लेखक: देवानंद सिंह
*त्वरित टिप्पणी*
राजनीतिक मर्यादा का गिरता स्तर चिंताजनक
मर्यादा ही लोकतांत्रिक संस्कृति की पहचान होती है
देश इस समय महंगाई, बेरोजगारी, तेल की बढ़ती कीमतों, किसानों और व्यापारियों की परेशानियों जैसे गंभीर मुद्दों से जूझ रहा है। जनता उम्मीद करती है कि सत्ता और विपक्ष दोनों मिलकर समाधान का रास्ता निकालेंगे, लेकिन दुर्भाग्य से राजनीतिक विमर्श का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति अब व्यक्तिगत हमलों और अभद्र भाषा तक पहुंच चुकी है।
प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए “गद्दार” जैसे शब्दों का प्रयोग राजनीतिक असहमति नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं को चोट पहुंचाने वाला व्यवहार माना जाएगा। दूसरी ओर भाजपा की ओर से भी जिस प्रकार राहुल गांधी पर व्यक्तिगत हमले और तीखी टिप्पणियां की जा रही हैं, वह स्वस्थ लोकतंत्र की तस्वीर पेश नहीं करता। सवाल यह है कि क्या राजनीति अब केवल उत्तेजना, बयानबाजी और सोशल मीडिया की सुर्खियों तक सीमित होकर रह जाएगी?
देश की जनता यह देख रही है कि किसान परेशान है, मजदूर संघर्ष कर रहा है, व्यापारी दबाव में है और आम आदमी महंगाई से जूझ रहा है। ऐसे समय में राजनीतिक दल यदि एक-दूसरे को “गद्दार” साबित करने में लगे रहेंगे, तो जनता का भरोसा राजनीति से कमजोर होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सवाल पूछना है और सरकार का काम जवाब देना, लेकिन दोनों पक्षों को यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा की मर्यादा ही लोकतांत्रिक संस्कृति की पहचान होती है।
आज जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल मुद्दों पर बहस करें, समाधान प्रस्तुत करें और जनता के विश्वास को मजबूत करें। नकारात्मक राजनीति और व्यक्तिगत कटाक्ष से तात्कालिक राजनीतिक लाभ भले मिल जाए, लेकिन से लोकतंत्र की गरिमा कमजोर होती है। जनता अब केवल भाषण नहीं, बल्कि जिम्मेदार राजनीति और जवाबदेही चाहती है।

