कर चोरी का काला कारोबार: सरकारी खजाने पर डाका, जनता की सेहत से खिलवाड़
पान मसाला के कथित अवैध उत्पादन पर शिकंजा, अब जवाबदेही और सख्त कार्रवाई की जरूरत
देवानंद सिंह
करोड़ों रुपये की कथित टैक्स चोरी का मामला केवल सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाने का मामला नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था की निगरानी, कारोबारी जवाबदेही और कानून के पालन पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। दुमका के भटुरिया गांव में पान मसाला और जर्दा के कथित अवैध उत्पादन से जुड़े मामले में डीजीजीआई की कार्रवाई और कारोबारी मनीष राय को न्यायिक हिरासत में भेजे जाने की घटना इसी ओर इशारा करती है। मामले में कर अपवंचन की राशि 18 से 20 करोड़ रुपये के बीच बताई जा रही है। यह अंतर भी बताता है कि अंतिम वित्तीय आकलन और जांच के निष्कर्ष सामने आना अभी बाकी है।
करोड़ों की हेराफेरी, निगरानी तंत्र पर सवाल
आरोप है कि संबंधित परिसर में आवश्यक पंजीकरण के बिना पान मसाला और जर्दा का उत्पादन किया जा रहा था। तलाशी के दौरान पैकिंग की नौ मशीनें बरामद होने की जानकारी भी सामने आई है। यदि जांच में ये आरोप प्रमाणित होते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि कथित तौर पर इतना बड़ा कारोबार कितने समय से चल रहा था और संबंधित विभागों की निगरानी में इसकी भनक पहले क्यों नहीं लगी? क्या कारोबार की गतिविधियों पर नियमित नजर रखी जा रही थी, या फिर व्यवस्था की खामियों का फायदा उठाकर सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाया जा रहा था?
इन सवालों के जवाब केवल गिरफ्तारी से नहीं मिलेंगे। इसके लिए कारोबार की पूरी अवधि, उत्पादन की वास्तविक मात्रा, आपूर्ति शृंखला, बिक्री के नेटवर्क और कर देनदारी की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
सरकारी खजाने को नुकसान, आखिर कीमत कौन चुकाएगा?
कर व्यवस्था किसी भी राज्य की आर्थिक बुनियाद होती है। इसी राजस्व से सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और जनकल्याण की योजनाएं संचालित होती हैं। जब कोई कारोबारी कथित तौर पर कर नियमों को दरकिनार करता है, तो नुकसान सिर्फ सरकारी खाते तक सीमित नहीं रहता; उसका असर सार्वजनिक संसाधनों और व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी पड़ता है।
ऐसे मामलों में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि जांच केवल एक आरोपी तक सीमित न रहे। यदि उत्पादन, वितरण या बिक्री की प्रक्रिया में दूसरे लोगों अथवा संस्थानों की भूमिका सामने आती है, तो कानून के अनुसार उनकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। साथ ही, कर चोरी की वास्तविक राशि का निर्धारण कर नियमानुसार वसूली और दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।
मामला सिर्फ टैक्स का नहीं, स्वास्थ्य सुरक्षा का भी है
पान मसाला और जर्दा जैसे तंबाकू उत्पादों के निर्माण एवं बिक्री पर लागू नियमों का पालन सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यदि उत्पादन बिना जरूरी अनुमति, पंजीकरण या निर्धारित मानकों के हुआ है, तो उत्पाद की गुणवत्ता, पैकेजिंग और नियामकीय अनुपालन की जांच भी होनी चाहिए। राजस्व संबंधी अनियमितताओं की पड़ताल के साथ यह देखना भी जरूरी है कि कहीं उपभोक्ताओं को नियमों के विरुद्ध निर्मित उत्पाद तो नहीं बेचे गए।
कार्रवाई ऐसी हो, जो मिसाल बने
डीजीजीआई की कार्रवाई ने मामले को सामने जरूर ला दिया है, लेकिन असली कसौटी जांच की निष्पक्षता और उसके परिणाम होंगे। किसी भी आरोपी को दोषी ठहराने का अधिकार न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही तय होता है। इसलिए आरोपों की गंभीरता के साथ कानून के सिद्धांतों और निष्पक्ष सुनवाई का सम्मान भी उतना ही जरूरी है।
सरकार और संबंधित जांच एजेंसियों को चाहिए कि वे इस मामले की तह तक जाएं, कर चोरी की वास्तविक राशि निर्धारित करें और यदि आरोप साबित हों, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कठोर वैधानिक कार्रवाई सुनिश्चित करें। साथ ही, ऐसी निगरानी व्यवस्था विकसित की जाए जिससे अवैध उत्पादन और कर अपवंचन के मामलों का समय रहते पता चल सके।
कानून का भय केवल छापेमारी से नहीं, निश्चित कार्रवाई से पैदा होता है। यदि करोड़ों रुपये की कथित कर चोरी के मामले जांच और न्यायिक प्रक्रिया में प्रमाणित होते हैं, तो दोषियों को जवाबदेह बनाना जरूरी है। सरकारी राजस्व की रक्षा, कारोबार में पारदर्शिता और उपभोक्ता सुरक्षा—तीनों को समान प्राथमिकता दिए बिना ऐसी घटनाओं पर प्रभावी अंकुश नहीं लगाया जा सकता।
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