कौन हैं परिमल नाथवानी , जिन्होंने झारखंड में हेमंत को दी मात
राष्ट्र संवाद संवादाता
राज्यसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन को मात दे कर परिमल नाथवानी ने यह साबित कर दिया कि राजनीति में रूपया और रूतबा , विचारधारा पर भारी पड़ता है। गुजरात के रहने वाले , उद्योग जगत से जुड़े, परिमल नाथवानी ने झारखंड के तथाकथित राजनीति के दिग्गजों को उनके ही घर में मात दे दी। एक अकेले परिमल नाथवानी 56 विधायकों वाले महागठबंधन पर भारी पड़े। 16 विधायक , चार मंत्री वाली कांग्रेस अपने उम्मीदवार को राज्यसभा का सीट तक नहीं जितवा पाई। कांग्रेस और झामुमो के नेता जो कल तक जीत के दावे कर रहे थे आज वे सब परिमल नाथवानी पर विधायकों की खरीद फरोब का आरोप लगा रहे हैं। परिमल नाथवानी को धनकुबेर बता रहे हैं।
तो आखिर कौन हैं परिमल नाथवानी?
परिमल नाथवानी का जन्म 1 फरवरी 1956 को हुआ था। मूल रूप से गुजरात से संबंध रखने वाले नाथवानी आज देश के बड़े उद्योगपतियों और प्रभावशाली कॉरपोरेट चेहरों में गिने जाते हैं। वे लंबे समय से रिलायंस इंडस्ट्रीज में कॉर्पोरेट अफेयर्स के निदेशक की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं और उन्हें मुकेश अंबानी के सबसे करीबी सहयोगियों में से एक माना जाता है। धीरूभाई अंबानी के दौर से ही उनका रिलायंस समूह से जुड़ाव रहा है।
हालांकि उनकी शुरुआत बेहद साधारण रही। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक एक समय ऐसा भी था जब वे कोल्ड ड्रिंक और साबुन बेचने का काम करते थे। संघर्षों के बीच उन्होंने कारोबार की दुनिया में अपनी पहचान बनाई और फिर धीरे-धीरे देश की सबसे बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों में से एक रिलायंस के शीर्ष प्रबंधन तक पहुंचे।
अब सवाल उठता है कि उद्योग जगत का यह चेहरा संसद की राजनीति में कैसे पहुंचा?
दरअसल, परिमल नाथवानी की राजनीतिक यात्रा गुजरात से शुरू हुई। सार्वजनिक जीवन में उनकी सक्रियता और राजनीतिक संपर्कों ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के करीब ला दिया। वर्ष 2008 में उन्होंने पहली बार झारखंड से राज्यसभा का चुनाव जीता। इसके बाद 2014 में भी वे झारखंड से राज्यसभा पहुंचे और लगातार दो कार्यकाल तक राज्य का प्रतिनिधित्व किया।
झारखंड से उनका रिश्ता हमेशा राजनीतिक बहस का विषय रहा। विपक्षी दल अक्सर सवाल उठाते रहे कि गुजरात के एक उद्योगपति को झारखंड का प्रतिनिधित्व क्यों करना चाहिए। वहीं नाथवानी अपने समर्थकों के बीच यह संदेश देते रहे कि झारखंड उनकी कर्मभूमि है और उन्होंने राज्य के विकास के लिए संसद में आवाज उठाई है।
साल 2020 में जब उनका झारखंड कार्यकाल समाप्त हुआ तो वे आंध्र प्रदेश से राज्यसभा पहुंचे। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के समर्थन से वे राज्यसभा सदस्य चुने गए और वहां से उन्होंने अपना तीसरा कार्यकाल पूरा किया।
लेकिन 2026 में उन्होंने एक बार फिर झारखंड की राजनीति में वापसी की। इस बार वे भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे। चुनावी गणित के हिसाब से महागठबंधन मजबूत स्थिति में दिख रहा था। कांग्रेस, झामुमो, राजद और वाम दलों के पास पर्याप्त संख्या बल था। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कांग्रेस नेतृत्व जीत का दावा कर रहे थे।
लेकिन मतदान के दिन तस्वीर बदल गई। क्रॉस वोटिंग और गठबंधन के भीतर वोटों के बिखराव ने चुनाव का परिणाम पलट दिया। नाथवानी को अपेक्षा से अधिक समर्थन मिला और उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा को हरा दिया। यह जीत सिर्फ एक राज्यसभा सीट की जीत नहीं थी, बल्कि झारखंड की राजनीति में महागठबंधन की एक बड़ी रणनीतिक हार के रूप में देखी जा रही है।
नाथवानी की इस जीत ने कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। आखिर महागठबंधन के विधायक किसके साथ गए? क्या यह सिर्फ क्रॉस वोटिंग थी या इसके पीछे कोई बड़ी राजनीतिक रणनीति काम कर रही थी? कांग्रेस अब अपने सहयोगियों पर सवाल उठा रही है, जबकि भाजपा इसे नाथवानी की स्वीकार्यता और राजनीतिक कौशल की जीत बता रही है।
फिलहाल इतना तय है कि 2026 का झारखंड राज्यसभा चुनाव परिमल नाथवानी को सिर्फ चौथी बार राज्यसभा नहीं भेजता, बल्कि यह भी साबित करता है कि भारतीय राजनीति में संख्या बल से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसे अपने पक्ष में मोड़ने की क्षमता। और इस बार हेमंत सोरेन की राजनीति पर परिमल नाथवानी का गणित भारी पड़ गया। या मामला कुछ और ही है….

