‘बदलाव’ की रट और ‘सुधार’ से परहेज
राष्ट्र संवाद संवाददाता
मुंबई (इंद्र यादव) आज हमारे समाज में एक अजीब सा विरोधाभास देखने को मिलता है। हर नुक्कड़, हर चाय की दुकान और सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर एक ही शोर है— “समाज बिगड़ गया है, इसे बदलना होगा।” लेकिन जैसे ही इस बदलाव की शुरुआत घर के दरवाजे या खुद के आचरण से करने की बात आती है, लोग चुप्पी साध लेते हैं।
दोगलेपन की संस्कृति
हम चाहते हैं कि सड़कें साफ रहें, लेकिन कूड़ा खुद सड़क पर फेंकने में हमें संकोच नहीं होता। हम भ्रष्टाचार के खिलाफ लंबे चौड़े भाषण देते हैं, लेकिन अपना काम जल्दी निकलवाने के लिए ‘जुगाड़’ ढूंढने से बाज नहीं आते। हम चाहते हैं कि देश में न्याय हो, लेकिन जब बात अपने निजी स्वार्थ की आती है, तो हम नियमों को मरोड़ने में माहिर हो जाते हैं।
“समाज कोई अलग से बनी हुई वस्तु नहीं है, बल्कि हम और आप जैसे व्यक्तियों का समूह है। यदि व्यक्ति नहीं बदला, तो समाज का ढांचा कभी नहीं बदलेगा।”
समझदारी या बेरंग जिंदगी
तस्वीर में लिखा है कि ‘समझदारी’ जिंदगी को बेरंग कर देती है। शायद यह इसलिए कहा गया है क्योंकि आज की ‘समझदारी’ का मतलब हो गया है— सिर्फ अपने फायदे के बारे में सोचना, दूसरों के दुख से उदासीन हो जाना और व्यवस्था को कोसते हुए खुद उसमें लिप्त रहना। हम इतने ‘समझदार’ हो गए हैं कि हमने नैतिकता के रंगों को फीका कर दिया है।
खुद से शुरुआत ही असली क्रांति
बदलाव कभी भी ऊपर से थोपा नहीं जा सकता, यह हमेशा भीतर से बाहर की ओर बहता है। यदि हम चाहते हैं कि समाज में सम्मान हो, तो पहले हमें दूसरों का सम्मान करना सीखना होगा। यदि हम चाहते हैं कि समाज ईमानदार हो, तो हमें खुद की बेईमानियों को त्यागना होगा।
समाज बदलने का झंडा उठाना आसान है, लेकिन आत्म-मंथन का दर्पण देखना कठिन। जिस दिन हम ‘उंगली उठाने’ के बजाय ‘हाथ बढ़ाना’ और ‘भाषण देने’ के बजाय ‘आचरण करना’ सीख जाएंगे, समाज खुद-ब-खुद बदल जाएगा। याद रखिए, बदलाव की मशाल जलाने के लिए पहले खुद को तपाना पड़ता है।
क्या आपको लगता है कि आज की युवा पीढ़ी इस ‘स्वयं के बदलाव’ की दिशा में कदम बढ़ा रही है, या हम अभी भी केवल दोषारोपण के दौर में ही फंसे हैं!

