विकास मॉडल, संसाधनों के उपयोग और सामाजिक न्याय की नीतियों की गंभीर समीक्षा की आवश्यकता है, ताकि राज्य गठन के मूल उद्देश्यों को पूरा किया जा सके।

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