
दीपावली बने विकसित एवं समृद्ध भारत की नई ज्योति केवल अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व नहीं है, यह मनुष्य के भीतर सोई हुई चेतना को जगाने, जीवन की दिशाहीनता को दिशा देने और सभ्यता के वर्तमान पड़ाव पर अपने मूल्यों का पुनर्मूल्यांकन करने का अवसर है। आज भारत विकसित भारत, समृद्ध भारत, समर्थ भारत और आत्मनिर्भर भारत की संकल्पयात्रा पर तेजी से आगे बढ़ रहा है।
लेखक: ललित गर्ग
दुनिया भारत की आर्थिक शक्ति, तकनीकी सामर्थ्य, सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक दृष्टि को नए विश्वास के साथ देख रही है। ऐसे समय में दीपावली का दीपक केवल घर की चौखट पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के आकाश में भी जलना चाहिए। हमारे सामने एक बड़ा प्रश्न है-जब दीपों की संख्या बढ़ रही है, तब मनुष्य के भीतर का प्रकाश क्यों मंद पड़ रहा है? घर जगमगा रहे हैं, बाजार रोशन हैं, महानगरों की इमारतें विद्युत-दीपों से नहा रही हैं, तकनीक जीवन को सुविधाओं से भर रही है, फिर भी मनुष्य के भीतर तनाव, असुरक्षा, हिंसा, स्वार्थ, असहिष्णुता और मोह का अंधकार क्यों गहराता जा रहा है?
दीपावली बने विकसित एवं समृद्ध भारत की नई ज्योति और हमारी चेतना
आतंकवाद, हिंसा, युद्ध, घृणा और वैमनस्य की जड़ें किसी मशीन या हथियार में नहीं, मनुष्य की विकृत चेतना में होती हैं। इसलिए आतंकवाद की समस्या का स्थायी समाधान केवल सुरक्षा-व्यवस्था से नहीं होगा। मनुष्य को अनावश्यक हिंसा छोड़ने का संकल्प करना होगा। जब तक मनुष्य के भीतर प्रतिशोध की आग जलती रहेगी, तब तक संसार में शांति का दीपक पूरी तरह प्रज्वलित नहीं हो सकता। अहिंसा केवल जैन दर्शन का सिद्धांत नहीं, बल्कि भविष्य की मानव सभ्यता की आवश्यकता है।
महान दार्शनिक संत आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने अंतर्दर्शन को आत्मप्रकाश का मार्ग बताया। उनका संकेत स्पष्ट था कि बाहर की दुनिया को देखने की हमारी आदत बहुत गहरी है, जबकि भीतर झांकने की साधना बहुत कमजोर। आज मनुष्य के पास दुनिया देखने के लिए असंख्य माध्यम हैं, लेकिन स्वयं को देखने का समय नहीं। मोबाइल की स्क्रीन चमक रही है, लेकिन मन की स्क्रीन धुंधली होती जा रही है।
नया भारत केवल ऊँची इमारतों, तेज गति की अर्थव्यवस्था, अत्याधुनिक तकनीक और विश्वस्तरीय बुनियादी ढाँचे से नहीं बनेगा। विकसित भारत की असली पहचान उसके नागरिकों की विकसित चेतना से होगी। समृद्धि तभी सार्थक है जब संवेदना जीवित रहे, शक्ति तभी मंगलकारी है जब उसमें संयम हो, विज्ञान तभी कल्याणकारी है जब उसके साथ विवेक हो और विकास तभी पूर्ण है जब उसके केंद्र में मनुष्य तथा प्रकृति दोनों के प्रति करुणा हो।
भारत की सनातन संस्कृति ने सदियों पहले जीवन का यही सूत्र दिया था-तमसो मा ज्योतिर्गमय। आज जब भारत विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर है, तब उसकी सबसे बड़ी पूँजी केवल अर्थव्यवस्था या तकनीकी शक्ति नहीं, बल्कि उसकी सनातन जीवनदृष्टि है। दीपावली इस सनातन संस्कृति को नया आकाश देने का पर्व बन सकती है। हमें दुनिया को केवल यह नहीं बताना कि भारत आर्थिक रूप से आगे बढ़ रहा है, हमें यह भी दिखाना है कि भारत मानवीय मूल्यों के साथ विकास करना जानता है।
आज आवश्यकता है कि दीपावली के दीपक को राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक बनाया जाए। एक दीप आत्मसंयम का, एक अहिंसा का, एक पर्यावरण-संरक्षण का, एक सामाजिक समरसता का, एक नारी-सम्मान का, एक ईमानदारी का और एक राष्ट्रनिष्ठा का। जब करोड़ों घरों के करोड़ों दीप इन मूल्यों के साथ जलेंगे, तब भारत की रोशनी केवल घरों और बाजारों तक सीमित नहीं रहेगी, वह विश्वमानवता का पथ आलोकित करेगी।
दीपक की एक विशेषता है-वह स्वयं जलता है और दूसरों को प्रकाश देता है। यही भारत की संस्कृति का मूल चरित्र है। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना लेकर चलने वाला भारत अपने उत्थान को विश्वकल्याण से अलग नहीं देख सकता। इस दीपावली एक प्रश्न अपने आप से जरूर पूछें-मेरे भीतर कौन-सा अंधकार अभी बाकी है? क्रोध, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या, भय, असंवेदनशीलता या निष्क्रियता? क्योंकि अंधकार को कोसने से प्रकाश नहीं आता। एक छोटा-सा दीप जलाना पड़ता है।
आज भारत नई करवट ले रहा है। उसकी अर्थव्यवस्था नई ऊँचाइयां छू रही है, विज्ञान नई सीमाएं लांघ रहा है, युवा नई संभावनाओं के द्वार खोल रहे हैं और भारत विश्वमंच पर अपनी भूमिका को नए आत्मविश्वास के साथ स्थापित कर रहा है। इस परिवर्तन की यात्रा में दीपावली का संदेश भी नया होना चाहिए-बाहर का भारत रोशन हो और भीतर का भारत जागृत हो। तभी दीपावली केवल एक पर्व नहीं रहेगी, वह नवभारत की नवज्योति, सनातन संस्कृति की नई आभा और विश्वमानवता के लिए भारत के प्रकाश-पथ का उद्घोष बनेगी।

