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    Home » झारखंड में भ्रष्टाचार: संरक्षण या सोची-समझी साजिश?
    खबरें राज्य से झारखंड राष्ट्रीय संपादकीय संवाद की अदालत

    झारखंड में भ्रष्टाचार: संरक्षण या सोची-समझी साजिश?

    Devanand SinghBy Devanand SinghApril 3, 2026No Comments4 Mins Read
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    क्या ‘झारखंड में भ्रष्टाचार’ को सिस्टम का संरक्षण प्राप्त है? दागी अधिकारियों को बार-बार जमानत मिलने से जांच एजेंसियों और राज्य सरकार की नीयत पर उठे गंभीर सवाल।

    देवानंद सिंह
    झारखंड की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अधिकारियों को जिस प्रकार लगातार कानूनी राहत मिल रही है, वह न केवल न्यायिक प्रक्रिया की गति पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि शासन की नीयत पर भी संदेह उत्पन्न करती है। यह स्थिति आम जनता के बीच यह सोच पैदा कर रही है कि क्या वाकई भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई ईमानदारी से लड़ी जा रही है, या फिर यह सब एक सुनियोजित संरक्षण तंत्र का हिस्सा है।
    हाल ही में निलंबित आईएएस अधिकारी विनय कुमार चौबे को आय से अधिक संपत्ति के मामले में जमानत मिलना और इससे पहले शराब घोटाले में ‘डिफॉल्ट बेल’ का लाभ मिलना, कई स्तरों पर चिंता पैदा करता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह अपेक्षा की जाती है कि जांच एजेंसियां समयबद्ध और निष्पक्ष तरीके से अपना कार्य करें। लेकिन जब बार-बार चार्जशीट दाखिल करने में देरी होती है और आरोपी तकनीकी आधार पर राहत पा जाते हैं, तो यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं लगती, बल्कि एक गहरे तंत्र की ओर इशारा करती है।
    ‘डिफॉल्ट बेल’ कोई विशेष कृपा नहीं, बल्कि कानून द्वारा प्रदत्त अधिकार है, जो तब मिलता है जब जांच एजेंसियां निर्धारित समय के भीतर आरोपपत्र दाखिल नहीं कर पातीं। लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसा बार-बार क्यों हो रहा है? क्या राज्य की जांच एजेंसियां इतनी कमजोर हैं कि वे समयसीमा का पालन नहीं कर पा रही हैं, या फिर उन पर किसी प्रकार का दबाव है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इन मामलों में केवल एक अधिकारी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता दांव पर लगी होती है।
    झारखंड जैसे संसाधन-संपन्न राज्य में भ्रष्टाचार कोई नया मुद्दा नहीं है, लेकिन जिस प्रकार से आरोपित अधिकारियों को राहत मिल रही है, वह स्थिति को और अधिक जटिल बना देता है। जनता के मन में यह धारणा बनना स्वाभाविक है कि कहीं न कहीं सत्ता और प्रशासन के बीच एक ऐसा गठजोड़ है, जो जांच की दिशा और गति दोनों को प्रभावित कर रहा है। यदि यह धारणा मजबूत होती है, तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।
    इसके विपरीत, केंद्र स्तर पर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति को बार-बार दोहराया गया है। विभिन्न मंचों से यह संदेश दिया गया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी भी प्रकार की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। ऐसे में जब राज्यों में विपरीत तस्वीर देखने को मिलती है, तो यह नीति और व्यवहार के बीच के अंतर को उजागर करता है। हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि कानून-व्यवस्था और जांच एजेंसियों का संचालन मुख्यतः राज्य सरकारों के अधीन होता है, इसलिए उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
    इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इससे आम नागरिक का न्याय व्यवस्था से विश्वास कमजोर होता है। जब लोग देखते हैं कि गंभीर आरोपों में घिरे व्यक्ति तकनीकी कारणों से बार-बार राहत पा रहे हैं, तो उनके मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कानून सभी के लिए समान है? क्या एक आम नागरिक को भी इतनी ही सहजता से राहत मिल सकती है? यदि इसका उत्तर ‘नहीं’ में आता है, तो यह स्थिति लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है।
    यह भी आवश्यक है कि हम केवल आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति तक सीमित न रहें, बल्कि समाधान की दिशा में भी सोचें। सबसे पहले, जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली को पारदर्शी और जवाबदेह बनाना होगा। समयसीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल करना केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करने की अनिवार्य शर्त है। इसके अलावा, एजेंसियों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखना भी उतना ही जरूरी है, ताकि वे निष्पक्ष रूप से अपना काम कर सकें।
    दूसरा, सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि वह भ्रष्टाचार के मामलों में क्या रुख अपनाए हुए है। यदि वास्तव में ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति लागू करनी है, तो उसे केवल बयानबाजी तक सीमित न रखते हुए ठोस कार्रवाई में बदलना होगा। दोषी चाहे कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, उसके खिलाफ समयबद्ध और कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
    अंततः, लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च होती है। वह सब कुछ देखती है, समझती है और समय आने पर अपना निर्णय भी देती है। झारखंड की जनता भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर रखे हुए है। यदि उसे यह महसूस होता है कि भ्रष्टाचार को संरक्षण दिया जा रहा है, तो इसका राजनीतिक परिणाम भी निश्चित रूप से सामने आएगा।
    आज आवश्यकता इस बात की है कि शासन व्यवस्था अपनी विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए ठोस कदम उठाए। अन्यथा, यह सवाल बार-बार उठता रहेगा—क्या यह केवल लापरवाही है, या फिर भ्रष्टाचार को संरक्षण देने की एक सोची-समझी साजिश?

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