कोलंबो. भारतीय क्रिकेट टीम के स्पिन गेंदबाजी कोच साईराज बहुतुले ने टेस्ट क्रिकेट में नो-बॉल की समस्या को लेकर एक ऐसा सुझाव दिया है, जिसने क्रिकेट के पारंपरिक नियमों पर नई बहस छेड़ दी है. कोलंबो में भारत और श्रीलंका के बीच खेले जा रहे दूसरे टेस्ट के दौरान भारतीय स्पिनरों की ओर से हुई नो-बॉल को लेकर चिंता जताते हुए बहुतुले ने कहा कि टेस्ट क्रिकेट में भी सफेद गेंद वाले प्रारूप की तरह नो-बॉल के बाद फ्री-हिट का नियम लागू किया जा सकता है. उनका मानना है कि ऐसा करने से गेंदबाज नो-बॉल करने को लेकर और अधिक सतर्क होंगे तथा इस तरह की गलतियों की संख्या कम हो सकती है.
दूसरे टेस्ट के तीसरे दिन का खेल समाप्त होने के बाद पत्रकारों से बातचीत में बहुतुले ने भारतीय स्पिनरों की नो-बॉल पर खुलकर बात की. उन्होंने माना कि यह ऐसी समस्या है जिस पर टीम लगातार काम कर रही है. खासकर स्पिन गेंदबाजों के लिए क्रीज पर सही जगह से गेंद छोड़ना महत्वपूर्ण होता है और कभी-कभी विकेट हासिल करने के प्रयास में गेंदबाज अपने टेक-ऑफ प्वाइंट से आगे निकल जाता है. बहुतुले के मुताबिक गेंदबाज जब लंबे प्रयास के बाद किसी बल्लेबाज को आउट करने की स्थिति बनाता है तो उस समय वह अतिरिक्त प्रयास करता है और इसी दौरान पैर क्रीज से आगे निकलने की संभावना बढ़ जाती है.
भारतीय टीम के स्पिन गेंदबाजी कोच ने स्पष्ट किया कि यह गलती किसी भी तरह से स्वीकार्य बहाना नहीं है. उन्होंने कहा कि टीम के गेंदबाजों को इस तकनीकी पहलू पर लगातार काम कराया जा रहा है. रवींद्र जडेजा और सारांश जैन के साथ विशेष रूप से इस बात पर काम किया गया है कि गेंद डालते समय उनका टेक-ऑफ प्वाइंट कहां होना चाहिए और गेंदबाजी क्रीज के संबंध में शरीर तथा पैरों की स्थिति किस तरह नियंत्रित की जाए.
बहुतुले ने कहा कि गेंदबाज कई बार किसी खास गेंद पर ज्यादा प्रयास कर देता है. स्पिन गेंदबाजी में बल्लेबाज को परेशान करने के लिए गेंद की गति, टर्न और फ्लाइट में बदलाव किया जाता है. जब गेंदबाज विकेट लेने के लिए अपनी पूरी ताकत लगाता है तो अनजाने में उसका अगला पैर निर्धारित सीमा से आगे जा सकता है. यही स्थिति नो-बॉल में बदल जाती है. उनका भरोसा है कि अभ्यास और लगातार निगरानी से भारतीय स्पिनर इस कमजोरी में सुधार करेंगे.
इसी चर्चा के बीच बहुतुले ने टेस्ट क्रिकेट में फ्री-हिट का विचार सामने रखा. सफेद गेंद वाले क्रिकेट में नो-बॉल के बाद अगली गेंद पर बल्लेबाज को फ्री-हिट मिलती है, यानी उस गेंद पर सामान्य परिस्थितियों में बल्लेबाज के बोल्ड, कैच या स्टंप आउट होने की संभावना नहीं रहती. बहुतुले ने सुझाव दिया कि यदि टेस्ट क्रिकेट में भी ऐसा कोई प्रावधान लागू किया जाए तो गेंदबाज नो-बॉल करने से पहले अधिक सावधानी बरतेंगे.
हालांकि बहुतुले ने खुद इस सुझाव को गंभीर नियम प्रस्ताव के बजाय कुछ हद तक हल्के-फुल्के अंदाज में रखा. उन्होंने कहा कि वह नियम बनाने वाले व्यक्ति नहीं हैं, लेकिन अगर नो-बॉल के बाद फ्री-हिट की व्यवस्था आ जाए तो निश्चित रूप से नो-बॉल की संख्या कम हो सकती है. उनके इस बयान ने टेस्ट क्रिकेट में पारंपरिक नियमों और आधुनिक क्रिकेट के बदलते स्वरूप को लेकर चर्चा की गुंजाइश पैदा कर दी है.
टेस्ट क्रिकेट में नो-बॉल का महत्व सफेद गेंद के मुकाबले अलग है. पांच दिवसीय क्रिकेट में एक नो-बॉल केवल एक अतिरिक्त रन का कारण नहीं बनती, बल्कि बल्लेबाज को अतिरिक्त जीवन भी दे सकती है. यदि नो-बॉल पर विकेट गिर जाए तो वह विकेट मान्य नहीं होता और गेंदबाज की पूरी मेहनत बेकार हो जाती है. यही कारण है कि टेस्ट क्रिकेट में नो-बॉल को गेंदबाज की गंभीर तकनीकी गलती माना जाता है.
भारत के स्पिनरों के संदर्भ में यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि टेस्ट क्रिकेट में स्पिन गेंदबाज लंबे स्पेल करते हैं और लगातार एक ही क्षेत्र में गेंदबाजी करते हुए बल्लेबाज पर दबाव बनाते हैं. ऐसे में कुछ सेंटीमीटर की गलती भी बड़ी कीमत वसूल सकती है. विशेषकर तब, जब गेंदबाज को लंबे समय तक एक ही लय और एक ही रन-अप बनाए रखना होता है.
बहुतुले ने यह भी बताया कि टीम के अभ्यास सत्रों में नो-बॉल रोकने को लेकर लगातार काम किया जाता है. नेट्स में गेंदबाजों को बार-बार उनके रन-अप और गेंद छोड़ने के स्थान के बारे में याद दिलाया जाता है. उनका कहना है कि कोई भी टीम नो-बॉल करके अतिरिक्त रन और एक अतिरिक्त गेंद नहीं देना चाहती. इसलिए अभ्यास के दौरान भी इस तकनीकी पहलू पर पूरी गंभीरता से ध्यान दिया जाता है.
भारतीय टीम के लिए नो-बॉल का मुद्दा केवल तकनीकी गलती तक सीमित नहीं है. टेस्ट मैच में एक अतिरिक्त गेंद मैच की दिशा बदल सकती है. यदि नो-बॉल पर बल्लेबाज को जीवनदान मिल जाए और वह बाद में बड़ी पारी खेल दे तो उसका असर पूरे मुकाबले पर पड़ सकता है. इसी वजह से गेंदबाजों के लिए क्रीज की सीमा का ध्यान रखना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सही लाइन और लेंथ पर गेंद डालना.
बहुतुले का फ्री-हिट वाला सुझाव हालांकि तत्काल किसी नियम परिवर्तन का संकेत नहीं है. क्रिकेट के नियमों में बदलाव संबंधित अंतरराष्ट्रीय संस्था और क्रिकेट के नियम बनाने वाली संस्थाओं के स्तर पर तय होते हैं. लेकिन भारतीय स्पिन गेंदबाजी कोच का यह बयान इस बात की ओर जरूर इशारा करता है कि आधुनिक क्रिकेट में नो-बॉल को लेकर टीमों की चिंता कितनी बढ़ गई है.
सफेद गेंद के क्रिकेट में फ्री-हिट बल्लेबाजों के लिए आक्रामक शॉट खेलने का अतिरिक्त अवसर बन चुकी है. टेस्ट क्रिकेट में इसका इस्तेमाल होने लगे तो खेल की रणनीति पर भी असर पड़ सकता है. गेंदबाज नो-बॉल से बचने के लिए अपने रन-अप और गेंद छोड़ने के स्थान में बदलाव कर सकते हैं, जबकि बल्लेबाज फ्री-हिट को आक्रामक तरीके से खेलने की कोशिश करेंगे. इससे टेस्ट क्रिकेट की रणनीति में एक नया तत्व जुड़ सकता है.
हालांकि यह भी सवाल उठेगा कि क्या टेस्ट क्रिकेट जैसे पारंपरिक प्रारूप में सफेद गेंद के नियमों को शामिल करना उचित होगा. टेस्ट क्रिकेट की पहचान उसकी अलग परिस्थितियों, लंबे संघर्ष और तकनीकी अनुशासन से रही है. इसलिए नो-बॉल के बाद फ्री-हिट जैसे नियम को लागू करने पर क्रिकेट विशेषज्ञों के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है.
फिलहाल भारतीय टीम का ध्यान कोलंबो टेस्ट में अपनी स्थिति मजबूत करने पर है. इस बीच बहुतुले का बयान टीम के लिए एक अहम संदेश भी है कि नो-बॉल जैसी छोटी दिखने वाली गलती को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. गेंदबाजों को अपनी तकनीक, रन-अप और गेंद छोड़ने के स्थान पर लगातार काम करना होगा. यदि ऐसा नहीं हुआ तो विकेट हासिल करने के लिए किया गया पूरा प्रयास एक छोटी सी तकनीकी चूक के कारण बेकार जा सकता है.
बहुतुले ने भरोसा जताया है कि भारतीय स्पिनर इस समस्या में सुधार करेंगे. उनके मुताबिक टीम इस दिशा में पहले से काम कर रही है और अभ्यास के दौरान गेंदबाजों को लगातार सावधान किया जाता है. अब देखना यह होगा कि आने वाले मैचों में भारतीय स्पिनर अपनी इस कमजोरी पर कितना नियंत्रण हासिल कर पाते हैं और क्या टेस्ट क्रिकेट में फ्री-हिट का यह विचार भविष्य में क्रिकेट के नियमों पर किसी बड़ी बहस का आधार बनता है.

