हाथियों ने लगाया ट्रेन का ब्रेक, गुड्स ट्रेन भी प्रभावित
*एक सप्ताह से टाटा-झाड़सुगुड़ा रेलखंड प्रभावित, 11 ट्रेनों पर असर; हाथियों की सुरक्षा के लिए स्थायी उपाय की जरूरत*
मृत्युंजय बर्मन,
राष्ट्र संवाद संवाददाता
जंगल से निकलकर रेल पटरी तक पहुंच रहे हाथियों ने चक्रधरपुर रेल मंडल के टाटा-झाड़सुगुड़ा रेलखंड पर ट्रेनों की रफ्तार थाम दी है। करीब एक सप्ताह से अलग-अलग स्थानों पर हाथियों की मौजूदगी के कारण यात्री ट्रेनों के साथ मालगाड़ियों का परिचालन भी प्रभावित हो रहा है। इसका सीधा असर हावड़ा-मुंबई रेलखंड के यात्रियों पर पड़ रहा है। लगातार सामने आ रही घटनाओं ने जंगल और रेललाइन के बीच बढ़ते टकराव को भी रेखांकित किया है।
रेलवे के अनुसार 6 अक्टूबर की सुबह सोनाखान-सोगरा के बीच रेललाइन पर हाथियों की मौजूदगी देखी गई। इसके बाद अप, डाउन और थर्ड लाइन पर परिचालन नियंत्रित किया गया। 6 अक्टूबर सुबह छह बजे से 7 अक्टूबर सुबह छह बजे तक इस खंड में ट्रेनों को 30 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम रफ्तार के कॉशन पर चलाया गया। वहीं बंडामुंडा क्षेत्र में भी हाथियों की आवाजाही को देखते हुए 6 अक्टूबर रात 11 बजे से 7 अक्टूबर सुबह सात बजे तक सभी लाइनों पर गति सीमित रखने का निर्देश दिया गया।
हाथियों की मौजूदगी और सुरक्षा उपायों का असर आजाद हिंद, गीतांजलि, हावड़ा-मुंबई मेल, ज्ञानेश्वरी, संबलेश्वरी समेत करीब 11 महत्वपूर्ण ट्रेनों के परिचालन पर पड़ा। रफ्तार कम होने से यात्रियों को देरी का सामना करना पड़ा, जबकि मालगाड़ियों का परिचालन भी प्रभावित हुआ। रेलवे ने संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी और एहतियाती कदम बढ़ाए हैं।
लेकिन लगातार हाथियों का रेललाइन तक पहुंचना केवल ट्रेनों की रफ्तार सीमित करने का मामला नहीं है। यह उस बढ़ते टकराव की ओर भी संकेत करता है, जिसमें एक ओर तेज रेल परिचालन है तो दूसरी ओर हाथियों के पारंपरिक आवागमन वाले वन क्षेत्र। कॉशन तत्काल सुरक्षा का उपाय है, स्थायी समाधान नहीं। ऐसे में हाथी गलियारों की पहचान, नियमित निगरानी, वन विभाग और रेलवे के बीच रियल टाइम समन्वय तथा संवेदनशील रेलखंडों पर प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था जरूरी हो गई है। यात्रियों की सुरक्षा के साथ हाथियों की जान बचाने की चुनौती का समाधान अब केवल कॉशन से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संयुक्त रणनीति से ही संभव होगा।

