शैक्षिक संवाद पुस्तक माला : आनंदघर विद्यालय की ओर एक प्रभावी कदम
• प्रमोद दीक्षित मलय
‘शैक्षिक संवाद मंच’ द्वारा शैक्षिक मुद्दों पर केंद्रित शीघ्र प्रकाश्य दो पुस्तिकाओं की पांडुलिपियां- परिवेश से कैसे सीखें तथा बच्चे, शिक्षक, अभिभावक, विद्यालय क्या हैं; मेरे हाथों में हैं, जिनका संपादन शिक्षक साथी दुर्गेश्वर राय (गोरखपुर) ने किया है। इन लघु पुस्तकों के मुद्दे एवं शामिल वैचारिक लेख प्रेरक एवं दिशा देने वाले हैं। वास्तव में शिक्षा सामाजिक बदलाव का सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं प्रभावी माध्यम है। शिक्षा ही व्यक्ति को रचती-गढ़ती है और उसे सामाजिक बनाती एवं श्रेष्ठ नागरिक के रूप में विकसित करती है। व्यक्ति के जीवन में प्राथमिक शिक्षा का प्रभाव जीवन पर्यंत बना रहता है। प्राथमिक शिक्षा आनंदमय हो और विद्यालय बच्चों के ज्ञान निर्माण की खुशियों भरी जगह बन सकें, इस पावन उद्देश्य से 18 नवम्बर, 2012 को बांदा, उत्तर प्रदेश में शिक्षक साहित्यकार प्रमोद दीक्षित मलय के नेतृत्व, मार्गदर्शन एवं सान्निध्य में ‘शैक्षिक संवाद मंच’ की स्थापना की गई थी। मंच रचनाधर्मी स्वप्रेरित शिक्षकों का स्वैच्छिक मैत्री समूह है जो ‘विद्यालय बनें आनंदघर’ के संकल्प को साकार करने हेतु शिक्षकों के साथ काम कर रहा है। उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश और राजस्थान प्रदेशों से बेसिक शिक्षा में कार्यरत शिक्षक एवं शिक्षिकाएँ मंच से जुड़कर विद्यालयों को आनंदघर बना रहे हैं। शिक्षकों की क्षमता वृद्धि हेतु मंच द्वारा कुछ नियमित मासिक, अर्धवार्षिक एवं वार्षिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। शैक्षिक संवाद पुस्तक माला मासिक आनलाइन शैक्षिक विमर्श पर आधारित विचारों का संकलन है।
पाठकों की सुविधा के लिए वर्ष 2026 के ‘शैक्षिक संवाद’ हेतु मासिक विषय अग्रांकित हैं- परिवेश से कैसे सीखें, बच्चे अभिभावक शिक्षक विद्यालय क्या हैं, बाल संसद, प्रार्थना सत्र, शनिवार की सभा, पुस्तकालय की आवश्यकता, आनंदमय शिक्षा, बच्चे के ज्ञान निर्माण में सवालों की भूमिका, विद्यालय में बच्चों के लिए अभिव्यक्ति के अवसर, विद्यालय प्रबंधन एवं नेतृत्व, कक्षा शिक्षण में कहानियों की भूमिका, शिक्षकों का शैक्षिक अनुभव लेखन। ये वे मुद्दे हैं जिन पर शिक्षकों के साथ संवाद एवं परिचर्चा कर पुस्तिकाएं प्रकाशित की जाएंगी। ‘शैक्षिक संवाद मंच’ द्वारा आयोजित मासिक ‘शैक्षिक संवाद’ अंतर्गत जनवरी एवं फरवरी – 2026 के विषय- परिवेश से कैसे सीखें तथा ‘बच्चे, अभिभावक, शिक्षक, विद्यालय क्या हैं’, में प्रस्तुत विचार हम सभी की शैक्षिक समझ को नयी दृष्टि एवं दिशा देते हैं।
किसी बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण एवं उसके जीवन की दिशा निर्धारण में परिवेश का प्रभाव एवं भूमिका महत्वपूर्ण है। एक रचनात्मक प्रेरक सौहार्दमय प्रेमपूर्ण परिवेश न केवल किसी बच्चे की प्रतिभा को प्रकाशित करने में योगदान देता है, बल्कि उसे सहिष्णु, प्रकृति प्रेमी, मानवीय एवं संवेदनशील भी बनाता है। वह उसके कला-कौशल को निखारता एवं अभिव्यक्ति के सहज अवसर उपलब्ध कराता है और जीवन में आगे बढ़ने, नया सीखने-समझने में सहायक होता है। ऐसा परिवेश बच्चों में मानवीय मूल्य, प्रकृति प्रेम, अहिंसा, शांति, समन्वय, सहकारिता, साधुता, सामूहिकता, स्वच्छता, करुणा, माधुर्य, मैत्री, सद्भाव, देशभक्ति, विश्वास, लोकतांत्रिकता एवं आत्मीयता के गुण विकसित करता है। तो वहीं हिंसक, अस्वच्छ, अराजकतावादी परिवेश बच्चों को गुस्सैल, अपराधी, हिंसक, व्यक्तिवादी, स्वार्थी बनने की ओर धकेलता है। हालाँकि ऐसा कहना शत-प्रतिशत सही नहीं होगा तथापि ऐसा है और हमारे आसपास की दुनिया में यह दिखाई पड़ता है। इतिहास में भी ऐसे उदाहरण दृष्टव्य हैं।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि परिवेश व्यक्ति के चेतन एवं अवचेतन मन को प्रभावित करता है। इसलिए अभिभावकों एवं शिक्षकों को घर-परिवार, पड़ोस एवं विद्यालय में रचनात्मक परिवेश का निर्माण करना चाहिए ताकि बच्चों का समुचित एवं संतुलित विकास सम्भव हो सके।
बच्चे कच्ची मिट्टी, खाली घड़ा या कोरी स्लेट नहीं बल्कि संभावनाओं से भरे हुए ज्योति पुंज हैं, या एक बीज जिसमें विशाल वटवृक्ष बनने की अपार संभावना है जो दूसरों के जीवन को स्नेह की शीतल छाँव, भोजन-पोषण, दिशा एवं आश्रय देने में समर्थ होगा। निश्चित रूप से बच्चों में अवस्था/वय अनुसार पारिवारिक, सामाजिक, नैतिक, पर्यावरणीय पर्याप्त समझ होती है, उनमें विषयगत चीजों की पहचान होती है और भाषाई अर्थबोध भी। वे मानवीय मूल्यों से ओत-प्रोत होते हैं। बच्चे परिवार, समाज एवं राष्ट्र का सुखद भविष्य हैं, अतेव उनका पालन-पोषण एवं शिक्षा-दीक्षा उचित रीति पूर्वक होना आवश्यक है।
शिक्षक कभी गुरु ज्ञानदाता रहा है पर अब वह बच्चों के लिए मार्गदर्शक एवं सुगमकर्ता की भूमिका में हैं। शिक्षक के ज्ञान का बच्चों में हस्तांतरण या प्रेषण सम्भव नहीं। प्रत्येक व्यक्ति का ज्ञान अपना और विशेष होता है तथा उसे स्वयं अर्जित करना होता है। ध्यान रहे, एक का अर्जित ज्ञान दूसरे के लिए ज्ञान नहीं बल्कि सूचना का स्वरूप ले लेता है। इसलिए अब शिक्षकों का काम बच्चों में अंतर्निहित प्रतिभा को प्रकाशित करने हेतु विद्यालयीय परिवेश में समुचित अवसर बनाना एवं मंच उपलब्ध कराना है। ज्ञान निर्माण के लिए अधिकाधिक अवसर एवं प्रेरक जगह बनानी है। बच्चों की त्रुटियों के लिए उनको दण्ड नहीं बल्कि सुधार एवं संशोधन कर आगे बढ़ने में मदद करना है। अभिभावक जो अभी तक बच्चों के विकास का जिम्मेदार केवल शिक्षकों एवं विद्यालयों को मानकर स्वतंत्र भाव में जी रहे थे, अब बच्चों के सर्वांगीण विकास में एक महत्वपूर्ण घटक हैं। अभिभावकों को न केवल घर-परिवार में सीखने हेतु पर्याप्त समय उपलब्ध कराना है बल्कि बच्चों को कुसंगति से भी बचाना है और रोक-टोक से बचना है। स्मरणीय है, माता-पिता की अनावश्यक रोक-टोक और मनाही बच्चों को अनुशासनहीन, कुंठित, दब्बू, हिंसक, झगड़ालू एवं नकारात्मक बना देती है। अतेव मात-पिता बच्चों के मित्र एवं सहयोगी बनें। गिजुभाई बधेका इस बात पर जोर देते हैं कि अभिभावक बच्चों के लिए समय निकालें, उनके साथ खेलें और बातचीत करें। कभी भी अपने रूखे व्यवहार से बालमन को आहत न करें।
इस क्रम में विद्यालय की भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। विद्यालय केवल भवन नहीं होता। भवन को यदि देह माना जाए तो बच्चे उसका हृदय हैं, प्राण हैं। बच्चों की नाना प्रकार की गतिविधियाँ, उनका कलरव विद्यालय के हृदय का स्पंदन है। बच्चे एक-दूसरे से सीखते हैं, यह अवसर विद्यालय बनाता है। सामूहिकता, सहकारिता, मैत्री, न्याय, नेतृत्व, लोकतांत्रिकता, विश्वास, करुणा आदि गुण एवं भाव बच्चों विद्यालय विकसित करता है। जब अभिभावक, शिक्षक एवं विद्यालय अपनी भूमिका का सम्यक् निर्वहन करते हैं, तब बच्चे बेहतर इंसान और बेहतर नागरिक बनने की ओर बढ़ रहे होते हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है 12 अप्रैल को लखनऊ में विमोचित होने वाली ये पुस्तिकाएँ शिक्षकों एवं शैक्षिक कार्यकर्ताओं के लिए उपयोगी, मार्गदर्शक एवं सहायक सिद्ध होंगी।
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लेखक शैक्षिक संवाद मंच के संस्थापक हैं। बांदा, उ.प्र.
मोबा. 9452085234

