बिहार की औद्योगिक छलांग: लक्ष्य बड़े, राह चुनौतीपूर्ण
देवानंद सिंह
बिहार लंबे समय तक औद्योगिक पिछड़ेपन और पलायन की समस्या से जूझता रहा है। लेकिन अब राज्य सरकार ने जिस तरह से अगले पांच वर्षों में 50 लाख करोड़ रुपये के निवेश और एक करोड़ रोजगार सृजन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है, वह न केवल आर्थिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक बदलाव के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण है। उद्योग मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल द्वारा प्रस्तुत आंकड़े और योजनाएं यह संकेत देती हैं कि बिहार अब अपनी पारंपरिक छवि से बाहर निकलकर औद्योगिक मानचित्र पर मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है।
सरकार का दावा है कि ‘सात निश्चय–3 (2025–2030)’ के तहत ‘समृद्ध उद्योग–सशक्त बिहार’ की अवधारणा को केंद्र में रखकर नीतियां बनाई गई हैं। निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बिहार औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन पैकेज (बीआईआईपीपी) 2025 लागू किया गया है, जिसमें मुफ्त भूमि, पूंजी और ब्याज अनुदान, एसजीएसटी रिफंड और निर्यात प्रोत्साहन जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इसके साथ ही सेमीकंडक्टर नीति 2026 का लागू होना इस बात का संकेत है कि राज्य अब पारंपरिक उद्योगों से आगे बढ़कर उच्च तकनीक वाले क्षेत्रों में भी कदम रखना चाहता है।
हालांकि, सवाल यह उठता है कि क्या ये लक्ष्य व्यवहारिक हैं? 50 लाख करोड़ रुपये का निवेश कोई साधारण आंकड़ा नहीं है। इसके लिए न केवल मजबूत नीतिगत ढांचा चाहिए, बल्कि जमीन पर प्रभावी क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है। बिहार में अब तक निवेशकों की सबसे बड़ी चिंता रही है—बुनियादी ढांचे की कमी, कानून-व्यवस्था की स्थिति और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता। यदि सरकार इन मोर्चों पर ठोस सुधार नहीं कर पाती, तो बड़े निवेश के दावे कागजों तक सीमित रह सकते हैं।
फिर भी, हाल के आंकड़े कुछ सकारात्मक संकेत जरूर देते हैं। 2025-26 में 747 निवेश प्रस्ताव प्राप्त होना और 17,217 करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश का आना यह दर्शाता है कि निवेशकों का भरोसा धीरे-धीरे बढ़ रहा है। बियाडा द्वारा 404 एकड़ भूमि का आवंटन और उससे 22,500 रोजगार सृजन की उम्मीद भी उत्साहजनक है। रिलायंस, अल्ट्राटेक, मदर डेयरी और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी बड़ी कंपनियों की भागीदारी इस विश्वास को और मजबूत करती है कि बिहार अब निवेश के लिए एक संभावित गंतव्य बन रहा है।
लेकिन केवल बड़े निवेश से ही समस्या का समाधान नहीं होगा। बिहार की अर्थव्यवस्था में एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि सरकार वास्तव में एक करोड़ रोजगार सृजित करना चाहती है, तो उसे छोटे और मध्यम उद्योगों को मजबूत करना होगा। इसके लिए आसान ऋण, बाजार तक पहुंच और तकनीकी सहायता जैसी सुविधाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना जरूरी होगा। एमएसएमई निदेशालय और बिहार राज्य विपणन प्राधिकरण (बीएसएमए) की स्थापना इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसकी सफलता कार्यान्वयन पर निर्भर करेगी।
एक और महत्वपूर्ण पहलू है—कुशल मानव संसाधन। बिहार में बड़ी संख्या में युवा हैं, लेकिन उन्हें उद्योगों की जरूरत के मुताबिक प्रशिक्षित करना एक बड़ी चुनौती है। यदि राज्य स्किल डेवलपमेंट पर पर्याप्त ध्यान नहीं देता, तो उद्योगों को कुशल श्रमिकों की कमी का सामना करना पड़ेगा, जिससे निवेश प्रभावित हो सकता है। इसलिए, औद्योगिक नीतियों के साथ-साथ शिक्षा और कौशल विकास को भी प्राथमिकता देनी होगी।
इसके अलावा, क्षेत्रीय असमानताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बिहार के कुछ इलाके अपेक्षाकृत विकसित हैं, जबकि कई जिले अब भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यदि औद्योगिक विकास कुछ सीमित क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह जाता है, तो इससे व्यापक सामाजिक-आर्थिक संतुलन नहीं बन पाएगा। इसलिए सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि विकास का लाभ राज्य के सभी हिस्सों तक पहुंचे।
अंततः, बिहार के सामने अवसर और चुनौती दोनों हैं। सरकार की नीतियां और लक्ष्य निश्चित रूप से उत्साहजनक हैं, लेकिन उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे जमीन पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू होते हैं। यदि बिहार बुनियादी ढांचे में सुधार, प्रशासनिक पारदर्शिता, कानून-व्यवस्था और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में ठोस प्रगति करता है, तो वह न केवल अपने लिए बल्कि पूरे पूर्वी भारत के लिए एक औद्योगिक केंद्र के रूप में उभर सकता है।
यह समय बिहार के लिए निर्णायक है या तो यह महत्वाकांक्षी योजनाएं वास्तविक बदलाव का आधार बनेंगी, या फिर वे केवल आंकड़ों और घोषणाओं तक सीमित रह जाएंगी।

