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    Home » बिहार डैमेज कंट्रोल करना भाजपा के लिए मुश्किल
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    बिहार डैमेज कंट्रोल करना भाजपा के लिए मुश्किल

    News DeskBy News DeskAugust 8, 2022No Comments6 Mins Read
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    बिहार के मौसम के साथ सियासी मौसम भी गरम

    अभिषेक

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    12 अगस्त से पहले बिहार में सत्ता साझेदार बदल सकते हैं!

    कमजोर मॉनसून ने बिहार के मौसम के साथ सियासी मौसम को भी गरम कर दिया है। वह भी इतना गर्म, जिसकी आंच में बीजेपी झुलसती दिख रही है। पिछले तीन दिनों से बिहार की राजनीतिक पिच पर केवल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू बैटिंग कर रही है, बाकी सभी दल चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। जेडीयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह को अकूत दौलत जमा करने के मामले में उमेश कुशवाहा की ओर से कारण बताओ नोटिस जारी करने के साथ राजनीतिक सरगर्मी की शुरुआत हुई। आरसीपी सिंह का जेडीयू से इस्तीफा और जेडीयू के अध्यक्ष ललन सिंह की ओर से बिना नाम लिए बीजेपी पर हमले की खबर के साथ यह सरगर्मी और तेज होती जा रही है। खबरें यहां तक चल रही हैं कि 12 अगस्त से पहले बिहार में सत्ता साझेदार बदल सकते हैं। मुख्य विपक्षी दल आरजेडी के नेता खुलकर कह रहे हैं कि अगर नीतीश कुमार बीजेपी से अलग होते हैं तो वह छाती खोलकर उनका समर्थन करेंगे। इन अटकलों के बीच इस बात की भी चर्चा शुरू हो गई है कि अगर बिहार में नीतीश कुमार एनडीए से अलग होकर महागठबंधन की सरकार बनाते हैं तो इसका 2024 के लोकसभा चुनाव पर क्या असर होगा। अगर नीतीश ने 2013 दोहराते हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास 2024 में 2015 चुनाव नतीजे रिपीट होने से रोकने का क्या प्लान है।
    नीतीश और बीजेपी का नाता टूटा तो क्या होगा?
    बिहार में लोकसभा की 40 और विधानसभा की 243 सीटें हैं। बिहार विधानसभा की स्थिति देखें तो आरजेडी के पास 80, बीजेपी के 77, जेडीयू के 45, कांग्रेस के 19, लेफ्ट के 16, हम के 4, AIMIM के 1 और निर्दलीय विधायकों की संख्या 1 है। मोकामा के विधायक अनंत सिंह के अयोग्य होने पर आरजेडी के एक विधायक कम हुए हैं। वहीं लोकसभा में बिहार से बीजेपी को 17, जेडीयू को 16 और एलजेपी (पशुपति पारस वाली) के 5, एलजेपी (चिराग पासवान वाली) के एक और कांग्रेस के एक सांसद हैं। लालू यादव की आरजेडी का एक भी सांसद नहीं है।

    अगर नीतीश कुमार बीजेपी से अलग होकर महागठबंधन के साथ 2024 के लोकसभा चुनाव में जाते हैं तो इसे समझने के लिए 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव को देखना होगा। 2014 के लोकसभा चुनाव में आरजेडी, जेडीयू और बीजेपी अलग-अलग मैदान में उतरी थी। साल 2014 में बीजेपी 30 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जिसमें उसने 22 सीटों पर जीत हासिल की। इसी तरह एनडीए घटक दल के रूप में एलजेपी ने 7 में से 6 पर जीत दर्ज की। कांग्रेस 12 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, उसे मात्र दो सीटों पर जीत हासिल हुई थी, जबकि 27 सीटों पर चुनाव लड़ने वाले आरजेडी को मात्र 4 पर ही जीत हासिल हुई थी। जेडीयू 38 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, लेकिन उसे 2 सीट पर ही जीत मिली।
    लेकिन 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार साथ आ गए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में NDA की ओर से पूरी ताकत लगाने पर भी खास अच्छे नतीजे नहीं आए। जनता ने लालू-नीतीश की जोड़ी पर खूब वोट बरसाए थे। पीएम मोदी की ताबड़तोड़ रैलियों के बावजूद महागठबंधन को 243 में 178 सीटें आई थीं, जिसमें आरजेडी के 80, जेडीयू के 71 और कांग्रेस के 27 विधायक जीते थे। वहीं एनडीए में मजबूत जातीय समीकरण होने के बावजूद बीजेपी को 53, एलजेपी और RLSP (उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी) को 2-2 और जीतन राम मांझी की हम को एक सीट मिले थे। पूरा एनडीए गठबंधन 58 सीटें ही जीत पाया था।

    2005 के बाद बिहार में जीतने भी लोकसभा और विधानसभा चुनाव हुए हैं उसके परिणाम से एक बात तो साफ है कि यहां जब भी दो बड़ी पार्टियां मिलकर चुनाव लड़ती हैं तो जनता का समर्थन उसी को जाता है। इस लिहाज से देखें तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अगर 2024 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव मिलकर मैदान में उतरते हैं तो बीजेपी की अगुवाई वाले NDA को बड़ा झटका लग सकता है। यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि इस वक्त जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा भी नीतीश कुमार के साथ ही हैं।

    केंद्र की राजनीति को समझने वाले किसी भी शख्स से बात करेंगे तो वह सहज ही कहेंगे कि लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 और बिहार की 40 सीटें ही दिल्ली की सरकार तय करती हैं। क्योंकि इन दोनों राज्यों के सांसदों को मिलाकर ही 120 होते हैं। जबकि लोकसभा में पूर्ण बहुमत के 272 सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है। इस वक्त यूपी से एनडीए के 66 सांसद हैं। वहीं बिहार से 39 यानी केवल इन दो प्रदेशों से मोदी सरकार को 105 सांसदों का समर्थन है।

    अगर 2015 के विधानसभा चुनाव के परिणाम को आधार मानकर अनुमान लगाएं तो 2024 के लोकसभा चुनाव रिजल्ट का अनुमान लगाएं तो नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की जोड़ी एनडीए को बड़ा झटका दे सकती है। अगर 2024 के लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 सीटों में महागठबंधन 34 या 35 जीतती है और एनडीए 5 या 6 सीटों पर सिमटती है तो यह मोदी सरकार की टेंशन बढ़ सकती है।
    आम लोगों के मौजूदा मूड को देखें तो उनका मोदी सरकार के प्रति अटूट भरोसा है इसमें कोई दो राय नहीं है। देश की बड़ी आबादी मोदी सरकार को पसंद करती है। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि महंगाई और बेरोजगारी दो ऐसे मुद्दे हैं जो 2024 के लोकसभा चुनाव में अपना कुछ ना कुछ असर दिखा सकते हैं। ऐसे में अगर बीजेपी की सीटें 2014 और 2019 के मुकाबले बिहार के अलावा बाकी देश में 20-25 भी घटती हैं और बिहार में महागठबंधन को 34-35 सीटें मिलती हैं तो केंद्र में किसी बड़े राजनीतिक खेल होने से इनकार नहीं किया जा सकता है।
    उदाहरण के तौर पर 272 में बिहार की 35 और देश भर की 25 सीटें घटाते हैं तो यह नंबर 212 सीटें हो जाती हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में शिवसेना और शिरोमणी अकाली दल (SAD) भी एनडीए में थी, लेकिन अब वह भी अलग हैं। यानी केवल नीतीश कुमार के एनडीए से अलग होने और तेजस्वी यादव से हाथ मिलाने पर मोदी सरकार को दूरगामी नुकसान हो सकता है। तत्काल प्रभाव को देखें तो बीजेपी के हाथ से बिहार जैसा महत्वपूर्ण राज्य हाथ से निकल जाएगा।
    अगर 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी 200 सीटों के आस-पास रहती है तो सरकार गठन में कई तरह के बदलाव दिख सकते हैं। माना कि बीजेपी के साथ अगर यह स्थिति बनती है तो राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश कुमार इसके सूत्रधार के रूप में सामने आएंगे। ऐसी स्थिति में अगर केंद्र में गैर बीजेपी सरकार बनाने की चर्चा शुरू होगी तो नीतीश कुमार अपने चेहरे को मजबूती के साथ आगे कर पाएंगे।

    (साभार )

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