पुराने किले से इंद्रप्रस्थ तक: दिल्ली के खोए हुए इतिहास की खोज
समय के गर्भ में इंद्रप्रस्थ के पदचिह्न: अतीत की धूल और भविष्य का दर्पण
इतिहास केवल किताबों के पन्नों में सिमटे हुए कुछ सन या तारीखें नहीं हैं; इतिहास तो हमारी जड़ों की निरंतर खोज है। दिल्ली में यमुना के तट पर सीना ताने खड़ा यह ‘पुराना किला’ केवल मुगलों या सूरी वंश की ईंट-पत्थरों से बनी कोई निर्जीव वास्तुकला नहीं है, बल्कि यह हजार साल पुरानी भारतीय सभ्यता का एक जीवंत दस्तावेज़ है। यहाँ महाभारत के महानायकों के ‘इंद्रप्रस्थ’ और आधुनिक दिल्ली के बीच का वह अदृश्य सूत्र आज भी जीवित और स्पंदित है।
किंवदंतियों की माया नगरी
महाभारत के ‘आदि पर्व’ के वृत्तांत के अनुसार, कुरु राज्य के विभाजन के समय पांडवों को ‘खांडवप्रस्थ’ नामक एक मरुस्थल सदृश निर्जन वन प्राप्त हुआ था। किंतु अर्जुन के गांडीव की शक्ति और भगवान कृष्ण के मार्गदर्शन में, अग्निदेव की सहायता से उस वन का दहन कर मय दानव द्वारा एक अपूर्व मायावी नगरी का निर्माण किया गया— इंद्रप्रस्थ। इस नगरी का ऐश्वर्य और इसकी शिल्पकला इतनी विस्मयकारी थी कि यह कौरवों की ईर्ष्या का मुख्य कारण बन गई। परंतु काल के क्रूर प्रवाह में यह माया नगरी कहाँ विलुप्त हो गई?
पुराना किला: इतिहास की कोख में इंद्रप्रस्थ
वर्तमान दिल्ली के हृदय स्थल में स्थित ‘पुराने किले’ को इतिहासकार इसी प्राचीन इंद्रप्रस्थ का स्थान स्वीकार करते हैं। वर्ष 1913 तक इस किले के भीतर एक गाँव बसा हुआ था, जिसका नाम था ‘इंद्रपत’ (Indrapat)। भाषाविदों के अनुसार ‘इंद्रपत’ शब्द प्राचीन ‘इंद्रप्रस्थ’ का ही अपभ्रंश रूप है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के प्रख्यात पुरातत्वविद् बी.बी. लाल के नेतृत्व में 1954 और 1970 में यहाँ किए गए उत्खनन ने एक सनसनी पैदा कर दी थी। धरती की गहराई में ‘चित्रित धूसर मृदभांड’ (Painted Grey Ware) पाए गए, जिनका समयकाल ईसा पूर्व 1000 से 1200 वर्ष पुराना निर्धारित किया गया है। इसी प्रकार के बर्तन कुरुक्षेत्र, हस्तिनापुर और मथुरा में भी मिले हैं, जो महाभारत की कथा को एक ठोस ऐतिहासिक आधार प्रदान करते हैं।
सभ्यता की अविरल धारा
पुराने किले की विशिष्टता यह है कि यह केवल एक युग का नहीं, बल्कि आठ भिन्न युगों की सभ्यताओं का साक्षी है। मिट्टी की परतों के नीचे मौर्य, गुप्त, कुषाण, राजपूत, सल्तनत और मुगल काल के अवशेष दबे हुए हैं। मुगल सम्राट हुमायूँ ने जब यहाँ अपनी नगरी ‘दीन-पनाह’ का निर्माण किया था, तब शायद वे जानते थे कि वे एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र भूमि पर अपने साम्राज्य की नींव रख रहे हैं। आज हम जो विशाल दुर्ग देखते हैं, वह मुख्यतः हुमायूँ और शेरशाह सूरी की कृति है। किंतु इसकी गगनचुंबी दीवारों के नीचे आज भी पांडवों के उस वैभवशाली युग का इतिहास मौन साधना में लीन है।
भविष्य का दर्पण
इंद्रप्रस्थ केवल एक नगरी नहीं थी, वह न्याय और संघर्ष का प्रतीक थी। आज की आधुनिक दिल्ली जिस प्रकार वैश्विक राजनीति का केंद्र बिंदु है, ठीक उसी प्रकार प्राचीन इंद्रप्रस्थ भी अखंड भारत की सत्ता का केंद्र था। इतिहास की धूल के बीच जब हम इंद्रप्रस्थ के अस्तित्व को तलाशते हैं, तब हमें आभास होता है कि हमारा वर्तमान कोई एकाकी घटना नहीं है; बल्कि यह हजारों वर्षों की एक विशाल विरासत का सुखद परिणाम है।
अतीत की इसी धूल के बीच हम अपने भविष्य का दर्पण देख सकते हैं— जहाँ ध्वंस और निर्माण के अंतहीन चक्र के बीच एक सभ्यता सदैव जीवित रहती है।
मूल लेखिका
मनीषा शर्मा
अनुवादक:– रितेश शर्मा
पता- जलुकबाड़ी, गुवाहाटी

