नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दूसरी शादी (बिगैमी) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 494 के तहत दर्ज शिकायत पर संज्ञान लेने या आरोपी को समन जारी करने के शुरुआती चरण में कथित दूसरी शादी में ‘सप्तपदी’ सहित सभी वैवाहिक रस्मों के संपन्न होने के ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं है। अदालत ने कहा कि विवाह की आवश्यक धार्मिक रस्में वास्तव में पूरी हुई थीं या नहीं, यह तथ्य परीक्षण (ट्रायल) के दौरान साक्ष्यों के आधार पर तय किया जाएगा। इस आधार पर हाईकोर्ट ने पति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया।
यह फैसला न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह ने खड़क सिंह धपोला बनाम उत्तराखंड राज्य एवं अन्य मामले में सुनाया। अदालत दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 के तहत दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें हल्द्वानी के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी द्वारा वर्ष 2016 में जारी समन आदेश, नैनीताल के द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित पुनरीक्षण आदेश तथा आईपीसी की धारा 494 और 504 के तहत दर्ज पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने की मांग की गई थी।
मामले के अनुसार शिकायतकर्ता महिला का विवाह 7 मार्च 1988 को याचिकाकर्ता से हुआ था। महिला ने आरोप लगाया कि पहली शादी विधिक रूप से समाप्त किए बिना उसके पति ने 4 जुलाई 2010 को दूसरी शादी कर ली। शिकायत के बाद मजिस्ट्रेट ने शिकायतकर्ता का बयान सीआरपीसी की धारा 200 के तहत दर्ज किया तथा पुलिस रिपोर्ट प्राप्त करने के बाद पति को आईपीसी की धारा 494 और 504 के तहत समन जारी किया। समन आदेश के विरुद्ध दायर पुनरीक्षण याचिका भी खारिज होने के बाद पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि कथित दूसरी शादी हिंदू विवाह की अनिवार्य रस्मों के अनुरूप संपन्न होने का कोई प्रमाण रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है। विशेष रूप से यह कहा गया कि ‘सप्तपदी’ अर्थात सात फेरे संपन्न होने का कोई साक्ष्य नहीं है, जबकि हिंदू विवाह की वैधता के लिए यह आवश्यक रस्म मानी जाती है। इस आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य निर्णय का हवाला देते हुए कहा गया कि जब आवश्यक रस्मों का प्रमाण ही उपलब्ध नहीं है, तब आईपीसी की धारा 494 के तहत अपराध नहीं बनता और समन आदेश निरस्त किया जाना चाहिए।
वहीं शिकायतकर्ता पत्नी की ओर से इस दलील का विरोध करते हुए कहा गया कि समन जारी करने के प्रारंभिक चरण में प्रत्येक वैवाहिक रस्म का प्रमाण प्रस्तुत करना कानून की मंशा नहीं है। पक्षकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के पूजा शर्मा बजाज बनाम कुणाल बजाज तथा सुप्रीम कोर्ट के के. नीलावेनी बनाम राज्य फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि दूसरी शादी की आवश्यक रस्में वास्तव में संपन्न हुई थीं या नहीं, यह ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर तय किया जाने वाला प्रश्न है। यह भी तर्क दिया गया कि पहली पत्नी सामान्यतः दूसरी शादी में उपस्थित नहीं होती, इसलिए उससे प्रारंभिक स्तर पर सभी रस्मों के प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करने की अपेक्षा करना न्यायसंगत नहीं होगा।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में विचारणीय प्रश्न केवल इतना है कि क्या समन जारी करने के स्तर पर ही शिकायतकर्ता को दूसरी शादी की सभी आवश्यक धार्मिक रस्मों को प्रमाणित करना आवश्यक है। अदालत ने इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने के. नीलावेनी मामले में स्पष्ट किया है कि विवाह की आवश्यक रस्मों का पालन हुआ या नहीं, यह ट्रायल के दौरान तय होने वाला विषय है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ‘सप्तपदी’ हिंदू विवाह की महत्वपूर्ण रस्मों में से एक हो सकती है, लेकिन उसके संपन्न होने या न होने का परीक्षण साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल कोर्ट करेगा। संज्ञान लेने अथवा समन जारी करने के प्रारंभिक चरण में इस प्रश्न पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसलिए केवल इस आधार पर कि शिकायत में ‘सप्तपदी’ का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, आपराधिक कार्यवाही को समाप्त नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि समन जारी करने से पहले प्रत्येक वैवाहिक रस्म के कठोर प्रमाण की अनिवार्यता स्वीकार कर ली जाए, तो पहली पत्नी के लिए दूसरी शादी के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करना लगभग असंभव हो जाएगा। अधिकांश मामलों में पत्नी के पास केवल परिस्थितिजन्य तथ्यों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही शिकायत दर्ज कराने का अवसर होता है। ऐसे में प्रारंभिक स्तर पर अत्यधिक कठोर प्रमाण की अपेक्षा न्याय के उद्देश्य को प्रभावित कर सकती है।
इन सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन आदेश और पुनरीक्षण न्यायालय के आदेश में कोई ऐसी कानूनी त्रुटि नहीं है, जिसमें सीआरपीसी की धारा 482 के तहत हस्तक्षेप की आवश्यकता हो। परिणामस्वरूप अदालत ने याचिका खारिज करते हुए पति के विरुद्ध चल रही आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का आदेश दिया।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय बिगैमी से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जाएगा। फैसले से यह सिद्धांत और स्पष्ट हुआ है कि दूसरी शादी की वैधता अथवा उसमें आवश्यक धार्मिक रस्मों के पालन का अंतिम परीक्षण ट्रायल के दौरान होगा। प्रारंभिक स्तर पर केवल ‘सप्तपदी’ के प्रत्यक्ष प्रमाण के अभाव में शिकायत या समन आदेश को निरस्त नहीं किया जा सकता। यह फैसला उन मामलों में भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन देगा, जहां पहली पत्नी दूसरी शादी का आरोप लगाती है लेकिन उसके पास विवाह की प्रत्येक रस्म का प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं होता।

