यूजीसी के नए रेगुलेशन पर सियासी-सामाजिक हलचल तेज, राष्ट्र संवाद ने जमशेदपुर से ली जनप्रतिनिधियों व संगठनों की प्रतिक्रिया
राष्ट्र संवाद संवाददाता
जमशेदपुर।विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल में जारी किए गए नए रेगुलेशन को लेकर देशभर में चल रहे विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बयान के बाद बहस और तेज हो गई है। मंत्री ने स्पष्ट किया है कि नए नियमों से किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होगा और कानून का कोई भी दुरुपयोग संभव नहीं है। उन्होंने छात्रों, शिक्षकों और आलोचकों को भरोसा दिलाया कि यूजीसी 2026 के समानता नियम किसी के अधिकारों का हनन नहीं करेंगे।
इसी पूरे प्रकरण में राष्ट्र संवाद ने जमशेदपुर में सामाजिक संगठनों के साथ-साथ राजनीतिक दलों और विधायकों से भी प्रतिक्रिया ली है। शहर में इस मुद्दे को लेकर शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों के बीच गंभीर मंथन देखने को मिल रहा है।
जहां एक ओर कुछ सामाजिक संगठनों ने केंद्रीय मंत्री के बयान का स्वागत करते हुए इसे आश्वस्त करने वाला बताया है, वहीं दूसरी ओर कई राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों ने यूजीसी के नए रेगुलेशन को लेकर आशंकाएं जताई हैं। उनका कहना है कि जब तक नियमों के प्रावधान पूरी तरह स्पष्ट नहीं होते और सभी वर्गों के हित सुरक्षित नहीं किए जाते, तब तक विरोध और सवाल स्वाभाविक हैं।
राष्ट्र संवाद से बातचीत में स्थानीय नेताओं और सामाजिक प्रतिनिधियों ने कहा कि उच्च शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी बदलाव से पहले व्यापक संवाद और सहमति आवश्यक है। फिलहाल शिक्षण परिसरों में विरोध प्रदर्शन और ऑनलाइन प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं, जिससे यह स्पष्ट है कि यूजीसी के नए रेगुलेशन पर राष्ट्रीय बहस अभी थमी नहीं
यूजीसी का नया विनियमन नख-दंत विहीन, असमानता बढ़ाने वाला : विधायक सरयू राय

जमशेदपुर।उच्च शिक्षा में समानता के संवर्द्धन के नाम पर यूजीसी द्वारा हाल में जारी किए गए विनियमन पर विधायक सरयू राय ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि यह विनियमन नख-दंत विहीन है, अनावश्यक भ्रम फैलाने वाला है और इसे हड़बड़ी में तैयार किया गया है।
सरयू राय ने कहा कि यह विनियमन अपने ही उद्देश्य के विपरीत है। इसकी प्रस्तावना और उद्देश्यों का इसके प्रावधानों से कोई स्पष्ट तालमेल नहीं बैठता। समानता को बढ़ावा देने का दावा करने वाला यह ढांचा वास्तव में उच्च शिक्षा में असमानता को और बढ़ाने वाला साबित हो सकता है।
उन्होंने यूजीसी से मांग की कि वह इस विनियमन को तत्काल वापस ले और व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही कोई नया और संतुलित प्रावधान लाए। विधायक ने कहा कि उच्च शिक्षा जैसे गंभीर और संवेदनशील क्षेत्र में बिना ठोस तैयारी के किए गए प्रयोग देश के भविष्य के लिए घातक हो सकते हैं।
UGC के जाति आधारित नियमों का विरोध, शिक्षा में अविश्वास बढ़ेगा : कमल किशोर

भगवान श्री परशुराम जन्मोत्सव समिति के संयोजक श्री कमल किशोर जी ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए जाति आधारित नियमों का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रावधानों से शिक्षण संस्थानों में छात्रों के बीच आपसी विश्वास कमजोर होगा तथा तनावपूर्ण वातावरण उत्पन्न होगा, जिसका सीधा दुष्प्रभाव अध्ययन और अध्यापन—दोनों पर पड़ेगा।
श्री कमल किशोर ने कहा कि 21वीं सदी में जब देश को “विश्व गुरु” बनाने की बात की जा रही है, उस समय शिक्षा व्यवस्था में जाति आधारित ढांचे को और मजबूत करना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जहां आवश्यकता जातिगत भेदभाव को समाप्त करने की है, वहीं इस तरह के नियम समाज और शिक्षा दोनों में विभाजन को और गहरा करेंगे।
उन्होंने आशंका जताई कि इन नियमों का गलत इस्तेमाल कर निराधार शिकायतों के माध्यम से शैक्षणिक माहौल को बिगाड़ा जा सकता है, जिससे न केवल शिक्षक बल्कि विद्यार्थी भी मानसिक दबाव में आएंगे। इससे संस्थानों की स्वायत्तता और शैक्षणिक स्वतंत्रता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है।
श्री कमल किशोर ने कहा कि हम सभी का साझा लक्ष्य शिक्षा और सामाजिक न्याय का सशक्त, संतुलित और समावेशी स्वरूप सुनिश्चित करना है। किसी भी नीति का उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि कोई वर्ग स्वयं को असमान, असुरक्षित या निष्प्रभावी महसूस करे।
उन्होंने UGC से मांग की कि वह नए नियमों पर पुनर्विचार करे और सभी पक्षों—छात्रों, शिक्षकों एवं समाज के विभिन्न वर्गों—की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए नियमों को पारदर्शी, न्यायसंगत और संतुलित रूप से संशोधित करे, ताकि उच्च शिक्षा में न्याय, सम्मान और समान अवसर की भावना बनी रहे।
यूजीसी का नया कानून युवाओं को जाति-पात में बांटने की कोशिश : विकास सिंह

राष्ट्र संवाद संवाददाता
जमशेदपुर।ब्रह्मर्षि विकास मंच जमशेदपुर के अध्यक्ष के साथ-साथ दर्जनों सामाजिक संगठनो से जुड़े विकास सिंह ने यूजीसी के नए कानून को लेकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि सरकार द्वारा लाए गए इस नए कानून से युवाओं को जाति-पात के दायरे में झुकाने की कोशिश की जा रही है, जिस पर सरकार को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
विकास सिंह ने कहा कि आज का युवा वर्ग जाति-पात को पीछे छोड़कर प्रेम, भाईचारे और सौहार्द के साथ जीवन जी रहा था, लेकिन यह कानून पूरे देश के युवाओं को भड़काने और भ्रमित करने का काम कर रहा है। इससे सामाजिक समरसता पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
उन्होंने सरकार से अपील की कि युवाओं के भविष्य और देश के मूल नैतिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए यूजीसी के इस कानून पर पुनर्विचार किया जाए, ताकि शिक्षा व्यवस्था किसी भी तरह से समाज को बांटने का माध्यम न बने।
ब्रह्मर्षि विकास मंच ने स्पष्ट किया कि संगठन शिक्षा में समानता, संवाद और सामाजिक सौहार्द के पक्ष में है तथा किसी भी ऐसे कदम का विरोध करेगा जो युवाओं के बीच विभाजन पैदा करे।
यूजीसी पर बयानबाज़ी जल्दबाज़ी, सरकार के फैसले का इंतजार जरूरी : अनिल ठाकुर

जमशेदपुर।
यूजीसी (UGC) से जुड़े मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए ब्रह्मर्षि विकास मंच के महासचिव अनिल ठाकुर ने कहा कि इस विषय पर अभी किसी भी तरह का अंतिम निष्कर्ष निकालना या तीखी टिप्पणी करना जल्दबाज़ी होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार की ओर से आधिकारिक और अंतिम निर्णय आने से पहले बयान देना न केवल प्रीमेच्योर है, बल्कि इससे समाज में अनावश्यक भ्रम और तनाव भी पैदा हो सकता है।
अनिल ठाकुर ने कहा कि यूजीसी से संबंधित प्रस्तावों और नीतिगत बदलावों को समग्रता में समझना आवश्यक है। उन्होंने आग्रह किया कि सभी पक्ष धैर्य रखें और सरकार के स्पष्ट रुख का इंतजार करें। “बिना पूरी जानकारी और आधिकारिक घोषणा के प्रतिक्रिया देना जिम्मेदाराना आचरण नहीं है,”
यूजीसी बिल पर बेवजह हाय तौबा क्यों : कुलबिंदर

जमशेदपुर। पूर्व कार्यकारी प्रधानाध्यापक एवं अधिवक्ता कुलबिंदर सिंह ने यूजीसी बिल के प्रावधान समता कमेटी को लेकर हाय तौबा करने वालों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि क्या उन्हें देश के संविधान एवं न्यायिक व्यवस्था में भरोसा नहीं है?
क्या स्वर्ण जाति के लोग इस धारणा को मजबूत करना चाहते हैं कि देश के भौतिक संसाधन एवं रोजी रोजगार तथा शिक्षा के अवसर पर अगड़ी जातियों का कब्जा है? वे अन्य भारतीयों को अपने समकक्ष खड़े होने देने के फैसले के खिलाफ हैं?
इस अधिवक्ता के अनुसार स्वर्ण जाति के लोग यूजीसी बिल का जितना विरोध करेंगे, उतना ही यह धारणा मजबूत होगी कि वे रूढ़िवादी हैं और अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग को देश के सार्वजनिक संसाधन, रोजगार एवं शिक्षा का समानता का अवसर और अधिकार देना ही नहीं चाहते हैं।
यूसीसी के नाम पर यूजीसी का विभेदपूर्ण कानून सवर्णों पर सीधा प्रहार : अनिशा सिन्हा

जमशेदपुर।
सवर्ण महासंघ फाउंडेशन भारत की महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती अनिशा सिन्हा (कायस्थ परिवार) ने यूजीसी के नए कानून को लेकर केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार द्वारा यह कानून एक तरह का धोखा है। सरकार जहां यूसीसी यानी कॉमन सिविल कोड लाने की बात कर रही थी, वहीं समानता के नाम पर एक ऐसा यूजीसी कानून लाया गया है, जो विभेदपूर्ण है।
अनिशा सिन्हा ने कहा कि यह कानून सवर्ण माताओं और बहनों की कोख पर सीधा प्रहार है। एक मां हर कष्ट सह सकती है, लेकिन अपने बच्चों पर आने वाली विपदा को कभी स्वीकार नहीं कर सकती। उनका आरोप है कि मोदी सरकार के इस कदम से शिक्षा प्राप्त करने गए सवर्ण समाज के बच्चों की सुरक्षा और भविष्य दोनों खतरे में पड़ सकते हैं।
उन्होंने आशंका जताई कि इस कानून के चलते बच्चों पर तनाव और कानूनी भय हमेशा बना रहेगा, जिससे वे मानसिक रूप से असुरक्षित महसूस करेंगे। ऐसे हालात में असामाजिक और विधर्मी तत्वों को शोषण का अवसर मिल सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो सवर्ण समाज के लिए इस देश में आखिर बचेगा क्या।
अनिशा सिन्हा ने यह भी कहा कि जातिगत आरक्षण ने पहले ही योग्यता को प्रभावित किया है और अब यह नया कानून अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा के अधिकार को भी छीनने का प्रयास प्रतीत होता है। उन्होंने सरकार से मांग की कि इस कानून पर पुनर्विचार किया जाए और सभी वर्गों के लिए समान, सुरक्षित और न्यायपूर्ण शिक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
यूजीसी कानून समता के नाम पर सवर्णों से शिक्षा का अधिकार छीनने का प्रयास : रिंकू तिवारी

जमशेदपुर।
सवर्ण महासंघ फाउंडेशन भारत की सह राष्ट्रीय प्रवक्ता श्रीमती रिंकू तिवारी (भूमिहार परिवार) ने यूजीसी के नए कानून को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि यह कानून समता के नाम पर प्रतिभा को कुंठित करने वाला है और सवर्ण समाज के लिए शेष बचे अधिकार—शिक्षा—को भी अंतिम रूप से छीन लेने का प्रयास प्रतीत होता है।
रिंकू तिवारी ने कहा कि जिस सरकार को देश की जनता ने सुचिता और स्वच्छ शासन के नाम पर चुना था, उसी सरकार द्वारा यह कदम उठाया जाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उनका आरोप है कि भ्रष्टाचार मिटाने के दावे करते-करते सरकार ने न केवल भ्रष्टाचार को अपनाया, बल्कि सवर्ण समाज को घृणा का पात्र बनाकर सत्ता के लिए उसके समूल नाश की दिशा में कदम बढ़ाया है।
उन्होंने कहा कि यह कानून किसी सभ्य समाज और लोकतांत्रिक देश के मूल्यों के अनुरूप नहीं है। उनके अनुसार, यह एक वर्ग विशेष के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण मानसिकता को दर्शाता है, जबकि उस वर्ग का देश के इतिहास और निर्माण में गौरवपूर्ण योगदान रहा है।
सवर्ण महासंघ फाउंडेशन भारत ने सरकार से मांग की है कि यूजीसी कानून पर व्यापक संवाद किया जाए और सभी वर्गों के हित, समान अवसर तथा शिक्षा में योग्यता के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए पुनर्विचार किया जाए।
“जाति नहीं, योग्यता को आधार बनाइए — UGC नियम वापस लिए जाएँ” : विनीता मिश्रा

ब्राह्मण महिला संघ की संयोजिका श्रीमती विनीता मिश्रा ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए जाति आधारित नियमों का विरोध करते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था में जाति नहीं, योग्यता को ही एकमात्र आधार बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि UGC के ये नियम शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव, अविश्वास और मानसिक दबाव को बढ़ावा देंगे, जिसका सीधा असर छात्रों और शिक्षकों की कार्यक्षमता पर पड़ेगा। शिक्षा का उद्देश्य समान अवसर और उत्कृष्टता को बढ़ाना है, न कि समाज को वर्गों में बाँटना।
विनीता मिश्रा ने स्पष्ट शब्दों में कहा,
“हम UGC से मांग करते हैं कि वह इन नियमों को वापस ले और ऐसी नीतियाँ बनाए जो योग्यता, परिश्रम और प्रतिभा को सम्मान दें। 21वीं सदी के भारत में शिक्षा को जाति के चश्मे से देखना देश के भविष्य के साथ अन्याय है।”
उन्होंने आगे कहा कि यदि भारत को विश्व गुरु बनाना है, तो शिक्षा नीति में समरसता, निष्पक्षता और पारदर्शिता अनिवार्य है। किसी भी वर्ग को असुरक्षित या उपेक्षित महसूस कराना सामाजिक न्याय नहीं कहा जा सकता।
विनीता मिश्रा
यूजीसी कानून सवर्णों के खिलाफ संगठित अपराध : बाबू बीरेंद्र सिंह

जमशेदपुर (टेल्को)।
क्षत्रीय महासभा के नेता एवं सवर्ण महासंघ फाउंडेशन भारत के सह प्रदेश अध्यक्ष बाबू बीरेंद्र सिंह ने यूजीसी कानून को सवर्ण समाज के खिलाफ संगठित अपराध करार दिया है। उन्होंने कहा कि “सबका साथ, सबका विकास” के नारे में सवर्णों की उपेक्षा क्यों हो रही है, यह सरकार को स्पष्ट करना चाहिए।
उन्होंने यूजीसी कानून की तुलना अंग्रेजों के रोलेट एक्ट से करते हुए कहा कि यह एक दमनकारी कानून है, जिसमें केवल सजा का प्रावधान दिखाई देता है। उनका आरोप है कि पहले सवर्णों को राजनीतिक भागीदारी और संस्थागत सुरक्षा से वंचित किया गया और अब शिक्षा जैसे अंतिम अधिकार को भी छीना जा रहा है।
बाबू बीरेंद्र सिंह ने सरकार से यूजीसी कानून पर पुनर्विचार कर सभी वर्गों के लिए समान और न्यायपूर्ण शिक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की।
यूजीसी इक्विलिटी कानून से समाज को बांटने की साजिश : धनुर्धर त्रिपाठी

जमशेदपुर।
सवर्ण महासंघ फाउंडेशन भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष धनुर्धर त्रिपाठी ने यूजीसी इक्विलिटी कानून को लेकर केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि सवर्ण समाज सनातन धर्म का मूल है, जिसकी विरासत सदियों से समतामूलक रही है, लेकिन वर्तमान सत्ता अपने वोट और सत्ता हित में समाज को सवर्ण और अन्य वर्ग—ओबीसी, एससी, एसटी व अल्पसंख्यक—में विभाजित कर रही है।
धनुर्धर त्रिपाठी ने आरोप लगाया कि इस कानून का उद्देश्य सवर्ण समाज को कमजोर करना है। उन्होंने कहा कि समता के नाम पर घृणा, कुंठा, नफरत और ईर्ष्या को आधार बनाकर संस्थागत कानूनी भेद पैदा किया गया है, जिसमें सवर्ण समाज को जन्मजात शोषक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि ऐसे कानून लोकतांत्रिक और सभ्य समाज के मूल्यों के विपरीत हैं और इससे सामाजिक सौहार्द को गंभीर क्षति पहुंच सकती है। सवर्ण महासंघ फाउंडेशन भारत ने सरकार से यूजीसी कानून पर पुनर्विचार कर सभी वर्गों के लिए न्यायपूर्ण और संतुलित व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है।
“UGC के नाम पर देश की शिक्षा व्यवस्था के साथ प्रयोग अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा – कन्हैया सिंह

सवर्ण आर्मी के संस्थापक प्रमुख कन्हैया सिंह ने कहा कि जो नियम ज़मीन की हकीकत नहीं समझते, वे सिर्फ काग़ज़ी फरमान बनकर रह जाते हैं।
यह साफ़ कर देना चाहता हूँ कि शिक्षा किसी एक वर्ग, विचारधारा या एजेंडे की बपौती नहीं है।
आज UGC के निर्णयों से छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों में असमंजस और आक्रोश है।
बिना व्यापक संवाद, बिना सभी पक्षों की सहमति के थोपी गई नीतियाँ
लोकतंत्र नहीं, तानाशाही मानसिकता को दर्शाती हैं।
हम चेतावनी नहीं, सीधी बात कर रहे हैं—
अगर UGC ने जनभावनाओं की अनदेखी जारी रखी,
तो सड़कों से लेकर संवैधानिक मंचों तक
इसका पुरज़ोर विरोध होगा।
यह लड़ाई पद या राजनीति की नहीं,
देश के भविष्य और शिक्षा के स्वाभिमान की है।
UGC को चाहिए कि वह हठधर्मिता छोड़े
और जनहित में तुरंत अपने फैसलों पर पुनर्विचार करे।”
यूसीसी के विरोध में ब्राह्मण युवा शक्ति संघ का कड़ा ऐतराज, संयोजक अप्पू तिवारी ने बताया संविधान पर हमला

जमशेदपुर।
प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के विरोध में अप्पू तिवारी ने कड़ा रुख अपनाते हुए इसे संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताया है। संगठन की ओर से जारी बयान में ब्राह्मण युवा शक्ति संघ के संयोजक अप्पू तिवारी ने कहा कि यूसीसी के नाम पर देश की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को कमजोर करने की साजिश की जा रही है।
अप्पू तिवारी ने अपने बयान में कहा,
“भारत केवल एक भू-भाग नहीं बल्कि विविध परंपराओं, रीति-रिवाजों और आस्थाओं का संगम है। समान नागरिक संहिता को जबरन लागू करना संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक संतुलन पर सीधा हमला है। ब्राह्मण युवा शक्ति संघ इसका पुरजोर विरोध करती है।”
उन्होंने आगे कहा कि सरकार को ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय सभी वर्गों, समाजों और संगठनों से व्यापक संवाद करना चाहिए।
“यूसीसी के नाम पर असली मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाया जा रहा है। बेरोजगारी, महंगाई और कानून-व्यवस्था जैसे सवालों पर सरकार चुप है,” उन्होंने कहा।
ब्राह्मण युवा शक्ति संघ ने चेतावनी दी कि यदि यूसीसी को बिना सहमति के आगे बढ़ाया गया, तो संगठन लोकतांत्रिक तरीके से राज्यव्यापी आंदोलन करेगी ।
यूजीसी विनियम 2026 के विभेदकारी प्रावधानों के खिलाफ बिहारी दुबे का कड़ा विरोध

भारतीय भोजपुरी संघ के आनंद बिहारी दुबे ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के प्रस्तावित विनियम 2026 को विभेदकारी और पक्षपातपूर्ण बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है। उन्होंने कहा कि यह विनियम उच्च शिक्षा के राजनीतिकरण का प्रयास है, जिससे शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता समाप्त होगी और छात्रों का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा।
आनंद बिहारी दुबे ने मांग की कि झूठी शिकायतों पर शिकायतकर्ता के खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान किया जाए, ताकि नियमों का दुरुपयोग न हो। उन्होंने जांच समितियों में सामान्य वर्ग के योग्य सदस्यों को शामिल करने और जांच पूरी होने तक छात्रों की पढ़ाई बाधित न होने देने पर भी जोर दिया।
उन्होंने यूजीसी से अपील की कि वह शिक्षा को जातिगत और राजनीतिक विभाजन से दूर रखते हुए गुणवत्ता आधारित, निष्पक्ष और छात्र-हितैषी नीतियां बनाए। दुबे ने चेतावनी दी कि यदि समय रहते संशोधन नहीं किए गए तो जनहित में व्यापक आंदोलन किया जाएगा।

