वैश्विक संकट के बीच प्रधानमंत्री मोदी की समयोचित अपील
देवानंद सिंह
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और उससे उत्पन्न वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह अपील कि पेट्रोल, डीजल, गैस और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों का उपयोग संयमित ढंग से किया जाए, केवल एक प्रशासनिक सलाह नहीं बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी का संदेश है। हैदराबाद में लगभग 9,400 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं के शिलान्यास और उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री ने जिस स्पष्टता से ऊर्जा संरक्षण, विदेशी मुद्रा बचत और आत्मनिर्भरता के बीच संबंध को रेखांकित किया, वह वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में अत्यंत प्रासंगिक है।
भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल पर निर्भर होकर पूरा करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था, महंगाई, परिवहन लागत और आम नागरिक के बजट पर पड़ता है। जब पश्चिम एशिया जैसे संवेदनशील क्षेत्र में संघर्ष बढ़ता है, तब तेल आपूर्ति और कीमतों को लेकर अनिश्चितता स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री की यह अपील कि आयातित पेट्रोलियम उत्पादों का उपयोग केवल आवश्यकता के अनुसार किया जाए, दूरदर्शी और व्यावहारिक दोनों है।
ऊर्जा संरक्षण का अर्थ केवल ईंधन बचाना नहीं है; यह आर्थिक अनुशासन और राष्ट्रीय हित की रक्षा भी है। यदि नागरिक अनावश्यक वाहन उपयोग से बचें, सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता दें, ऊर्जा दक्ष उपकरणों का उपयोग करें और ईंधन की बर्बादी रोकें, तो इससे विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत संभव है। यह बचत देश के विकास, बुनियादी ढांचे और सामाजिक योजनाओं में उपयोग की जा सकती है। साथ ही, वैश्विक संकट के प्रभाव को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में यह भी उल्लेख किया कि भारत पिछले कुछ वर्षों में सौर ऊर्जा, एथनॉल मिश्रण, सीएनजी और पाइप्ड गैस के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर चुका है। यह सच है कि भारत आज अक्षय ऊर्जा क्षमता के मामले में विश्व के अग्रणी देशों में शामिल है। पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण बढ़ने से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम हुई है और किसानों को भी नया बाजार मिला है। उज्ज्वला योजना ने एलपीजी को गरीब परिवारों तक पहुंचाया, जबकि अब सरकार पाइपलाइन के माध्यम से सस्ती गैस उपलब्ध कराने और सीएनजी नेटवर्क के विस्तार पर जोर दे रही है।
इन पहलों का सामूहिक प्रभाव यह है कि भारत ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में अधिक आत्मनिर्भर और सक्षम बन रहा है। यह केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता और रणनीतिक स्वतंत्रता का भी प्रश्न है। जिस देश की ऊर्जा आपूर्ति जितनी सुरक्षित होगी, उसकी अर्थव्यवस्था उतनी ही मजबूत और संकट-प्रतिरोधी होगी।
हैदराबाद में घोषित 9,400 करोड़ रुपये की परियोजनाएं भी इस व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार, रेलवे मल्टी-ट्रैकिंग, ग्रीनफील्ड पेट्रोलियम टर्मिनल और काकतीय मेगा टेक्सटाइल पार्क जैसी परियोजनाएं यह दर्शाती हैं कि भारत एक साथ बुनियादी ढांचा, औद्योगिक विकास और ऊर्जा प्रबंधन पर काम कर रहा है। लगभग 1,700 करोड़ रुपये की लागत से विकसित भारत का पहला पूर्ण रूप से कार्यशील पीएम मित्र पार्क वस्त्र उद्योग को नई गति देगा और रोजगार के अवसर बढ़ाएगा।
प्रधानमंत्री का यह कथन कि भारत “सुधार एक्सप्रेस” पर सवार है, केवल राजनीतिक अभिव्यक्ति नहीं बल्कि एक व्यापक आर्थिक दृष्टि का संकेत है। सुधार, बुनियादी ढांचा और संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग—इन तीनों का संतुलन ही विकसित भारत की नींव रखेगा।
आज आवश्यकता है कि प्रधानमंत्री की अपील को केवल सरकारी बयान समझकर न छोड़ा जाए। ऊर्जा संरक्षण एक जन आंदोलन का रूप ले, तभी इसका वास्तविक लाभ देश को मिलेगा। हर नागरिक यदि यह सोचकर ईंधन की बचत करे कि उसका छोटा प्रयास भी राष्ट्रहित में योगदान है, तो भारत न केवल वर्तमान संकट का प्रभावी ढंग से सामना करेगा बल्कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में और मजबूत कदम बढ़ाएगा। यही समय की मांग है, और यही जिम्मेदार नागरिकता की पहचान भी।

