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    Home » क्यों डर के छुप गए मानवाधिकारों की बात करने वाले ठेकेदार देश, क्या बदत्तर हालातों में नहीं की जा सकती थी अफगानिस्तान की मदद ?
    Breaking News Headlines अन्तर्राष्ट्रीय राष्ट्रीय संपादकीय संवाद विशेष

    क्यों डर के छुप गए मानवाधिकारों की बात करने वाले ठेकेदार देश, क्या बदत्तर हालातों में नहीं की जा सकती थी अफगानिस्तान की मदद ?

    Devanand SinghBy Devanand SinghAugust 17, 2021No Comments5 Mins Read
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    क्यों डर के छुप गए मानवाधिकारों की बात करने वाले ठेकेदार देश, क्या बदत्तर हालातों में नहीं की जा सकती थी अफगानिस्तान की मदद ?………
    देवानंद सिंह
                                        तालिबान ने अफगानिस्तान पर जिस तरह बंदूक की नोक पर कब्जा किया है, यह केवल अफगानिस्तान के भविष्य पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाता है, बल्कि विश्व समुदाय पर भी सवाल खड़े करता है। अपने आप को दुनिया का चौधरी समझने वाले अमेरिका पर तो सबसे बड़े सवाल खड़े करता है। क्योंकि यह केवल अफगानिस्तान की ही हार नहीं है, बल्कि अमेरिका के साथ साथ दुनिया में लोकतंत्र स्थापित करने के सभी पक्षधर देशों की भी हार है। यह बात बहुत हैरान करती है कि जिस तरह अफगानिस्तान में मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, उसको लेकर भी किसी देश के मुंह से कुछ नहीं निकल रहा है। भारत की अध्यक्षता में भले ही आयोजित हुई यूनाइटेड नेशन सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की बैठक में अफगानिस्तान के हालातों पर चिंता जाहिर की गई हो और उसे आतंकवाद का पनाहगार नहीं बनने देने का संकल्प लिया गया हो, पर यह चिंता तब जाहिर की जा रही है, जब तालिबान ने काबुल पर भी कब्जा कर लिया है,  वहां के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तक देश से भाग चुके हैं। दुनिया के कई देश खुले तौर पर तालिबानी हुकूमत को मान्यता देने की होड़ में जुट गए हैं। वह भी उन हालातों में जब तालिबानियों का इतिहास दुनिया के सामने है। क्या दुनिया के देश अफगानिस्तान को बचा नहीं सकते थे ? जब वहां पिछले 20 सालों से लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम थी। भारत तक ने वहां हजारों करोड़ की परियोजनाओं में निवेश किया हुआ है। अमेरिका कई ट्रिलियन डॉलर खर्च कर चुका है। अगर, शायद दुनिया अफगानिस्तान के साथ खड़ी हो जाती तो वहां तालिबानी अपना कब्जा करने में सफल नहीं हो पाते। अभी तालिबान नेता कह रहे हैं कि वे अफगानिस्तान के सारे पक्षों को साथ लाने के लिए तैयार हैं, लेकिन उसकी पुरानी हरकतों को देखते हुए उन पर भरोसा करना हर किसी के लिए मुश्किल है। शॉर्ट टर्म में यह तालिबान की बड़ी जीत है और वे अपनी जीत का पूरी तरह से राजनीतिक लाभ पाने की कोशिश करेंगे। जिस तरह के हालात बन रहे थे, तालिबान के खिलाफ दुनिया का कोई भी देश खड़ा नहीं हुआ तो काबुल के पास सरेंडर के अलावा कोई चारा था ही नहीं। यह बड़ा इंटेलिजेंस फेलियर भी है। पहले अमेरिकी इंटेलिजेंस कह रही थी कि काबुल पर कब्जे में तालिबान को 30 दिन लगेंगे, लेकिन 30 दिन तो छोड़िए, चंद घंटों में ही उसने काबुल पर कब्जा जमा लिया। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति के साथ साथ बड़े लोग भाग गए, लेकिन मरने के लिए रह गई तो केवल आम जनता। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि तालिबान को जो मौका मिला, वह अमेरिका की गलत नीतियों और बाइडन सरकार की सेना वापस बुलाने की वजह से। उसका उन्होंने बैटल ग्राउंड में फायदा उठाया और काबुल को चंद घंटों में फतह कर लिया।
    अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी की कोशिशें तो ओबामा के वक्त से ही चल रही थीं, जिससे साफ जाहिर हो रहा था कि अमेरिका की राजनीतिक बहसों में अफगानिस्तान का मुद्दा धीरे-धीरे नीचे आ रहा है, जिसकी वजह से लगातार संभावना बन रही थी कि अमेरिका धीरे-धीरे वहां अपने फुटप्रिंट्स कम करेगा, लेकिन ओबामा और ट्रंप, दोनों ने सेनाएं तो कम कीं, लेकिन अफगानिस्तान में ढांचे को खत्म करने की ओर कभी भी नहीं बढ़े। बाइडन सरकार ने सबकुछ खत्म कर दिया, उन्होंने पीठ दिखाकर अपने सैनिकों को बुला लिया और अफगानिस्तान को मरने के लिए उसके हाल पर छोड़ दिया। तालिबान ने इसी का फायदा उठाया। नतीजन, भले ही, अफगानिस्तान आज अपने आंसू रोने को मजबूर हो, लेकिन बाइडन सरकार की भी या बहुत बड़ी राजनीतिक हार है। जैसी हार वियतनाम में हुई थी, वैसी ही। इसे वियतनाम हार का ही दूसरा नमूना कहा जा सकता है।
    अमेरिकी सैनिकों की वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के पहले ही मामला यहां तक पहुंच गया कि अमेरिका तालिबान से कह रहा है कि वह काबुल पर भले हमला करे, लेकिन वहां मौजूद अमेरिकियों पर ना करे। इसे उनका प्रतिद्वंद्वी चीन प्रॉजेक्ट करेगा कि यह अमेरिका की कितनी बड़ी हार है और उसे परसेप्शन बनाने में इससे फायदा मिलेगा। दूसरा, चीन के पाकिस्तान के साथ जिस तरह के घनिष्ठ संबंध हैं, वह चाहेगा कि अफगानिस्तान में जिस अराजकता की संभावना बनती दिख रही है, उसका प्रभाव उसके यहां शिनच्यांग में न पड़े। चीन ने तालिबान को बुलाया भी था और तालिबान के लीडर्स वहां गए भी थे। वहां तालिबानियों ने कहा था कि वे चीन और उसके निवेश का स्वागत करते हैं, आतंकवाद के मसले पर चीन को कोई परेशानी नहीं होने देंगे। लेकिन दूरगामी परिणाम चीन के लिए भी वही होंगे, जो बाकी दुनिया के लिए होंगे। अगर, कोई चरमपंथी विचारधारा अफगानिस्तान में पनप रही है और उसे बड़ी जीत मिली है तो इसका असर उसके पड़ोसी देशों सहित बाकियों पर भी पड़ेगा। अब यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि अफगानिस्तान की भविष्य की तस्वीर कैसी होगी ? क्या दुनिया तालिबान द्वारा प्रोजेक्ट सरकार को मान्यता दंगे या फिर वहां लोकतंत्र बहाली को लेकर कुछ कदम उठाएंगे ? अगर, तालिबान का वही पुराना तरीका बरकार रहेगा तो उस स्थिति में क्या होगा ? कैसे मानवाधिकारों की रक्षा की जाएगी ? दुनिया भले ही इस पर चिंतन मंथन करे, लेकिन तालिबान राज में, जो सबसे अधिक मुश्किल होगा, वह आम नागरिकों का जीवन। खासकर, महिलाओं, बच्चों पर जुल्म होंगे। वर्तमान हालातों में जिस तरह दुनिया अफगानिस्तान का तमाशा देखती रही, लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया गया, ऐसे में आम लोग मानवाधिकारों की रक्षा के लिए किसी से कोई उम्मीद रखें, ऐसा कहना मुश्किल होगा।
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