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    Home » जम्मू-कश्मीर: सियासी हलचल ने बढ़ाई आशंका
    Breaking News Headlines राष्ट्रीय संपादकीय

    जम्मू-कश्मीर: सियासी हलचल ने बढ़ाई आशंका

    Devanand SinghBy Devanand SinghAugust 4, 2019Updated:August 4, 2019No Comments5 Mins Read
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    जम्मू-कश्मीर: सियासी हलचल ने बढ़ाई आशंका

    देवानंद सिंह
    जम्मू-कश्मीर में अमरनाथ यात्रियों पर अडवाइजरी और हजारों जवानों की तैनाती के बाद राज्य में जिस प्रकार सियासी हलचल तेज हुई है, उससे लग रहा है कि केंद्र सरकार वहां कुछ बड़ा कदम उठाने जा रही है। फौरी तौर पर भले ही लग रहा है कि केंद्र सरकार द्बारा वहां फोर्स को तैनात किए जाने के पीछे सुरक्षा से जुड़े हुए कारण हैं, क्योंकि वहां आतंकवादी हमले की संभावना बनी हुई है।
    राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने भी साफ किया कि सुरक्षा के मद्देनजर ये कदम उठाए जा रहे हैं। सीमा पार पाकिस्तान पिछले कुछ दिनों से लगातार गोलीबारी कर रहा है। भारतीय सेना ने शनिवार को सीमा पार करने की कोशिश कर रहे सात आतंकियों को ढेर कर दिया था, लेकिन इन सबके बीच राज्य को जिस अलग-सी आशंका का माहौल है, उससे लग रहा है कि कश्मीर में कुछ बड़ा करने की तैयारी की जा रही है। हजारों लोग घाटी से निकलने की जद्दोजहद में दिख रहे हैं। बस स्टैंड और एयरपोर्ट पर पर्यटकों की भीड़ है। अमरनाथ यात्रा को 15 दिन पहले खत्म करने और पर्यटकों को कश्मीर छोड़ने की हिदायत देने के बाद घाटी में यह स्थिति है। शनिवार को पर्यटकों को घाटी से निकलने के लिए 72 घंटे का अल्टिमेटम दिया गया था, इससे साफ है कि सोमवार और मंगलवार तक कश्मीर के मसले पर कुछ बड़ा फैसला होने की उम्मीद है। अटकलें हैं कि मोदी सरकार अनुच्छेद 35ए खत्म कर अपना चुनावी वादा पूरा कर सकती है।
    कश्मीर में तो हालत ये हैं कि वहां रह रहे हर किसी के भीतर दहशत और अफराफरी मची हुई है। जहां सरकारी अमला अपना ताम झाम दुरुस्त करने में जुटा है तो आम आदमी भी राशन की दुकानों पर लाइन में लगकर महीने भर का अनाज खरीद रहा है। एटीएम से लोग नकदी निकाल रहे हैं, ताकि किसी भी संभावित मुसीबत का सामना कर सकें। आम लोगों में अफरातफरी के बीच भी जिम्मेदार स्तर पर कोई सही जवाब नहीं दे रहा है। सभी अपनी जिम्मेदारी टालने में लगे हैं। आखिर, कश्मीर और कश्मीर को लेकर देश में बन रहे भय के माहौल की जिम्मेदारी किसी को तो लेनी होगी ?
    कश्मीर में हर घंटे एक नई अफवाह पैदा हो रही हैं, जो लोगों के मन में नया संशय पैदा कर रही है। सभी जगह गहमागहमी का माहौल है। यह माहौल पिछले हफ्ते से तब बनना शुरू हुआ, जब कश्मीर में अर्धसैनिक बलों के 10हजार अतिरिक्त जवान भेजे गए। यह भी बताया जा रहा है कि रेलवे ने वहां पर अपने अधिकारियों से कहा है कि चार महीने का राशन जमा कर लें। ये खबर भी तेजी से फैल रही है कि कश्मीर में और सुरक्षाबलों की तैनाती हो रही है। सेना और वायुसेना को हाई अलर्ट पर रखा गया है।
    इन सबके बीच राजनीतिक बाजार में धारा 35ए और और धारा 370 को लेकर बयानों ने माहौल को और तनाव में डाल दिया है। हर चगह चर्चा और सुगबुगाहट होने लगी है कि इन धाराओं पर क्या होगा? इसको देखते हुए सारे कश्मीरी नेताओं के सुर भी एक हो गए हैं। हर कोई कहने लगा कि अगर, इनसे छेड़छाड़ की गई तो कश्मीर जल उठेगा, हालांकि राज्यपाल सत्यपाल मलिक बार-बार कह रहे हैं कि ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है, अफवाहों पर ध्यान ना दें।
    यह बात सही है कि धारा 35ए और 370 को हटाना बीजेपी सरकार के एंजेडे में है। सरकार जब चाहे इसको लेकर कुछ फैसला कर सकती है, हालांकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है, इसीलिए दिल्ली इस मामले में खुलकर कुछ भी नहीं बोल रही है, जिससे और भी अनिश्चितिता का माहौल बनता जा रहा है। कई तरह की बातें सुनने में आ रही हैं। एक तो यह है कि आने वाले 15 अगस्त को प्रधानमंत्री कोई बड़ा ऐलान करने वाले हैं और सारी कवायद उसी को लेकर हो रही है। यह भी कहा जा रहा हे कि जम्मू को अलग राज्य बना दिया जाएगा और कश्मीर व लद्दाख केन्द्र शाषित प्रदेश बना दिया जाएगा। आने वाले दिनों में जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव होने हैं और सरकार की कोशिश होगी कि बिना किसी बाधा के चुनाव कराए उस लिहाज से भी इस हलचल को देखा जा रहा है।
    उधर, हाल-फिहलाल में कुपवाड़ा और तंगधार में जिस तरह से पाकिस्तान की ओर से आतंकियों की घुसपैठ कराने की कोशिश हुई है, उसको लेकर सरकार कोई बड़ी कार्रवाई कर सकती है। यह संकेत भी मिल रहे हैं कि पाकिस्तान की कोशिश भारत को उकसाने की है, ताकि भारत कोई बड़ी कार्रवाई करे और वो कोई ऐसी हरकत करे, जिसके जाल में चाहे अनचाहे भारत फंस जाए। दरअसल, भारत के इनकार के बावजूद अमेरिका की ओर से दो बार कश्मीर को लेकर मध्यस्थता की बात करना भी समान्य बात नहीं लग रही है।
    बड़ा सवाल यह भी है कि क्या कश्मीर को लेकर कोई भी बड़ा फैसला करने से पहले वहां के लोगों को विश्वास में नहीं लिया जाएगा? दिल्ली और मुंबई में बैठकर कैसे कश्मीरियत को समझा जा सकता है? अब तक यह भी साफ हो चुका है कि कश्मीर समस्या का समाधान सुरक्षा बलों के बंदूकों की नोंक पर नहीं हो सकता है, हमें राजनीतिक रास्ता तलाशना होगा। कश्मीर के आम लोगों के दिलों के जरिए दिमाग तक पहुंचना होगा, तभी कुछ बात बनेगी।

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