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    Home » केरल हाईकोर्ट ने कहा बाइक चालक की लापरवाही का खामियाजा पीछे बैठे यात्री को नहीं भुगतना होगा
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    केरल हाईकोर्ट ने कहा बाइक चालक की लापरवाही का खामियाजा पीछे बैठे यात्री को नहीं भुगतना होगा

    News DeskBy News DeskAugust 7, 2026No Comments5 Mins Read
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    केरल हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे यात्री (पिलियन राइडर) का मुआवजा केवल इस आधार पर कम नहीं किया जा सकता कि मोटरसाइकिल चालक कथित रूप से दुर्घटना के लिए लापरवाह था। अदालत ने कहा कि चालक की लापरवाही स्वतः पीछे बैठे यात्री पर नहीं थोपी जा सकती। ‘योगदानात्मक लापरवाही’ (Contributory Negligence) का सिद्धांत तभी लागू होगा जब यह साबित हो कि घायल व्यक्ति ने स्वयं भी दुर्घटना में किसी प्रकार का योगदान दिया था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) द्वारा मुआवजे में की गई 50 प्रतिशत कटौती को निरस्त करते हुए घायल दावेदार को अतिरिक्त क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया।

     

     

    यह फैसला न्यायमूर्ति अनिल के. नरेंद्रन ने संतोष बनाम ई.ए. सैनाबा एवं अन्य मामले में सुनाया। मामला वर्ष 2004 की एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। याचिकाकर्ता संतोष 28 जून 2004 को मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे हुए यात्रा कर रहे थे। इसी दौरान मोटरसाइकिल की टक्कर एक स्टेज कैरिज बस से हो गई। दुर्घटना में संतोष गंभीर रूप से घायल हो गए। बस की मालिक ई.ए. सैनाबा, चालक फजलुद्दीन तथा बीमाकर्ता न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को पक्षकार बनाते हुए उन्होंने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, एर्नाकुलम के समक्ष मुआवजे का दावा प्रस्तुत किया।

     

    मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने सुनवाई के बाद कुल 57,922 रुपये का मुआवजा निर्धारित किया, लेकिन यह मानते हुए कि मोटरसाइकिल चालक भी दुर्घटना के लिए 50 प्रतिशत जिम्मेदार था, दावेदार के मुआवजे में आधी कटौती कर दी। परिणामस्वरूप संतोष को केवल 28,961 रुपये और ब्याज देने का आदेश दिया गया। इसी निर्णय को चुनौती देते हुए उन्होंने केरल हाईकोर्ट में अपील दायर की।

    हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि अधिकरण ने बिना पर्याप्त कानूनी आधार के मोटरसाइकिल चालक की कथित योगदानात्मक लापरवाही का प्रभाव सीधे पीछे बैठे यात्री पर डाल दिया। अदालत ने कहा कि पुलिस द्वारा दाखिल आरोपपत्र केवल बस चालक के खिलाफ प्रस्तुत किया गया था। मोटरसाइकिल चालक के विरुद्ध न तो कोई आरोपपत्र दाखिल किया गया था और न ही कोई ऐसा मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध था जिससे उसकी लापरवाही सिद्ध होती। केवल घटनास्थल के दस्तावेज या वाहन निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर पिलियन राइडर का मुआवजा कम करना विधिसम्मत नहीं माना जा सकता।

    अपने फैसले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के यशवंत कृष्णा कुंबर मामले का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि योगदानात्मक लापरवाही का सिद्धांत तभी लागू होता है जब घायल व्यक्ति के स्वयं के आचरण की जांच कर यह पाया जाए कि उसने भी दुर्घटना होने में योगदान दिया है। यदि घायल केवल पीछे बैठा यात्री है और उसके किसी लापरवाह आचरण का प्रमाण नहीं है, तो चालक की कथित गलती का दुष्परिणाम उस पर नहीं डाला जा सकता।

    न्यायालय ने स्पष्ट किया कि योगदानात्मक लापरवाही का निर्धारण प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। किसी वाहन के चालक की लापरवाही और वाहन में बैठे यात्री की जिम्मेदारी को एक समान नहीं माना जा सकता। यदि यात्री के खिलाफ कोई स्वतंत्र लापरवाही सिद्ध नहीं होती, तो उसके वैधानिक मुआवजे में कटौती नहीं की जा सकती।

    हाईकोर्ट ने केवल 50 प्रतिशत कटौती को समाप्त नहीं किया, बल्कि मुआवजे की विभिन्न मदों की भी पुनः समीक्षा की। अदालत ने वर्ष 2004 की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दावेदार की अनुमानित मासिक आय 3,500 रुपये से बढ़ाकर 4,500 रुपये निर्धारित की। साथ ही चिकित्सा व्यय, अतिरिक्त पोषण, कपड़ों की क्षति तथा आय की हानि जैसी मदों में भी मुआवजा बढ़ाया गया। हालांकि दर्द एवं पीड़ा तथा जीवन की सुविधाओं में कमी के लिए अतिरिक्त मुआवजा देने से अदालत ने इनकार कर दिया, क्योंकि स्थायी दिव्यांगता या उसकी आय पर प्रभाव का पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं था।

    ब्याज के संबंध में भी अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि दावेदार को दावा याचिका दायर करने की तिथि से ब्याज मिलेगा, लेकिन जिस अवधि तक मुकदमा स्वयं दावेदार की देरी के कारण लंबित रहा, उस अवधि का ब्याज देय नहीं होगा।

    अंततः हाईकोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दावेदार को 45,389 रुपये की अतिरिक्त क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया। इसमें पहले की गई 50 प्रतिशत कटौती की बहाली के साथ अन्य मदों में बढ़ाया गया मुआवजा भी शामिल है। अदालत ने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को निर्देश दिया कि प्रमाणित आदेश की प्रति प्राप्त होने के दो माह के भीतर अतिरिक्त मुआवजा, 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज (निर्धारित अवधि के लिए) तथा आनुपातिक वाद व्यय दावेदार के बैंक खाते में जमा कराया जाए।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला मोटर दुर्घटना मुआवजा कानून की दृष्टि से महत्वपूर्ण नज़ीर साबित होगा। इससे यह सिद्धांत और मजबूत हुआ है कि किसी वाहन के चालक की कथित लापरवाही का दायित्व स्वतः उस वाहन में बैठे निर्दोष यात्री पर नहीं डाला जा सकता। भविष्य में ऐसे मामलों में मोटर दुर्घटना दावा अधिकरणों को प्रत्येक दावेदार की व्यक्तिगत भूमिका और आचरण का स्वतंत्र मूल्यांकन करना होगा, तभी योगदानात्मक लापरवाही के आधार पर मुआवजे में कटौती की जा सकेगी।

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