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    Home » पाकिस्तान में सेना पर अंकुश की कोशिशें और सियासी संघर्ष
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    पाकिस्तान में सेना पर अंकुश की कोशिशें और सियासी संघर्ष

    Devanand SinghBy Devanand SinghMarch 3, 2026Updated:March 3, 2026No Comments6 Mins Read
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    पाकिस्तान में सेना पर अंकुश लगाने की कोशिशें कोई नई बात नहीं हैं। यह संघर्ष दशकों से लोकतंत्र और सैन्य वर्चस्व के बीच जारी द्वंद्व का हिस्सा रहा है।

    पाकिस्तान की सियासत के सात दशकों का इतिहास यदि एक वाक्य में पिरोना हो, तो वह ‘लोकतंत्र और वर्दी के बीच का कभी न खत्म होने वाला द्वंद्व’ है। 14 अगस्त 1947 को वजूद में आने के बाद से ही इस मुल्क ने एक ऐसी विडंबना को जिया है जहाँ संविधान की किताब तो नागरिक शासन की बात करती है, लेकिन सत्ता की असली चाबी रावलपिंडी के जनरल हेडक्वार्टर्स में महफूज रहती है। पाकिस्तान में सेना पर अंकुश लगाने की कोशिशें केवल राजनीतिक सुधारों का हिस्सा नहीं रही हैं, बल्कि ये अस्तित्व की वो लड़ाइयां रही हैं जिनमें कई प्रधानमंत्रियों ने अपनी कुर्सी गवाई, जेल की सजा काटी और कुछ ने तो अपनी जान से भी हाथ धोया। इस संघर्ष की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साल 2006 का ‘लोकतंत्र का चार्टर’ है, जिसे नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो ने लंदन की निर्वासित गलियों में तैयार किया था। यह दस्तावेज केवल एक समझौता नहीं था, बल्कि पाकिस्तानी सेना के उस ‘हाइब्रिड मॉडल’ के खिलाफ एक सीधा युद्धघोष था, जिसने देश को विकास के बजाय बारूद और कर्ज के ढेर पर ला खड़ा किया।
    पाकिस्तान में सेना का वर्चस्व अचानक पैदा नहीं हुआ। 1958 में अयूब खान, 1977 में जिया-उल-हक और 1999 में परवेज मुशर्रफ द्वारा किए गए सैन्य तख्तापलट ने मुल्क की राजनीतिक जड़ों को इतना खोखला कर दिया कि वहां की अवाम और सियासतदानों के मन में यह बात बैठ गई कि ‘तख्त’ का रास्ता सेना की मंजूरी से होकर ही गुजरता है। सेना ने खुद को न केवल सरहदों का रखवाला, बल्कि ‘वैचारिक सीमाओं’ का रक्षक और राष्ट्रीय सुरक्षा का एकमात्र ठेकेदार घोषित कर दिया। इसी पृष्ठभूमि में जब 2006 में चार्टर ऑफ डेमोक्रेसी पर हस्ताक्षर हुए, तो उम्मीद की एक किरण जगी थी। इस चार्टर में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि सेना को राजनीति से पूरी तरह बेदखल किया जाएगा, खुफिया एजेंसियां (ISI और MI) केवल प्रधानमंत्री के प्रति जवाबदेह होंगी, और किसी भी सैन्य अधिकारी को संवैधानिक पद पर बैठने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार था जब दो कट्टर प्रतिद्वंद्वी दल, पीपीपी और पीएमएल-एन, अपनी आपसी रंजिश भुलाकर एक साझा दुश्मन यानी ‘सैन्य प्रतिष्ठान’ के खिलाफ एकजुट हुए थे।
    हालांकि, इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान में सेना पर लगाम कसने की हर कोशिश को खुद सेना ने बहुत ही शातिर तरीके से नाकाम किया। 2007 में बेनजीर भुट्टो की शहादत और उसके बाद 2008 के चुनावों के बाद बनी लोकतांत्रिक सरकार ने जब भी सेना के अधिकारों को चुनौती देने की कोशिश की, उसे ‘मेमोगेट स्कैंडल’ या ‘डॉन लीक्स’ जैसे विवादों में उलझा दिया गया। सेना ने अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए एक नया तरीका ईजाद किया जिसे ‘हाइब्रिड शासन’ कहा जाता है। इसमें सीधे तौर पर मार्शल लॉ नहीं लगाया जाता, बल्कि एक ऐसी राजनीतिक कठपुतली को सत्ता में बिठाया जाता है जो सेना के हितों की रक्षा कर सके। इमरान खान का 2018 में सत्ता में आना इसी प्रयोग का हिस्सा माना गया था, लेकिन विडंबना देखिए कि जिस इमरान खान को सेना ने ‘प्रोजेक्ट’ के तौर पर लॉन्च किया था, वही 2022 में सत्ता से बेदखल होने के बाद सेना के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गए। आज 2026 के दौर में भी पाकिस्तान उसी दोराहे पर खड़ा है।

    पाकिस्तान में सेना पर अंकुश
    सेना पर अंकुश लगाने की राह में सबसे बड़ी बाधा पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर सेना का कब्जा है। ‘मिलिट्री इंक’ के नाम से मशहूर यह व्यवस्था बैंकिंग, खाद, सीमेंट, अनाज और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में सेना का एकाधिकार सुनिश्चित करती है। जब किसी संस्था के पास देश की अर्थव्यवस्था का इतना बड़ा हिस्सा और अत्याधुनिक हथियार दोनों हों, तो निहत्थे राजनेता उसके सामने बौने नजर आते हैं। इसके अलावा, पाकिस्तान की न्यायपालिका ने भी अक्सर सेना के कदमों को ‘जरूरत का सिद्धांत’ बताकर जायज ठहराया है। जब तक जजों की नियुक्तियों और उनके फैसलों पर सेना का परोक्ष दबाव रहेगा, तब तक लोकतांत्रिक अंकुश की बात केवल एक किताबी कल्पना बनी रहेगी। वर्तमान में आसिम मुनीर के कार्यकाल में सेना की शक्ति और भी केंद्रित हो गई है, जहाँ विशेष सैन्य अदालतों के माध्यम से नागरिकों और राजनेताओं को नियंत्रित किया जा रहा है।
    फरवरी 2026 की हालिया राजनीतिक हलचल, जिसमें शहबाज शरीफ सरकार ने इमरान खान की पार्टी (PTI) को फिर से ‘लोकतंत्र के चार्टर’ पर साइन करने का न्यौता दिया है, इस दिशा में एक हताश लेकिन महत्वपूर्ण प्रयास दिखती है। यह प्रस्ताव इस अहसास से उपजा है कि जब तक राजनीतिक दल आपस में लड़ते रहेंगे, सेना ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति से अपना उल्लू सीधा करती रहेगी। यदि इमरान खान और वर्तमान सत्ताधारी गठबंधन सेना के खिलाफ एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सहमत हो जाते हैं, तो यह पाकिस्तान की सेना के लिए दशकों बाद सबसे बड़ी चुनौती होगी। लेकिन यहाँ भी संदेह के बादल गहरे हैं; क्या इमरान खान वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करना चाहते हैं या वे केवल सेना के साथ अपनी व्यक्तिगत ‘डील’ की तलाश में हैं? पाकिस्तान की राजनीति में ‘डील’ और ‘ढीली’ (रियायत) दो ऐसे शब्द हैं जिन्होंने वहां के लोकतंत्र को कभी परिपक्व नहीं होने दिया।
    भारत और शेष विश्व के लिए पाकिस्तान में सेना पर अंकुश लगाने की कोशिशें बेहद संवेदनशील मामला हैं। एक ऐसी सेना जिसके हाथ में परमाणु हथियारों का बटन हो और जिसका राजनीतिक अस्तित्व भारत-विरोध पर टिका हो, वह कभी भी शांति की समर्थक नहीं हो सकती। यदि वहां की नागरिक सरकारें वास्तव में सेना को बैरकों तक सीमित करने में सफल होती हैं, तो इससे न केवल कश्मीर मुद्दे पर बातचीत का एक ठोस धरातल तैयार होगा, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में स्थिरता आएगी। लेकिन यह रास्ता कांटों भरा है। सेना ने दशकों से यह नैरेटिव गढ़ा है कि बिना उनके पाकिस्तान का वजूद खत्म हो जाएगा। इस नैरेटिव को तोड़ने के लिए पाकिस्तान के राजनेताओं को न केवल एकजुट होना होगा, बल्कि उन्हें सुशासन के माध्यम से जनता का विश्वास भी जीतना होगा।
    अंततः, पाकिस्तान में सेना पर अंकुश लगाने की कोशिशें तब तक सफल नहीं हो सकतीं जब तक कि वहां का मध्यम वर्ग और युवा पीढ़ी इस बदलाव के लिए सड़कों पर खड़ी न हो। 9 मई 2023 की घटनाओं ने दिखाया था कि जनता के एक हिस्से में सेना के खिलाफ गुस्सा तो है, लेकिन बिना संगठित नेतृत्व और संस्थागत सुधारों के, यह गुस्सा केवल अराजकता पैदा करता है, बदलाव नहीं। 2006 का चार्टर आज भी एक मार्गदर्शक दस्तावेज की तरह मौजूद है, लेकिन इसकी सार्थकता तभी है जब इसे सत्ता हथियाने का हथियार बनाने के बजाय देश के भविष्य को सुरक्षित करने का संकल्प बनाया जाए। पाकिस्तान को आज एक ऐसे ‘सत्य और सुलह आयोग’ की जरूरत है जो सेना के राजनीतिक दखल के घावों को भरे और एक ऐसा नया सामाजिक अनुबंध तैयार करे जहाँ बंदूक की ताकत वोट की ताकत के सामने नतमस्तक हो।

     महेन्द्र तिवारी, मोबाइल: 9989703240, ईमेल: mahendratone@gmail.com

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