रिपोर्ट – अमन ओझा (ब्यूरो चीफ, कोल्हान)
झारखंड में बांग्ला भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर ‘बांग्ला अकादमी’ के गठन की मांग एक बार फिर जोर पकड़ती नजर आ रही है। हाल ही में संपन्न झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के दौरान निरसा (धनबाद) के विधायक अरूप चटर्जी ने 9 मार्च और 17 मार्च 2026 को सदन में इस महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाते हुए राज्य में बांग्ला अकादमी गठन की आवश्यकता पर बल दिया। इस संबंध में अब बांग्लाभाषी समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा भी सरकार का ध्यान आकृष्ट करते हुए शीघ्र कार्रवाई की मांग की जा रही है। ज्ञात हो कि अविभाजित बिहार में वर्ष 1986 में “बिहार बांग्ला अकादमी” का गठन किया गया था, जो आज भी सक्रिय रूप से कार्य कर रही है। उस समय दक्षिण बिहार, जो वर्तमान में झारखंड का हिस्सा है, वहां बांग्लाभाषी आबादी को ध्यान में रखते हुए यह पहल की गई थी। हालांकि, झारखंड राज्य के गठन के 25 वर्ष बीत जाने के बावजूद अब तक राज्य स्तर पर बांग्ला भाषा के संरक्षण के लिए कोई ठोस संस्थागत व्यवस्था नहीं हो सकी है। बताया जाता है कि झारखंड के 24 जिलों में से करीब 16 जिलों में बांग्लाभाषी आबादी का प्रभाव है, जहां बांग्ला जनसंपर्क की प्रमुख भाषा के रूप में उपयोग की जाती है। इसके बावजूद बांग्ला माध्यम के विद्यालयों की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। पाठ्यपुस्तकों की कमी और योग्य शिक्षकों के अभाव के कारण बांग्ला में पठन-पाठन लगभग ठप पड़ चुका है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि मातृभाषा में शिक्षा के अभाव के चलते बड़ी संख्या में छात्र, विशेषकर बांग्लाभाषी समुदाय के बच्चे, पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। इससे न केवल उनकी शिक्षा प्रभावित हो रही है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान पर भी असर पड़ रहा है। यह भी उल्लेखनीय है कि बांग्ला भाषा भारत की एक प्राचीन और समृद्ध भाषा है, जिसे भारतीय संविधान की अष्टम अनुसूची में स्थान प्राप्त है। साथ ही वर्ष 2024 में भारत सरकार द्वारा इसे ‘शास्त्रीय भाषा’ का दर्जा भी दिया गया है, जिससे इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता और अधिक बढ़ जाती है। इन सभी तथ्यों के आलोक में बांग्लाभाषी समाज ने राज्य सरकार से अपील की है कि झारखंड के लगभग 42 प्रतिशत बांग्लाभाषी नागरिकों की भावनाओं, शैक्षिक जरूरतों और सांस्कृतिक संरक्षण को ध्यान में रखते हुए राज्य में “बांग्ला अकादमी” के गठन की प्रक्रिया जल्द से जल्द शुरू की जाए। अब देखना यह है कि सरकार इस मांग पर कितनी गंभीरता से विचार करती है और आने वाले समय में क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।

