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    Home » प्रवासी कामगार विजय ने मास्क उधोग को बनाया
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    प्रवासी कामगार विजय ने मास्क उधोग को बनाया

    Devanand SinghBy Devanand SinghSeptember 28, 2020No Comments5 Mins Read
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    प्रवासी कामगार विजय ने मास्क उधोग को बनाया स्वरोजगार का आधार। लोकल को भोकल बनाने के नारा से मिला प्रेरणा। विजय के मास्क उधोग से दर्जनों परिवार को मिला रोजगार।
    राजेश कुमार, खोदावंदपुर (बेगूसराय). वैश्विक महामारी कोरोना के कारण देश में उधोग धंधे बंद रहने के से बड़ी संख्या में कामगार बेरोजगार हो गये हैं. लाखों कामगारों देश के विभिन्न शहरों से अपने घर लौट आये. घर पर परिजनों के लिए दो जुम की रोटी का बन्दोबस्त करना इनके लिए समस्या था.

    ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रेरणा आपदा को अवसर में बदलेगें. रोजगार करने के बजाय रोजगार सृजन का अवसर तलाशेगें. उनके इस नारा में प्रवासी कामगार विजय की आंखें खोल दी. मरता तो क्या नहीं करता, इस कहावत को चरितार्थ करते हुए विजय ने गांव में ही अपना स्वरोजगार खड़ा करने का निर्णय लिया और उसने समय की मांग को देखते हुए मास्क निर्माण और उसका विपनन को अपने जीवन यापन का हथियार बनाया.

    जानिए विजय को-
    विजय कुमार चौधरी खोदावंदपुर प्रखंड के मेघौल निवासी स्व. सूर्यदेव चौधरी का छोटा पुत्र है. इसके घर में विधवा मां के अलावे एक भाई और एक बहन है. असमय पिता के गुजर जाने से परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी विजय के कंधे पर आ गया. परिवार की आर्थिक स्थिति बदतर रहने के कारण विजय दिल्ली चला गया. जहां किसी प्राइवेट फेक्ट्री में नाईट गार्ड का नौकरी करता था. और अपने परिवार का भरण पोषण करने लगा. कोरोना के कारण फेक्ट्री बंद हो गया और इसकी नौकरी चली गयी. तथा अपने घर वापस आ गया. गांव में ना अपनी खेतीबाड़ी ना रोजगार, घर में चूल्हा जलना भी मुश्किल हो गया. विजय ने हिम्मत नहीं हारा, तथा आपदा को अवसर में बदलने का संकल्प लिया.

    शुरू किया मास्क निर्माण व विकनन का स्वरोजगार-
    कहते हैं जहां चाह वहां राह, विजय ने कोरोना महामारी से बचाव को लेकर मास्क निर्माण को अपने स्वरोजगार बनाया. अपने घर पर ही पारस मास्क उधोग मेघौल नाम से प्रतिष्ठान खोलकर कपड़े से मास्क का निर्माण करने लगा. तथा उसको बेचकर प्राप्त आमदनी से अपने परिवार का भरण पोषण करने लगा.

    व्यवसाय को दिया उड़ान-
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संबोधन को सुनकर विजय ने प्रेरणा ग्रहण किया.लोकल को भोकल करने का नारा ने विजय की आंखें खोल दी. इसने मास्क निर्माण को वृहत पैमाने पर छोटे उधोग को विकसित करने का मन बनाया.

    फिर क्या था-
    इसने अपने प्रतिष्ठान का निबंधन एमएसएमई से कराया, तब अपने परिजनों के अलावे गांव के एक दर्जन से अधिक महिलाओं ने मास्क निर्माण से जोड़कर स्वयं विपनन के कार्य को देखने लगा. दो दर्जन महिला और एक दर्जन प्रवासी कामगारों को इसने रोजगार दिया. पारस मास्क उधोग से जुड़कर गांव की दो दर्जन महिलाएं मास्क निर्माण कर स्वरोजगार कर रही है. इनमें सोनी कुमारी, शांति देवी, पिंकी देवी, सोनी देवी, निधि भारती, खुशबू कुमारी, पूनम कुमारी, राखी कुमारी, अनिता देवी, प्रगति कुमारी, आरती देवी एवं अन्य ग्रामीण महिलाएं शामिल हैं. वो अपना घर गृहस्थी, चुल्हा चौका को संभालती हुई इस संस्था के लिए मास्क बनाती है. इस रोजगार से इन्हें औसतन पांच हजार रुपये अतिरिक्त कमाई हो जाता है. वहीं सुमित झा, मुरारी झा, संजय कुमार सहित दर्जनों ऐसे युवा अप्रवासी कामगार हैं, जो इस प्रतिष्ठान में मास्क के विपनन का कार्य करते हैं. साईकिल, मोटरसाइकिल से गांव की गलियों एवं ग्रामीण बाजारों के दुकानदारों व पास पड़ोस के दुकानों में खुदरा व थौक मास्क बेचते हैं. इससे इन्हें भी पांच से छह हजार रुपये औसत आमदनी हो जाता है.

    मास्क निर्माण में खर्च व आय-
    विजय की माने तो ग्रामीण बाजार की मांग को देखते हुए कपड़े की मास्क व सस्ता मास्क बनाते हैं। मास्क निर्माण में कपड़े पर पांच से सात रुपया, सिलाई पर दो से चार रुपया तथा विपनन पर एक से दो रूपया कुल आठ से ग्यारह रुपया खर्चा आता है। जिसकी विक्री 15 से 20 रुपये तक में करते हैं। और इससे उन्हें एक अच्छी खासी आमदनी हो जाता है। विजय कहता है आमदनी से ज्यादे खुशी हमको इस बात से है कि हम दूसरे के यहां दिल्ली में रोजगार करते थे. आज अपना स्वरोजगार है। घर परिवार के साथ रहकर काम कर रहे हैं और दो तीन दर्जन दूसरे परिवार को रोजगार दे रहे हैं।

    वित्तीय मदद व व्यापक बाजार की मांग-
    मास्क निर्माता विजय बताते हैं कि हमारी इच्छा इस व्यवसाय को और व्यापक रुप देने का है। इससे सरकार से मुझे आर्थिक मदद की जरूरत है। मुझे दान नहीं ऋण चाहिए, प्रधानमंत्री ने भी आत्म निर्भर योजना के तहत रोजगार के लिए ऋण देने की वकालत करते हैं। सरकार या बैंक इसके लिए मुझे आवश्यक आर्थिक मदद करती है तो इस व्यवसाय को व्यापक स्तर पर ले जाने की योजना हैं। साथ ही सरकार एवं उधोग विभाग से हमारी उपेक्षा है कि हमारी उत्पाद के विक्रि के लिए व्यापक बाजार मिलता है, तो हमारे रोजगार के लिए कामगारों को और अधिक लाभ मिलेगा। विजय ने दूसरे अप्रवासी कामगारों से भी गांव में ही अपने कौशल और रुचि के अनुसार स्वरोजगार अपनाकर घर पर खुशी जीवन जीने तथा अपने प्रदेश बिहार को उन्नत बनाने का प्रार्थना किया है।

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