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    क्या हमारे समाज में महिलाएं आज भी दूसरे दर्जे की नागरिक हैं?

    News DeskBy News DeskJune 26, 2025No Comments5 Mins Read
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    क्या हमारे समाज में महिलाएं आज भी दूसरे दर्जे की नागरिक हैं?

    हमारे समाज में महिलाएं आज भी दूसरे दर्जे की नागरिक हैं या नहीं, इस सवाल का सीधे उत्तर देना कठिन है। ऐसा इसलिए है कि भारत का संविधान पुरुष और महिला दोनों को समान अधिकार प्रदान करता है। आज के युग में महिलाएं लगभग हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ आगे बढ़ चुकी हैं। किसी देश के विकास में पुरुष और महिला दोनों का योगदान होना अनिवार्य है। इसलिए, यह आवश्यक है कि समाज में पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को भी समान अधिकार और समान अवसर प्राप्त हों। आज कई क्षेत्रों को देखते हुए हम एक वाक्य में सीधे यह नहीं कह सकते हैं कि महिलाओं को समान अधिकार नहीं मिल रहा। आज महिलाओं को जो अधिकार प्राप्त हैं, उसे यूंही नहीं मिला। इस अधिकार के लिए अतीत में महिलाओं ने कड़ी मेहनत और बलिदान दिया है। इसके लिए महिलाओं को कड़ी संघर्ष करनी पड़ी और अनेक यातनाएं सहनी पड़ीं। जहां कुछ पुरुषों ने महिलाओं के अधिकारों का विरोध किया, वहीं अन्ध्र ने, कम संख्या में ही सही, पूरे दिल से महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया। महात्मा गांधी ने कहा था कि महिलाएं देश और समाज के कल्याण में प्रमुख भूमिका निभा सकती हैं। समाज को महिलाओं की व्यक्तित्व विकास तथा स्वावलंबन पर ध्यान देना चाहिए। इसके लिए गृहिणियों की अधूरी शिक्षा को पूरा करनी होगी। सभी की जिम्मेदारी है कि महिलाओं में जो प्रतिभाएं छिपी हैं, उसे उजागर करके विकसित कराया जाए और समाज तथा परिवार के उत्कर्ष में अपनी योगदान दें। इतिहास बताता है कि एक-दो दशक पहले तक हमारे समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता था। न केवल असम या भारत में,

     

     

     

    बल्कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में महिलाओ का स्थान हमेशा पुरुषों से नीची रही हैं। समाज के निर्माण में पुरुष और महिला दोनों समान रूप से योगदान करते हैं, इसलिए सरकार महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। गत समय में, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं कार्यक्रम ने बालिकाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की है और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किया है। महिलाओं के जीवन को उनके सभी गुणों से संवारने का मौका देना चाहिए। इस जिम्मेदारी को हम नकार नहीं सकते। इसमें समाज और माता-पिता की भूमिका अहम हैं। नारी दयालु होती है नारी में ममत्व होती है। नारी आदर्श, दया, करूणा, सहनशीलता, धैर्य, त्याग आदि अनेक गुणों से युक्त होती है। नारी को सृष्टि की मुख्य प्रेरक शक्ति माना जाता है। महिला और पुरुष संसार के दो अविभाज्य अंग हैं। महिलाओं के बिना दुनिया में कहीं भी सफल समाज नहीं बनाया जा सकता।

     

    आज की महिलाएं उच्च शिक्षित हैं, उच्च पद पर आसीन हैं और आत्मनिर्भर बन गई हैं। माता-पिता को अपनी बेटियों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाना चाहिए। क्योंकि हमारा समाज हमेशा ज्ञानी, बुद्धिमान और शिक्षित महिलाओं के कारण प्रज्ालित रहती है। इन सब में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक लड़की को शिक्षित करना है। क्योंकि एक लड़की ही भविष्य में एक माँ बनकर अपने बच्चों को शिक्षित करेगी। लोगों में जागरूकता बढ़ाने चाहिए साथ ही महिलाओं में अशिक्षा को दूर करने के उपाय किये जाने चाहिए। शिक्षित महिलाएं शिक्षा का मूल्य समझती हैं और अपने बच्चों की शिक्षा पर ध्यान भी देती हैं।

     

     

    उचित शिक्षा महिलाओं में आत्मविश्वास की कमी को दूर करती है और हमारे देश को विकास के पथ पर आगे बढ़ाने में मदद करती है। हालाँकि, यह देखा जा सकता है कि दुनिया के किसी भी देश में महिलाओं को पूर्ण मानवीय स्वातंत्रता प्राप्त नहीं हुई है, चाहे वह यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित उन्नत पूंजीवादी देश हों या भारत जैसे अर्थ-सामंती, अर्ध-पूंजीवादी दुनिया की तीसरी देश हों। विकसित देशों की महिलाएं हमारे देश की तुलना में सामंती पिछड़े विचारों, अंधविश्वासों और मानसिक हीनता से कहीं अधिक मुक्त हैं। लंबे संघर्ष के बाद, उन्हें शिक्षा, मतदान अधिकार और आंदोलन की स्वतंत्रता सहित कई सामाजिक अधिकार हमसे पहले मिल चुके हैं। नौकरियों, व्यवसायों आदि में भागीदारी के परिणामस्वरूप अधिकांश महिलाएँ आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो गई हैं, लेकिन कई मामलों में वे पराधीन भी हैं। संयुक्त व्यवसाय के नाम पर महिलाओ का प्रयोग किया जा रहा है। उन देशों में महिलाओं के ऊपर हिंसा, यौन उत्पीड़न, अत्याचार बढ़ रहा है।

     

    पितृसत्तात्मक देश यौन हिंसा से मुक्त नहीं। विद्यालय-महाविद्यालय, नौकरी- व्यावसाय आदि किसी भी शैक्षणिक स्थल हो या कार्यस्थल सभी जगह नारी असुरक्षित है। यहां तक कि भारतीय महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित माना जानेवाला जगह उनका अपना बेडरूम भी सुरक्षित नहीं है। किसी पुरुष की यौनइच्छा की पूर्ति के लिए कोई उम्रसीमा महत्व नहीं रखता, न ही कोई जैविक संबंध और न ही कोई अनुमति बस एक महिला सामने आ जाए । यही कारण है कि उनकी बेटियों का उनके पिता द्वारा यौन शोषण किया जाता है और रिश्तेदारों द्वारा उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। हमारे समाज में हर किसी को यह समझाना होगा कि महिलाएं प्रकृति की अद्वितीय रचना हैं। जिसके बिना इस संसार का अस्तित्व न के बराबर हैं। महिलाएं सृष्टि और प्रेरणा का शाश्वत प्रतीक हैं।

     

    लेखिका : मनीषा शर्मा
    जालूकबारी, गुवाहाटी

    *क्या हमारे समाज में महिलाएं आज भी दूसरे दर्जे की नागरिक हैं*
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