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    Home » तंत्र का मूल उद्देश्य कुलकुण्डलिनी की सुप्त शक्ति को जाग्रत कर उसे परम शिव से मिला देना
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    तंत्र का मूल उद्देश्य कुलकुण्डलिनी की सुप्त शक्ति को जाग्रत कर उसे परम शिव से मिला देना

    dhiraj KumarBy dhiraj KumarMarch 1, 2026No Comments3 Mins Read
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    तंत्र का मूल उद्देश्य कुलकुण्डलिनी की सुप्त शक्ति को जाग्रत कर उसे परम शिव से मिला देना

    तंत्र साधना के माध्यम से व्यक्ति देवत्व प्राप्ति की यात्रा पथ पर अग्रसर हो सकता है

    राष्ट्र संवाद संवाददाता

    जमशेदपुर: आनन्दमार्ग प्रचारक संघ द्वारा आयोजित द्वितीय संभागीय सेमिनार के दूसरे दिन आनन्दमार्ग के वरिष्ठ आचार्य सिद्धविद्यानंद अवधूत ने “तंत्र साधना और समाज के ऊपर उसका प्रभाव” विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि तंत्र या तंत्र साधना मनुष्य के अन्तर्निहित देवत्वबोध को जाग्रत कर उसे परम चेतना में रूपान्तरित करने की पद्धति है। तंत्र साधना वह आध्यात्मिक अनुशीलन है जो साधक को संकीर्ण और पशुवत बन्धनों से मुक्त करके उसके सम्पूर्ण अस्तित्व को विस्तार के पथ पर ले चलता है।


    उन्होंने कहा कि तंत्र वह है जो जाति-वर्ण, सम्प्रदाय, वेद, धर्ममत या मतवाद की बेडियों को तोडकर आत्म-विस्तार के पथ पर अग्रेषित करता है। तंत्र का मूल उद्देश्य है — कुलकुण्डलिनी की सुप्त शक्ति को जाग्रत कर उसे परम शिव से मिला देना।
    तंत्र साधनाओं के दो मुख्य आधार बताए गए —
    (1) पुरुषतत्त्व
    (2) प्रकृतितत्त्व
    तंत्र में बीजमंत्र या बीजाक्षर हैं — ह्रं, क्लीं, ऐं, श्रीं आदि। ये सूक्ष्म ध्वन्यात्मक या बीजात्मक शक्तियाँ हैं। 50 वर्णों के भी 50 बीजाक्षर हैं। तंत्र शुद्धिकरण, स्थूलशुद्धि, नाड़ी, कला, आहार तत्त्व तथा कुलकुण्डलिनी इत्यादि विषयों की व्याख्या प्रस्तुत करता है।
    तंत्र में चक्र, चक्राधिष्ठित ग्रन्थियाँ, उपग्रन्थियाँ, धातुएँ इत्यादि की विस्तृत चर्चा की गई है। तंत्र साधना में संकल्प के चार स्तर बताए गए हैं —
    पदार्थ, विचार, देवाचार एवं दिव्याचार।
    तंत्र में दश प्रकार के भावों की चर्चा की गई है अर्थात मद, मात्सर्य, मत्स्य, क्रोध, अहंकार इत्यादि। व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में तंत्र साधना का कल्याणकारी प्रभाव है। तंत्र में अष्टपाश एवं षडरिपु पर नियंत्रण की व्याख्या की गई है।
    तंत्र साधना से उन्नति के परिणामस्वरूप अनेक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। ये सिद्धियाँ अच्छेद्य या आच्छादित नहीं होती हैं। आठ प्रकार की सिद्धियाँ बताई गई हैं —
    अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व, वशित्व और अन्तर्यामित्व।
    तंत्र में विधानतंत्र एवं अविधानतंत्र के भेदों (उच्च विधा) की भी चर्चा की गई है। अपने सेमिनार व्याख्यान के अंत में आचार्य जी ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि कैसे तंत्र साधना के माध्यम से व्यक्ति देवत्व प्राप्ति की यात्रा पथ पर अग्रसर होकर अपने व्यक्तिगत और सामाजिक आचरण को समग्र रूप से परिवर्तित कर सकता है।
    उन्होंने कहा कि तंत्र साधना के माध्यम से न केवल व्यक्तिगत जीवन में बल्कि सामाजिक क्षेत्र में भी सफलता और शांति की अनुभूति कराता है।

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