लेखक: देवानंद सिंह
कांग्रेस नेता राहुल गांधी का राजनीतिक अंदाज अब तेजी से बदलता नजर आ रहा है। लंबे समय से उनके आलोचक यह सवाल उठाते रहे हैं कि क्या वे पार्टी के भीतर बड़े और कठिन फैसले लेने का साहस रखते हैं, लेकिन हाल के दिनों में तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में सामने आए राजनीतिक संकेतों ने इस धारणा को बदलना शुरू कर दिया है। पार्टी के भीतर अब यह चर्चा तेज है कि राहुल गांधी पहले की तुलना में अधिक आक्रामक, व्यावहारिक और निर्णायक नेतृत्व की भूमिका में दिखाई दे रहे हैं।
कांग्रेस के अंदर माना जा रहा है कि दक्षिण भारत को बचाए रखना राहुल गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक प्राथमिकता बन चुका है। फिलहाल दक्षिण भारत के पांच राज्यों में से चार में कांग्रेस या तो सत्ता में है या गठबंधन सरकार का हिस्सा है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ दक्षिण भारत कांग्रेस का सबसे मजबूत राजनीतिक किला माना जा रहा है। यही कारण है कि 2028 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव और आगामी लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए राहुल गांधी लगातार ऐसे राजनीतिक फैसले लेने की कोशिश कर रहे हैं, जिनसे पार्टी को लंबे समय तक रणनीतिक लाभ मिल सके।
तमिलनाडु की राजनीति में इसका पहला संकेत देखने को मिला। पार्टी सूत्रों के अनुसार राहुल गांधी चाहते थे कि कांग्रेस केवल डीएमके पर निर्भर रहने के बजाय अभिनेता से नेता बने विजय के साथ संभावित राजनीतिक समझौते की संभावनाएं भी तलाशे। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता इस विचार से सहमत नहीं थे और उनका मानना था कि डीएमके से दूरी बनाना पार्टी के लिए जोखिम भरा कदम हो सकता है। हालांकि राहुल गांधी का आकलन था कि विजय की राजनीति में एंट्री ने तमिलनाडु की राजनीतिक तस्वीर बदल दी है और कांग्रेस को समय रहते नए समीकरणों के अनुसार खुद को ढालना होगा। बाद में विजय को मिल रहे जनसमर्थन ने राहुल गांधी की रणनीति को पार्टी के भीतर गंभीरता से स्थापित कर दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी अब केवल वैचारिक राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि वे क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुरूप व्यावहारिक गठबंधन और संगठनात्मक फैसले लेने के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं। कर्नाटक और केरल में भी संगठन को लेकर उनकी सक्रियता इसी दिशा में संकेत देती है। कांग्रेस नेतृत्व समझता है कि उत्तर भारत में लगातार चुनौतियों के बीच दक्षिण भारत ही वह क्षेत्र है जहां पार्टी अभी भी मजबूत आधार बनाए हुए है। इसलिए आने वाले वर्षों में राहुल गांधी की राजनीति का केंद्र दक्षिण भारत ही रहने की संभावना जताई जा रही है।

